Iran-US Peace Talks Fail: इस्लामाबाद में चल रही बहुप्रतीक्षित शांति वार्ता पर उस समय संकट के बादल गहरा गए जब ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची बिना किसी अमेरिकी प्रतिनिधि से मुलाकात किए अचानक ओमान के लिए रवाना हो गए। वाशिंगटन और तेहरान के बीच दूसरे दौर की वार्ता को लेकर पूरी दुनिया की उम्मीदें टिकी थीं, लेकिन अरागची के इस कदम ने कूटनीति के गलियारों में सन्नाटा पसरा दिया है। बताया जा रहा है कि ईरान ने बातचीत की मेज पर आने के लिए अमेरिका के सामने 10 कड़ी शर्तें रखी हैं, जिन पर सहमति न बनने के कारण यह ‘डेडलॉक’ (गतिरोध) पैदा हुआ है। (Iran-US Peace Talks Fail)
दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर समय का दबाव बढ़ता जा रहा है। ट्रंप के पास सैन्य कार्रवाई की समय-सीमा (Dead-line) 1 मई तक ही है, जिसके बाद उन्हें कांग्रेस की मंजूरी लेनी होगी। ऐसी स्थिति में, अगले 24 से 48 घंटे बेहद निर्णायक होने वाले हैं। यदि कूटनीति विफल होती है, तो सीजफायर का यह ‘शॉर्ट ब्रेक’ एक भीषण विध्वंस में बदल सकता है। इस्लामाबाद में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा पाकिस्तान भी अब असहाय नजर आ रहा है, क्योंकि ईरान के शासन तंत्र के भीतर चल रही आपसी खींचतान ने इस शांति प्रक्रिया की कमर तोड़ दी है। (Iran-US Peace Talks Fail)
ईरान में सत्ता के दो केंद्र
वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, ईरान इस समय आंतरिक संघर्ष से जूझ रहा है। एक तरफ राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान और विदेश मंत्री अरागची का उदारवादी गुट है, जो देश की चरमराती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए युद्ध टालना चाहता है। वहीं दूसरी ओर, ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) के कमांडर अहमद वाहिदी का गुट है, जो किसी भी समझौते को ‘राष्ट्रीय अपमान’ बता रहा है। अयातुल्ला खामेनेई जैसे सर्वोच्च नेता के प्रभाव की कमी के कारण अब ईरानी वार्ताकार केवल एक ‘मैसेंजर’ बनकर रह गए हैं। IRGC का मानना है कि सैन्य शक्ति दिखाकर ही शर्तें मनवाई जा सकती हैं। यही वजह है कि अरागची के हाथ बंधे हुए हैं और वे किसी भी ठोस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने की स्थिति में नहीं हैं। (Iran-US Peace Talks Fail)
Iran-USA Peace Talk: इस्लामाबाद में ‘पीस टॉक’ से पहले गरमाया माहौल, ईरान ने अमेरिका को दी बड़ी नसीहत
1 मई की डेडलाइन और ट्रंप का ‘युद्ध चक्रव्यूह’
- अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए यह शांति वार्ता केवल कूटनीति नहीं, बल्कि कानूनी मजबूरी भी है। अमेरिकी कानून के मुताबिक, ट्रंप बिना संसद (कांग्रेस) की मंजूरी के युद्ध को लंबा नहीं खींच सकते।
- 28 फरवरी: युद्ध की शुरुआत।
- 2 मार्च: कांग्रेस को सूचना।
- 1 मई: सैन्य तैनाती की अंतिम समय-सीमा।
- ट्रंप 1 मई से पहले इस विवाद का अंतिम समाधान चाहते हैं। यदि वार्ता से बात नहीं बनी, तो वे सैन्य विध्वंस का रास्ता चुन सकते हैं ताकि कांग्रेस के हस्तक्षेप से पहले ईरान की कमर तोड़ी जा सके। (Iran-US Peace Talks Fail)
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‘पश्चिमी एशिया का चेहरा बदल देंगे’
इस पूरे घटनाक्रम पर इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पैनी नजर है। इजराइली मीडिया इस सीजफायर को केवल एक विराम मान रही है। नेतन्याहू ने स्पष्ट संकेत देते हुए कहा है, ‘हमने वादा किया कि पश्चिमी एशिया का चेहरा बदल देंगे। अब हम वहीं करने की कोशिश कर रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप से मेरी बात हो रही है। वो ईरान पर सैन्य और आर्थिक दबाव बना रहे हैं।’ (Iran-US Peace Talks Fail)
ईरान के चारों तरफ अमेरिकी फौज
- शांति की बातों के बीच युद्ध की तैयारी में कोई कमी नहीं आई है। पिछले 24 घंटों में अमेरिका ने घेराबंदी और कड़ी कर दी है:
- UAE बेस: 12 F/A-18 फाइटर जेट्स और 7 एयररिफ्यूलिंग टैंकर तैनात।
- फारस की खाड़ी: 3 एयरक्राफ्ट कैरियर और 12 वॉरशिप्स की तैनाती।
- मिसाइल परीक्षण: पलटवार करते हुए ईरान ने भी 2000 किमी रेंज वाली बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया है।
- ईरान में करीब 9 हजार कंपनियां दिन-रात हथियार बनाने में जुटी हैं, जो हर दिन 1000 से ज्यादा मिसाइल और ड्रोन बनाने का दावा कर रही हैं। (Iran-US Peace Talks Fail)
कूटनीति की आखिरी सांसें
अरागची का इस्लामाबाद छोड़कर ओमान जाना इस बात का संकेत है कि अब गेंद पूरी तरह से अमेरिका के पाले में है। क्या ट्रंप ईरान की 10 शर्तों को मानेंगे या फिर 1 मई को ‘फाइनल स्ट्राइक’ का आदेश देंगे? दुनिया की सांसें थमी हुई हैं, क्योंकि एक छोटी सी चूक इस बार पूरी दुनिया को महायुद्ध के मुहाने पर धकेल सकती है। (Iran-US Peace Talks Fail)



