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Lokhitkranti > पश्चिम बंगाल > Bengal Crime Free Mission: CM शुभेंदु अधिकारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती, क्या खत्म होगा ‘मस्तान राज’?
पश्चिम बंगाल

Bengal Crime Free Mission: CM शुभेंदु अधिकारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती, क्या खत्म होगा ‘मस्तान राज’?

Manisha
Last updated: 2026-05-10 7:54 पूर्वाह्न
Manisha Published 2026-05-10
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Bengal Crime Free Mission
Bengal Crime Free Mission: CM शुभेंदु अधिकारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती, क्या खत्म होगा ‘मस्तान राज’?
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Bengal Crime Free Mission: West Bengal में नई सरकार बनने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल कानून-व्यवस्था को लेकर उठ रहा है। मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari ने शपथ लेने से पहले “भय-मुक्त बंगाल” बनाने का वादा किया था, लेकिन जमीन पर हालात इतने आसान नहीं दिखते। दशकों से राज्य की राजनीति और स्थानीय समाज में गहराई तक जड़ें जमा चुके “मस्तान” और “चेंगड़ा” नेटवर्क अब नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनते नजर आ रहे हैं।

Contents
कौन हैं बंगाल के ‘मस्तान’ और ‘चेंगड़ा’?नक्सल आंदोलन से शुरू हुई पृष्ठभूमिवाम मोर्चा से तृणमूल तक बदले राजनीतिक ठिकानेSuvendu Adhikari के सामने असली चुनौतीपुलिस सुधार और निष्पक्ष कार्रवाई जरूरीबेरोजगारी भी बड़ी वजहउद्योग और निवेश पर असरक्या बदल पाएगा बंगाल?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर सरकार वास्तव में Bengal Crime Free Mission को सफल बनाना चाहती है, तो उसे केवल राजनीतिक बदलाव नहीं बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे में भी बड़ा सुधार करना होगा।

कौन हैं बंगाल के ‘मस्तान’ और ‘चेंगड़ा’?

कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में अक्सर ऐसे युवकों के समूह दिखाई देते हैं, जो सड़क किनारे कैरम खेलते, चाय की दुकानों पर घंटों बैठे रहते या स्थानीय क्लबों के जरिए इलाके में प्रभाव बनाए रखते हैं। इन्हें स्थानीय भाषा में “मस्तान” या “चेंगड़ा” कहा जाता है।

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Kolkata के श्याम बाजार, कॉलेज स्ट्रीट, हाथी बागान, शोभा बाजार और कुम्हार टोली जैसे इलाकों में यह संस्कृति दशकों से मौजूद है। शुरुआत में ये समूह स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली युवकों के रूप में देखे जाते थे, लेकिन समय के साथ इनका संबंध राजनीतिक संरक्षण, वसूली और अपराध से जुड़ता चला गया।

नक्सल आंदोलन से शुरू हुई पृष्ठभूमि

विशेषज्ञ बताते हैं कि इस पूरी संस्कृति की जड़ें 1960 और 70 के दशक के नक्सल आंदोलन में दिखाई देती हैं। Naxalite Movement के दौरान बड़ी संख्या में युवा राजनीति और हिंसक आंदोलनों से जुड़े।

उस दौर में बेरोजगारी, सामाजिक असमानता और राजनीतिक अस्थिरता ने युवाओं को कट्टर रास्तों की ओर धकेला। बाद में जब आंदोलन कमजोर पड़ा, तो बड़ी संख्या में भटके हुए युवा स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क का हिस्सा बन गए।

1970 के दशक में कांग्रेस सरकार और बाद में वाम मोर्चा सरकार के दौरान इन समूहों को अलग-अलग राजनीतिक दलों ने अपने प्रभाव क्षेत्र के लिए इस्तेमाल किया। यही वजह है कि “मस्तान संस्कृति” धीरे-धीरे राजनीतिक ढांचे का हिस्सा बनती चली गई।

