Dhar Bhojshala Dispute Story: मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर इंदौर हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है। 15 मई 2026 को सुनाए गए फैसले में अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक रिपोर्ट और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर भोजशाला परिसर को मां वाग्देवी सरस्वती मंदिर का स्वरूप माना। अदालत ने मुस्लिम पक्ष की नमाज संबंधी मांग और जैन समाज की याचिकाएं खारिज करते हुए इस विवाद में बड़ा कानूनी मोड़ ला दिया।
करीब सात दशकों से अदालत, राजनीति, इतिहास और धार्मिक दावों के केंद्र में रहे भोजशाला विवाद को अब एक नई दिशा मिल गई है। यह मामला केवल एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भारतीय इतिहास, पुरातत्व और सांस्कृतिक विरासत की पहचान से भी जुड़ गया। आइए जानते हैं भोजशाला विवाद की पूरी कहानी, राजा भोज के काल से लेकर ASI सर्वे और हाई कोर्ट के फैसले तक। (Dhar Bhojshala Dispute Story)
क्या है भोजशाला विवाद?
धार की भोजशाला को हिंदू पक्ष मां वाग्देवी यानी देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र मानता रहा है। मान्यता है कि 11वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज ने यहां विद्या और संस्कृति के एक विशाल केंद्र की स्थापना की थी। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा और वहां नमाज का अधिकार मांगता रहा। विवाद की सबसे बड़ी जड़ यही रही कि वर्तमान ढांचे का मूल स्वरूप मंदिर है या मस्जिद। (Dhar Bhojshala Dispute Story)
राजा भोज और भोजशाला का इतिहास
इतिहासकारों के अनुसार भोजशाला का संबंध परमार राजा भोज से माना जाता है, जिन्होंने मालवा क्षेत्र में साहित्य, शिक्षा और संस्कृति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। कहा जाता है कि यहां संस्कृत, व्याकरण और साहित्य की शिक्षा दी जाती थी। हिंदू संगठनों का दावा है कि यहां मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित थी और यह विशाल मंदिर परिसर था। बाद में 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया और उसके अवशेषों का उपयोग कर मस्जिदनुमा ढांचा खड़ा किया गया। (Dhar Bhojshala Dispute Story)
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ऐतिहासिक दस्तावेजों में क्या मिला?
ब्रिटिशकालीन गजेटियर, पुरातात्विक रिकॉर्ड और कई इतिहासकारों के शोध पत्रों में भोजशाला को सरस्वती मंदिर और शिक्षा केंद्र के रूप में उल्लेखित किया गया है। जर्मन भारतविद एलॉइस एंटोन फ्यूहरर ने 1893 में पहली बार “भोजशाला” शब्द का इस्तेमाल किया था। बाद में ब्रिटिश अधिकारी के.के. लेले ने यहां मिले संस्कृत शिलालेखों का अध्ययन कराया। (Dhar Bhojshala Dispute Story)
ASI सर्वे में क्या मिला?
इस विवाद में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब इंदौर हाई कोर्ट ने 11 मार्च 2024 को ASI को वैज्ञानिक सर्वेक्षण का आदेश दिया। ASI ने करीब 98 दिनों तक परिसर का अध्ययन किया और 2100 पन्नों की रिपोर्ट अदालत को सौंपी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि वर्तमान ढांचे से पहले वहां परमारकालीन विशाल संरचना मौजूद थी। ASI को परिसर में नक्काशीदार स्तंभ, संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख, सभा कक्ष, यज्ञ कुंड और देवी-देवताओं से जुड़े प्रतीक मिले। रिपोर्ट के मुताबिक कई स्तंभों और दीवारों पर मानव और पशु आकृतियों को जानबूझकर क्षतिग्रस्त किया गया था। ASI ने यह भी कहा कि वर्तमान ढांचे में मंदिर के अवशेषों का इस्तेमाल हुआ है। (Dhar Bhojshala Dispute Story)
कोर्ट में किन-किन पक्षों ने रखे दावे?
हिंदू पक्ष की ओर से अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि परिसर के स्थापत्य तत्व, संस्कृत शिलालेख और देवी सरस्वती से जुड़े प्रतीक मंदिर स्वरूप की पुष्टि करते हैं। मुस्लिम पक्ष ने इसे कमाल मौला मस्जिद बताते हुए नमाज की परंपरा का हवाला दिया और धार्मिक अधिकार बनाए रखने की मांग की। वहीं जैन समाज ने भी इस स्थल (Dhar Bhojshala Dispute Story)को अपने इतिहास से जुड़ा बताते हुए दावा पेश किया था।
हाई कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
15 मई 2026 को इंदौर हाई कोर्ट की डबल बेंच ने ASI रिपोर्ट और ऐतिहासिक साक्ष्यों पर भरोसा जताते हुए कहा कि भोजशाला का धार्मिक चरित्र मां वाग्देवी सरस्वती मंदिर का है। अदालत ने साफ कहा कि यह एक संरक्षित पुरातात्विक स्मारक है और Archaeological Sites and Remains Act, 1958 के तहत संरक्षित रहेगा। कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को परिसर में नमाज का अधिकार देने से इनकार कर दिया। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यदि मुस्लिम समुदाय चाहे तो राज्य सरकार से वैकल्पिक भूमि आवंटन की मांग कर सकता है। (Dhar Bhojshala Dispute Story)
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1951 से चला आ रहा है विवाद
भोजशाला को 1951 में संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था। इसके बाद मंगलवार को हिंदू पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय (Dhar Bhojshala Dispute Story) को सीमित समय के लिए नमाज की अनुमति देने की व्यवस्था बनाई गई। अयोध्या आंदोलन के बाद भोजशाला विवाद ने भी राजनीतिक रूप ले लिया। 1994, 1997 और 2003 में यहां कई बार तनावपूर्ण स्थिति बनी, हिंसा हुई और मामला संसद तक पहुंचा।
अब आगे क्या होगा?
अब सबकी नजर इस बात पर है कि मुस्लिम पक्ष हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देता है या नहीं। वहीं हिंदू संगठनों की मांग है कि भोजशाला में नियमित पूजा की अनुमति दी जाए और मां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित की जाए। करीब 70 साल पुराने इस विवाद पर हाई कोर्ट का फैसला एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है, लेकिन अंतिम कानूनी तस्वीर सुप्रीम कोर्ट की संभावित सुनवाई के बाद ही साफ होगी। (Dhar Bhojshala Dispute Story)
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