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Lokhitkranti > उत्तराखंड > Organic Farming Crisis: 90 हजार से ज्यादा किसानों के ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट सस्पेंड, संकट में राज्य की जैविक पहचान
उत्तराखंड

Organic Farming Crisis: 90 हजार से ज्यादा किसानों के ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट सस्पेंड, संकट में राज्य की जैविक पहचान

Manisha
Last updated: 2026-05-25 7:55 पूर्वाह्न
Manisha Published 2026-05-25
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Organic Farming Crisis
Organic Farming Crisis: 90 हजार से ज्यादा किसानों के ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट सस्पेंड, संकट में राज्य की जैविक पहचान
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Organic Farming Crisis: उत्तराखंड को देश में ऑर्गेनिक खेती का मॉडल राज्य बनाने की दिशा में पिछले कई वर्षों से बड़े स्तर पर काम किया जा रहा था, लेकिन अब राज्य की यह महत्वाकांक्षी योजना गंभीर संकट में फंसती दिखाई दे रही है। प्रदेश में Organic Farming Crisis उस समय गहरा गया जब 90 हजार से ज्यादा किसानों के ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट सस्पेंड कर दिए गए। इस कार्रवाई के बाद किसानों की आजीविका, जैविक उत्पादों के बाजार और राज्य की ऑर्गेनिक पहचान पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

Contents
क्यों सस्पेंड हुए किसानों के सर्टिफिकेट?एपीडा ने पहले ही दी थी चेतावनीकिसानों की आजीविका पर मंडराया खतराकर्मचारियों की हड़ताल से और बिगड़े हालातप्रबंधन और कर्मचारियों में आरोप-प्रत्यारोपउत्तराखंड की ऑर्गेनिक पहचान पर असर

राज्य में करीब डेढ़ लाख किसान जैविक खेती से जुड़े हुए हैं, जो लगभग 74 हजार हेक्टेयर भूमि पर ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं। लेकिन अब प्रमाणन प्रक्रिया में आई खामियों और प्रशासनिक लापरवाही ने हजारों किसानों को अनिश्चितता के दौर में पहुंचा दिया है।

क्यों सस्पेंड हुए किसानों के सर्टिफिकेट?

जानकारी के मुताबिक, उत्तराखंड स्टेट ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन एजेंसी (USOCA) ने 312 ऑर्गेनिक ग्रोवर ग्रुप्स से जुड़े किसानों के सर्टिफिकेट सस्पेंड कर दिए हैं। इसका मुख्य कारण इन समूहों के पास वैध ‘लीगल एंटिटी’ यानी कानूनी इकाई का दर्जा नहीं होना बताया जा रहा है।

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नियमों के अनुसार ऑर्गेनिक खेती से जुड़े किसान समूहों का किसी सोसाइटी, कंपनी या पंजीकृत संस्था के रूप में रजिस्ट्रेशन होना अनिवार्य है। लेकिन बड़ी संख्या में किसान समूह अब तक कानूनी रूप से पंजीकृत नहीं हो पाए। इसी वजह से Organic Farming Crisis और गहरा गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते इन समूहों को रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया से नहीं जोड़ा गया, तो आने वाले महीनों में और बड़ी संख्या में किसानों के प्रमाणन पर खतरा मंडरा सकता है।

एपीडा ने पहले ही दी थी चेतावनी

बताया जा रहा है कि Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority (APEDA) ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए 16 अप्रैल 2026 को राज्य सरकार को पत्र भेजकर स्थिति से अवगत कराया था। पत्र में स्पष्ट कहा गया था कि यदि किसान समूहों को कानूनी दर्जा नहीं मिला तो उनके सर्टिफिकेट निलंबित हो सकते हैं।

इसके बावजूद विभागीय स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं की गई। अब स्थिति यह है कि 90 हजार से अधिक किसानों के प्रमाणन पर असर पड़ चुका है और जून के अंत तक यह संख्या 1 लाख 13 हजार तक पहुंच सकती है।

