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Lokhitkranti > उत्तराखंड > IPS Deputation Case: उत्तराखंड के दो IPS अफसरों को CAT से राहत, प्रतिनियुक्ति आदेश पर रोक
उत्तराखंड

IPS Deputation Case: उत्तराखंड के दो IPS अफसरों को CAT से राहत, प्रतिनियुक्ति आदेश पर रोक

Lokhit Kranti
Last updated: 2026-04-08 2:27 अपराह्न
By Lokhit Kranti 5 महीना ago
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IPS Deputation Case
IPS Deputation Case: उत्तराखंड के दो IPS अफसरों को CAT से राहत, प्रतिनियुक्ति आदेश पर रोक
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IPS Deputation Case: देहरादून से एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक खबर सामने आई है, जहां IPS Deputation Case में उत्तराखंड के दो वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को बड़ी राहत मिली है। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) ने फिलहाल उनके केंद्रीय प्रतिनियुक्ति आदेश पर रोक लगा दी है। इस फैसले के बाद राज्य और केंद्र के बीच अधिकारियों की तैनाती को लेकर चल रही बहस एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है।

Contents
क्या है पूरा मामला?बिना सहमति के भेजे जाने का आरोपकैसे बढ़ा मामला आगे?CAT का अहम फैसलानियमों और प्रक्रिया पर उठे सवालक्या कहता है प्रशासनिक ढांचा?आगे क्या होगा?

क्या है पूरा मामला?

Central Administrative Tribunal (CAT) में पहुंचे इस IPS Deputation Case में दो वरिष्ठ अधिकारी, Neeru Garg और Arun Mohan Joshi, ने अपनी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को चुनौती दी थी।

दोनों अधिकारी वर्तमान में उत्तराखंड में पुलिस महानिरीक्षक (IG) के पद पर कार्यरत हैं। केंद्र सरकार ने इन्हें क्रमशः Indo-Tibetan Border Police (ITBP) और Border Security Force (BSF) में उप महानिरीक्षक (DIG) के रूप में तैनात करने का आदेश जारी किया था।

बिना सहमति के भेजे जाने का आरोप

इस IPS Deputation Case की सबसे अहम बात यह है कि दोनों अधिकारियों ने दावा किया है कि उन्हें बिना उनकी सहमति के प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया। उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि उन्होंने न तो केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए आवेदन किया और न ही इसके लिए सहमति दी। अधिकारियों का यह भी कहना है कि IG रैंक से DIG रैंक पर भेजना उनके लिए “प्रोफेशनल डिमोशन” जैसा है, जो सेवा नियमों के खिलाफ है।

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कैसे बढ़ा मामला आगे?

इस पूरे IPS Deputation Case की शुरुआत तब हुई जब 5 मार्च 2026 को गृह मंत्रालय ने दोनों अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के आदेश जारी किए। इसके अगले ही दिन, 6 मार्च को उत्तराखंड सरकार ने उन्हें तत्काल प्रभाव से कार्यमुक्त भी कर दिया।

इसके बाद दोनों अधिकारियों ने इस आदेश को Nainital High Court में चुनौती दी। हालांकि हाईकोर्ट से उन्हें तत्काल राहत नहीं मिली और उन्हें CAT जाने की सलाह दी गई।

CAT का अहम फैसला

मामला जब Central Administrative Tribunal पहुंचा, तो वहां से अधिकारियों को राहत मिली। CAT ने फिलहाल इस IPS Deputation Case में प्रतिनियुक्ति आदेश पर रोक लगा दी है। साथ ही, ट्रिब्यूनल ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के भीतर पूरे मामले से संबंधित दस्तावेज और प्रक्रिया का विवरण प्रस्तुत करे।

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नियमों और प्रक्रिया पर उठे सवाल

इस IPS Deputation Case ने प्रशासनिक प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अधिकारियों का कहना है कि केंद्र सरकार को भेजे गए नामों के पीछे उनकी सहमति नहीं ली गई थी।

बताया गया है कि 16 फरवरी 2026 को राज्य सरकार ने उनके नाम केंद्र को भेजे थे, जिसके बाद प्रतिनियुक्ति के आदेश जारी किए गए। अधिकारियों ने यह भी दलील दी कि उन्हें पहले ही केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से छूट मिल चुकी थी, फिर भी उन्हें जबरन भेजा जा रहा है।

क्या कहता है प्रशासनिक ढांचा?

भारत में अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत होती है, जिसमें अधिकारी की सहमति और सेवा नियमों का पालन जरूरी माना जाता है।

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इस IPS Deputation Case में यही मुद्दा सबसे बड़ा विवाद बन गया है—क्या बिना सहमति के प्रतिनियुक्ति संभव है? और क्या वरिष्ठ अधिकारी को निचले पद पर भेजा जा सकता है?

आगे क्या होगा?

अब इस IPS Deputation Case में अगला कदम राज्य सरकार के जवाब पर निर्भर करेगा। यदि सरकार संतोषजनक जवाब नहीं दे पाती है, तो यह मामला और लंबा खिंच सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केस भविष्य में अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति से जुड़े नियमों और प्रक्रियाओं को स्पष्ट करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

उत्तराखंड के इन दो आईपीएस अधिकारियों को मिली राहत ने प्रशासनिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। IPS Deputation Case अब केवल एक व्यक्तिगत मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सेवा नियमों, अधिकारों और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है।

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