वाम मोर्चा से तृणमूल तक बदले राजनीतिक ठिकाने

राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि इन स्थानीय समूहों ने हमेशा सत्ता के साथ खुद को जोड़ा। Jyoti Basu के नेतृत्व वाले वाम मोर्चा शासन के दौरान स्थानीय क्लबों और संगठनों के जरिए इन युवाओं को राजनीतिक संरक्षण मिला। बाद में जब Mamata Banerjee सत्ता में आईं, तो इन्हीं समूहों का बड़ा हिस्सा तृणमूल कांग्रेस के करीब पहुंच गया।

Also Read: बंगाल मर्डर केस में यूपी कनेक्शन से सनसनी, मोबाइल-चैट और गुप्त सुरागों ने बढ़ाई पुलिस की टेंशन

विश्लेषकों का कहना है कि यही कारण है कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक बदलाव के बावजूद स्थानीय स्तर पर दबंग नेटवर्क कभी पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया।

Suvendu Adhikari के सामने असली चुनौती

अब Suvendu Adhikari के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वे वास्तव में Bengal Crime Free Mission को लागू कर पाएंगे?

नई सरकार के सामने केवल अपराध रोकने की चुनौती नहीं है, बल्कि उन राजनीतिक और सामाजिक नेटवर्क को तोड़ने की भी जरूरत है, जो दशकों से सत्ता और स्थानीय प्रभाव के सहारे मजबूत हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन तत्वों पर नियंत्रण नहीं हुआ, तो सरकार के “भय-मुक्त बंगाल” के दावे पर सवाल उठ सकते हैं।

पुलिस सुधार और निष्पक्ष कार्रवाई जरूरी

राज्य में लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि राजनीतिक दबाव के कारण पुलिस कई मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई नहीं कर पाती। बमबाजी, वसूली, स्थानीय हिंसा और अवैध गतिविधियों के बावजूद कई मामलों में कार्रवाई धीमी रही है। अब नई सरकार से उम्मीद की जा रही है कि पुलिस को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त कर निष्पक्ष तरीके से काम करने दिया जाएगा।

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि Bengal Crime Free Mission तभी सफल हो सकता है, जब पुलिसिंग को राजनीतिक संरक्षण से अलग रखा जाए और अपराधियों के खिलाफ समान कार्रवाई हो।

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बेरोजगारी भी बड़ी वजह

पश्चिम बंगाल में लंबे समय से उद्योगों की कमी और रोजगार संकट भी इस समस्या का बड़ा कारण माना जाता है। कई युवाओं के पास स्थायी रोजगार नहीं होने के कारण वे स्थानीय क्लबों, राजनीतिक नेटवर्क और अवैध गतिविधियों से जुड़ जाते हैं। पूजा समितियों और स्थानीय आयोजनों के जरिए फंड जुटाने की संस्कृति भी धीरे-धीरे वसूली के मॉडल में बदलती गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक रोजगार और उद्योग नहीं बढ़ेंगे, तब तक अपराध की जड़ें पूरी तरह खत्म करना मुश्किल होगा।

उद्योग और निवेश पर असर

राज्य में अपराध और राजनीतिक हिंसा की छवि का असर निवेश और व्यापार पर भी पड़ा है। कई कारोबारी लंबे समय से कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता जताते रहे हैं। अगर नई सरकार अपराध पर नियंत्रण पाने में सफल होती है, तो इससे निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है और राज्य में उद्योगों को नई गति मिल सकती है।

क्या बदल पाएगा बंगाल?

नई सरकार के सामने अब सबसे बड़ा इम्तिहान यही है कि क्या वह दशकों पुरानी राजनीतिक हिंसा और स्थानीय दबंग नेटवर्क की संस्कृति को खत्म कर पाएगी। Suvendu Adhikari ने जनता से भय-मुक्त और अपराध-मुक्त बंगाल का वादा किया है। लेकिन इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि पुलिस सुधार, रोजगार सृजन और प्रशासनिक पारदर्शिता की भी जरूरत होगी।

फिलहाल पूरे राज्य की नजर इस बात पर है कि नई सरकार अपने सबसे बड़े वादे,  Bengal Crime Free Mission, को जमीन पर कितनी मजबूती से लागू कर पाती है।

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