Organic Farming Crisis को लेकर कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल किसानों का मुद्दा नहीं, बल्कि राज्य की पूरी ऑर्गेनिक अर्थव्यवस्था से जुड़ा मामला है। यदि किसानों के सर्टिफिकेट रद्द रहते हैं तो उनके उत्पादों की बाजार वैल्यू और निर्यात क्षमता दोनों प्रभावित होंगी।

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किसानों की आजीविका पर मंडराया खतरा

उत्तराखंड में पिछले दो दशकों से किसानों को रासायनिक खेती छोड़कर जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया गया था। सरकार की ओर से प्रशिक्षण, प्रमाणन, बाजार उपलब्ध कराने और सब्सिडी जैसी कई योजनाएं चलाई गईं। लाखों रुपये खर्च कर राज्य को ऑर्गेनिक हब बनाने की कोशिश की गई।

लेकिन अब Organic Farming Crisis के चलते हजारों किसान चिंता में हैं। किसानों का कहना है कि यदि ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट निलंबित रहेंगे तो वे अपने उत्पादों को प्रीमियम कीमत पर नहीं बेच पाएंगे। इससे उनकी आय पर सीधा असर पड़ेगा।

कई किसान समूहों ने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा किसानों को नहीं भुगतना चाहिए।

कर्मचारियों की हड़ताल से और बिगड़े हालात

इस पूरे विवाद के बीच उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद (UOCB) के कर्मचारी भी हड़ताल पर चले गए हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें पिछले चार महीनों से वेतन नहीं मिला है। आर्थिक संकट के कारण उन्होंने कामकाज बंद कर धरना शुरू कर दिया है।

कर्मचारियों का कहना है कि अधिकारियों की लापरवाही और प्रोजेक्ट प्रबंधन में रुचि न लेने के कारण आज यह स्थिति पैदा हुई है। उनका आरोप है कि यदि समय रहते किसान समूहों के दस्तावेज पूरे कराए जाते और कानूनी प्रक्रियाएं पूरी कराई जातीं, तो Organic Farming Crisis जैसी स्थिति नहीं बनती।

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धरने पर बैठे कर्मचारियों ने सरकार से लंबित वेतन जल्द जारी करने की मांग की है। उनका कहना है कि लगातार आर्थिक दबाव के कारण उनके परिवारों के सामने भी संकट खड़ा हो गया है।

प्रबंधन और कर्मचारियों में आरोप-प्रत्यारोप

वहीं दूसरी ओर परिषद प्रबंधन इस पूरे मामले के लिए कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहरा रहा है। UOCB के प्रबंध निदेशक अभय सक्सेना का कहना है कि किसान समूहों को कानूनी इकाई का दर्जा दिलाना फील्ड कर्मचारियों की जिम्मेदारी थी।

उन्होंने कहा कि भारत सरकार पहले ही इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी कर चुकी थी। साथ ही यह भी दावा किया गया कि एपीडा सस्पेंड अवधि को भी निरंतरता में जोड़ने पर सहमत हो गया है, जिससे किसानों को राहत मिल सकती है। प्रबंधन के अनुसार करीब 90 लाख रुपये का बजट स्वीकृत हो चुका है और अगले 10 से 12 दिनों के भीतर कर्मचारियों का भुगतान जारी कर दिया जाएगा।

उत्तराखंड की ऑर्गेनिक पहचान पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि Organic Farming Crisis का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। उत्तराखंड लंबे समय से देश और विदेश में ऑर्गेनिक उत्पादों के लिए पहचान बना रहा था। यहां की मंडुवा, झंगोरा, राजमा और अन्य जैविक फसलों की मांग लगातार बढ़ रही थी।

यदि प्रमाणन प्रक्रिया लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो राज्य की ऑर्गेनिक ब्रांडिंग को बड़ा नुकसान हो सकता है। साथ ही किसानों का जैविक खेती से भरोसा भी कमजोर पड़ सकता है। अब सबकी नजर राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियों पर टिकी है कि वे इस संकट से किसानों को कितनी जल्दी राहत दिला पाते हैं।

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