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Lokhitkranti > उत्तराखंड > देश में पहली बार होगी झरनों की गिनती! उत्तराखंड बना Water Springs Survey का केंद्र, तैयार होगा सबसे बड़ा जल स्रोत डेटाबेस
उत्तराखंड

देश में पहली बार होगी झरनों की गिनती! उत्तराखंड बना Water Springs Survey का केंद्र, तैयार होगा सबसे बड़ा जल स्रोत डेटाबेस

Lokhit Kranti
Last updated: 2026-06-02 11:58 am
Lokhit Kranti Published 2026-06-02
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Water Springs Survey: Survey team documenting natural water springs and mountain streams in Uttarakhand as part of India's first Water Springs Survey.
Water Springs Survey: Survey team documenting natural water springs and mountain streams in Uttarakhand as part of India's first Water Springs Survey.
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Water Springs Survey: उत्तराखंड में पहली बार प्राकृतिक जल स्रोतों की व्यवस्थित गणना की जा रही है। पहाड़ों की जीवनरेखा माने जाने वाले झरनों, गाड़-गदेरों और छोटी जलधाराओं का रिकॉर्ड तैयार करने के लिए राज्यभर में व्यापक सर्वेक्षण चल रहा है। इस पहल को देश का पहला बड़ा Water Springs Survey माना जा रहा है, जिसके जरिए यह पता लगाया जाएगा कि राज्य में कुल कितने प्राकृतिक जल स्रोत मौजूद हैं और उनकी वर्तमान स्थिति क्या है।

Contents
सदियों से पहाड़ों की जीवनरेखा रहे हैं झरनेसरकार और संस्थाएं मिलकर तैयार कर रही हैं बड़ा डेटाबेस42 हजार से अधिक जल स्रोतों का हो चुका है रिकॉर्डतकनीक की मदद से हो रही जियो-टैगिंगजल सुरक्षा और भविष्य की नीति के लिए बनेगा आधार

अब तक उत्तराखंड समेत देश के किसी भी राज्य के पास झरनों और गाड़-गदेरों की सटीक संख्या का आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं था। ऐसे में यह सर्वेक्षण न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश की जल संरक्षण नीतियों के लिए महत्वपूर्ण आधार बनने जा रहा है।

सदियों से पहाड़ों की जीवनरेखा रहे हैं झरने

उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में पेयजल, सिंचाई और पशुपालन का बड़ा हिस्सा प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर रहा है। पहाड़ों में बहने वाले गाड़ और गदेरे स्थानीय समुदायों की जरूरतों को पूरा करते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण कई जल स्रोत प्रभावित हुए हैं।

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विशेषज्ञों का कहना है कि अनेक क्षेत्रों में झरनों का जलस्तर लगातार घटा है, जबकि कुछ स्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं। इसके बावजूद अब तक कोई ऐसा वैज्ञानिक डेटाबेस उपलब्ध नहीं था, जिससे वास्तविक स्थिति का आकलन किया जा सके। यही कारण है कि Water Springs Survey को भविष्य की जल सुरक्षा के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

सरकार और संस्थाएं मिलकर तैयार कर रही हैं बड़ा डेटाबेस

इस महत्वाकांक्षी अभियान को उत्तराखंड का लघु सिंचाई विभाग भारत सरकार के सहयोग से संचालित कर रहा है। वहीं, हिमालयी क्षेत्रों में जल संरक्षण पर काम करने वाली हिमोत्थान संस्था भी स्वतंत्र रूप से झरनों और जल स्रोतों का अध्ययन कर रही है।

दोनों संस्थाओं का उद्देश्य एक ऐसा व्यापक डिजिटल डेटाबेस तैयार करना है, जिसमें हर जल स्रोत की लोकेशन, जल प्रवाह, उपयोग और भौगोलिक स्थिति का रिकॉर्ड मौजूद हो। यह डेटा भविष्य में जल संरक्षण, पुनर्भरण और पुनर्जीवन परियोजनाओं को वैज्ञानिक आधार प्रदान करेगा।

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42 हजार से अधिक जल स्रोतों का हो चुका है रिकॉर्ड

सर्वेक्षण के शुरुआती नतीजे बेहद दिलचस्प हैं। लघु सिंचाई विभाग के अनुसार अब तक राज्यभर में 42,553 से अधिक झरनों और प्राकृतिक जल स्रोतों का रिकॉर्ड तैयार किया जा चुका है। इनमें सबसे अधिक झरने अल्मोड़ा जिले में दर्ज किए गए हैं, जहां 9,600 से अधिक जल स्रोतों की पहचान हुई है।

इसके अलावा चमोली में 8,077, टिहरी में 4,415, उत्तरकाशी में 4,191 और चंपावत में 3,911 झरनों का रिकॉर्ड तैयार किया गया है। पौड़ी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, रुद्रप्रयाग और देहरादून में भी हजारों प्राकृतिक जल स्रोतों की पहचान हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि वन क्षेत्रों को सर्वे में शामिल किए जाने पर यह संख्या और अधिक बढ़ सकती है।

तकनीक की मदद से हो रही जियो-टैगिंग

इस Water Springs Survey को वैज्ञानिक और विश्वसनीय बनाने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। सर्वेक्षण दल मोबाइल एप्लिकेशन और जीपीएस तकनीक की सहायता से प्रत्येक जल स्रोत की जियो-टैगिंग कर रहे हैं।

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हर स्रोत की फोटो, लोकेशन, जल प्रवाह की स्थिति और स्थानीय उपयोग से जुड़ी जानकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्ज की जा रही है। इससे भविष्य में किसी भी जल स्रोत की निगरानी करना आसान होगा। साथ ही यह पता लगाया जा सकेगा कि कौन से स्रोत खतरे में हैं और किन क्षेत्रों में संरक्षण कार्यों की तत्काल आवश्यकता है।

जल सुरक्षा और भविष्य की नीति के लिए बनेगा आधार

विशेषज्ञों का मानना है कि यह सर्वेक्षण केवल आंकड़े जुटाने का काम नहीं है, बल्कि आने वाले वर्षों की जल नीति तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। हिमोत्थान संस्था के शुरुआती आकलन के अनुसार केवल टिहरी, पौड़ी और अल्मोड़ा जिलों में ही 36 हजार से अधिक झरने और गाड़-गदेरे मौजूद हो सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन और बढ़ती जल मांग के दौर में प्राकृतिक जल स्रोतों की वास्तविक स्थिति जानना बेहद जरूरी हो गया है। यही वजह है कि उत्तराखंड में चल रहा Water Springs Survey भविष्य में जल संरक्षण योजनाओं, ग्रामीण पेयजल परियोजनाओं और पर्यावरणीय प्रबंधन की रणनीतियों का महत्वपूर्ण आधार बनेगा। पहली बार तैयार हो रहा यह डेटाबेस न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश के लिए जल संसाधन प्रबंधन का एक नया मॉडल साबित हो सकता है।

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