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Lokhitkranti > उत्तराखंड > Uttarakhand Water Disaster: पिघलते ग्लेशियरों ने बढ़ाई चिंता, उत्तराखंड में मंडरा रहा नई जल आपदा का खतरा
उत्तराखंड

Uttarakhand Water Disaster: पिघलते ग्लेशियरों ने बढ़ाई चिंता, उत्तराखंड में मंडरा रहा नई जल आपदा का खतरा

Manisha
Last updated: 2026-06-18 9:57 पूर्वाह्न
Manisha Published 2026-06-18
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Uttarakhand Himalayas highlighting the growing Uttarakhand Water Disaster risk caused by melting glaciers and expanding glacial lakes.
Uttarakhand Himalayas highlighting the growing Uttarakhand Water Disaster risk caused by melting glaciers and expanding glacial lakes.
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Uttarakhand Water Disaster: कुछ दशक पहले तक उत्तराखंड के हिमालयी ग्लेशियरों को राज्य की सबसे बड़ी प्राकृतिक संपदा माना जाता था, लेकिन अब यही ग्लेशियर एक नए खतरे की चेतावनी दे रहे हैं। तेजी से पिघलते ग्लेशियर और उनके पीछे बनने वाली विशाल झीलें भविष्य में बड़े जल प्रलय का कारण बन सकती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि समय रहते निगरानी और चेतावनी तंत्र को मजबूत नहीं किया गया, तो राज्य को गंभीर Uttarakhand Water Disaster का सामना करना पड़ सकता है।

Contents
तेजी से पीछे हट रहे हैं हिमालयी ग्लेशियरग्लेशियरों के पीछे बनने लगी हैं विशाल झीलें13 संवेदनशील झीलों में 6 को माना गया सबसे खतरनाक426 ग्लेशियर झीलों का अध्ययन, 25 पर विशेष नजरआधुनिक तकनीक से निगरानी की तैयारीदुर्गम इलाकों में नेटवर्क की चुनौतीनीचे बसे इलाकों पर सबसे ज्यादा खतराजलवायु परिवर्तन के खिलाफ तैयारी की जरूरत

तेजी से पीछे हट रहे हैं हिमालयी ग्लेशियर

जलवायु परिवर्तन का असर अब हिमालयी क्षेत्रों में साफ दिखाई देने लगा है। उत्तराखंड समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहे हैं। वैज्ञानिक इसे ग्लेशियर रिसेशन यानी ग्लेशियरों के पीछे खिसकने की प्रक्रिया बताते हैं।

वाडिया हिमालयी भूविज्ञान संस्थान के विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तराखंड के कई ग्लेशियर पहले की तुलना में तेजी से पिघल रहे हैं। इसका असर केवल बर्फ के भंडार तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे बनने वाली झीलें भी लगातार आकार में बढ़ रही हैं। यही स्थिति भविष्य में Uttarakhand Water Disaster की सबसे बड़ी वजह बन सकती है।

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ग्लेशियरों के पीछे बनने लगी हैं विशाल झीलें

जब ग्लेशियर पीछे हटते हैं तो उनके सामने पानी जमा होकर प्रोग्लेशियर और पैराग्लेशियर झीलों का निर्माण करता है। शुरुआती दौर में ये झीलें सामान्य दिखाई देती हैं, लेकिन समय के साथ इनमें पानी की मात्रा तेजी से बढ़ने लगती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी कारणवश इन झीलों की प्राकृतिक दीवार टूट जाती है तो अचानक भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है। इस स्थिति को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है। ऐसे हादसे नदियों के किनारे बसे गांवों, पुलों, सड़कों और बिजली परियोजनाओं के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं।

13 संवेदनशील झीलों में 6 को माना गया सबसे खतरनाक

केंद्रीय जल आयोग की ओर से तैयार की गई रिपोर्ट में उत्तराखंड की 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। इनमें से छह झीलें अत्यधिक संवेदनशील मानी गई हैं।

ये झीलें मुख्य रूप से विलंगना, अलकनंदा और गौरीगंगा बेसिन में स्थित हैं। कुमाऊं क्षेत्र की कुछ झीलों को भी विशेष निगरानी की जरूरत बताई गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इन झीलों में जलस्तर अनियंत्रित तरीके से बढ़ा तो बड़े पैमाने पर Uttarakhand Water Disaster की आशंका पैदा हो सकती है।

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426 ग्लेशियर झीलों का अध्ययन, 25 पर विशेष नजर

हाल ही में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन में राज्य की 426 ग्लेशियर झीलों का विश्लेषण किया गया, जिनका क्षेत्रफल एक हजार वर्ग मीटर से अधिक है।

इस अध्ययन में 25 झीलों को संवेदनशील और छह को अति संवेदनशील पाया गया। पिछले एक दशक में इन झीलों के आकार और जल भंडारण क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह परिवर्तन जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव का संकेत है।

आधुनिक तकनीक से निगरानी की तैयारी

संभावित खतरे को देखते हुए उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA), राज्य आपदा प्रबंधन विभाग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) मिलकर निगरानी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

संवेदनशील क्षेत्रों में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन, ऑटोमैटिक वाटर लेवल रिकॉर्डर, कैमरे और भूकंपीय गतिविधियों पर नजर रखने वाले उपकरण लगाए जाएंगे। इनकी मदद से बारिश, बर्फबारी और झीलों के जलस्तर में होने वाले बदलावों की लगातार जानकारी मिल सकेगी। यदि किसी झील में अचानक जलस्तर बढ़ता है तो संबंधित कंट्रोल सेंटर को तत्काल सूचना भेजी जाएगी, जिससे नीचे रहने वाले लोगों को समय रहते अलर्ट किया जा सके।

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दुर्गम इलाकों में नेटवर्क की चुनौती

हालांकि तकनीकी निगरानी की यह योजना काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन हिमालयी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां इसके सामने चुनौती भी पेश कर रही हैं। ऊंचाई वाले इलाकों में मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट सेवाएं अक्सर बाधित रहती हैं। ऐसे में उपकरणों से प्राप्त डेटा समय पर कंट्रोल सेंटर तक पहुंचेगा या नहीं, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल उपकरण लगाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि मजबूत संचार प्रणाली विकसित करना भी उतना ही जरूरी है।

नीचे बसे इलाकों पर सबसे ज्यादा खतरा

यदि किसी झील का बांध टूटता है तो सबसे पहले डाउनस्ट्रीम यानी निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में गांव, सड़कें, पुल, जल विद्युत परियोजनाएं और कृषि भूमि प्रभावित हो सकती हैं। 2021 की ऋषिगंगा आपदा के बाद वैज्ञानिक लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक बदलावों को गंभीरता से लेना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में Uttarakhand Water Disaster केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी बन सकता है।

जलवायु परिवर्तन के खिलाफ तैयारी की जरूरत

वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में हो रहे बदलावों को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ग्लेशियरों का सिकुड़ना, झीलों का विस्तार और मौसम के पैटर्न में तेजी से बदलाव आने वाले वर्षों में नई चुनौतियां पैदा कर सकते हैं।

ऐसे में समय रहते निगरानी, आधुनिक चेतावनी प्रणाली, वैज्ञानिक अनुसंधान और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को मजबूत करना जरूरी होगा। क्योंकि उत्तराखंड की नदियां और ग्लेशियर केवल राज्य की नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं।

यदि इन खतरों को समय रहते नहीं समझा गया, तो आने वाले वर्षों में Uttarakhand Water Disaster एक बड़ी वास्तविकता बन सकता है, जिसका असर हिमालय से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक महसूस किया जाएगा।

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