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Lokhitkranti > उत्तराखंड > उत्तराखंड में ‘No Vehicle Day’ की तैयारी, बढ़ते Pollution और Traffic Crisis के बीच सरकार का बड़ा कदम
उत्तराखंड

उत्तराखंड में ‘No Vehicle Day’ की तैयारी, बढ़ते Pollution और Traffic Crisis के बीच सरकार का बड़ा कदम

Manisha
Last updated: 2026-05-15 10:34 पूर्वाह्न
Manisha Published 2026-05-15
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‘No Vehicle Day
उत्तराखंड में ‘No Vehicle Day’ की तैयारी, बढ़ते Pollution और Traffic Crisis के बीच सरकार का बड़ा कदम
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No Vehicle Day: उत्तराखंड सरकार अब राज्य में बढ़ते Pollution और Traffic Crisis को कम करने के लिए नई पहल की तैयारी में जुट गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईंधन बचाने और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने की अपील के बाद राज्य सरकार ने हफ्ते में एक दिन ‘No Vehicle Day’ लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इस योजना के तहत लोगों को सप्ताह में एक दिन निजी वाहन का इस्तेमाल न करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अभियान प्रभावी तरीके से लागू हुआ तो उत्तराखंड जैसे संवेदनशील और पर्यटन आधारित राज्य को बड़ा पर्यावरणीय लाभ मिल सकता है।

Contents
उत्तराखंड में तेजी से बढ़ रहे वाहनNo Vehicle Day से कैसे मिलेगा फायदा?Public Transport को मजबूत करना जरूरीस्वास्थ्य पर बढ़ता खतराजनता की भागीदारी से ही सफल होगा अभियान

उत्तराखंड लंबे समय से अपनी प्राकृतिक सुंदरता, स्वच्छ हवा और पहाड़ी पर्यावरण के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ती वाहन संख्या ने राज्य के शहरों और पहाड़ी इलाकों दोनों पर दबाव बढ़ा दिया है। देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी और ऋषिकेश जैसे शहरों में लगातार बढ़ता ट्रैफिक और खराब होती हवा अब लोगों की चिंता का बड़ा कारण बन चुका है।

उत्तराखंड में तेजी से बढ़ रहे वाहन

परिवहन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 35 लाख से अधिक वाहन पंजीकृत हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या दोपहिया वाहनों की है। इसके अलावा लाखों कारें, टैक्सी, बसें और मालवाहक वाहन रोजाना सड़कों पर चलते हैं। पर्यटन सीजन और चारधाम यात्रा के दौरान यह संख्या और ज्यादा बढ़ जाती है।

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विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में वाहनों से निकलने वाला धुआं वातावरण पर अधिक असर डालता है। यहां हवा का प्रवाह मैदानी क्षेत्रों से अलग होता है, जिससे प्रदूषक लंबे समय तक वातावरण में बने रहते हैं। यही वजह है कि देहरादून जैसे शहरों की Air Quality लगातार खराब हो रही है।

No Vehicle Day से कैसे मिलेगा फायदा?

पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि लोग सप्ताह में सिर्फ एक दिन निजी वाहन छोड़कर सार्वजनिक परिवहन, साइकिल या पैदल चलने को प्राथमिकता दें तो हजारों लीटर ईंधन की बचत हो सकती है। इससे Carbon Emission में कमी आएगी और हवा की गुणवत्ता सुधरेगी।

पर्यावरणविद् राजीव नयन बहुगुणा का कहना है कि राज्य में सबसे ज्यादा Pollution पुराने डीजल वाहनों, भारी ट्रकों और बड़ी संख्या में चलने वाले दोपहिया वाहनों से होता है। सुबह और शाम के समय शहरों में ट्रैफिक इतना बढ़ जाता है कि लोग घंटों जाम में फंसे रहते हैं। ऐसे में No Vehicle Day ट्रैफिक मैनेजमेंट में भी मददगार साबित हो सकता है।

उनका कहना है कि यदि सप्ताह में एक दिन भी वाहनों की संख्या कम हुई तो PM 2.5 और Nitrogen Oxide जैसे खतरनाक प्रदूषकों में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। इससे पर्यावरण के साथ-साथ लोगों की सेहत पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा।

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Public Transport को मजबूत करना जरूरी

विशेषज्ञ जय सिंह रावत का कहना है कि केवल निजी वाहन रोकने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए Public Transport System को मजबूत करना बेहद जरूरी है। यदि शहरों में इलेक्ट्रिक बसें, साझा टैक्सी, बेहतर बस सेवा और साइकिल ट्रैक जैसी सुविधाएं बढ़ाई जाएं, तो लोग स्वाभाविक रूप से निजी वाहनों का कम इस्तेमाल करेंगे।

उन्होंने कहा कि स्कूलों और दफ्तरों में भी साझा परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा दिया जा सकता है। कई स्कूल पहले से साझा वैन प्रणाली अपना रहे हैं, जिससे सड़क पर वाहनों की संख्या कम होती है। यदि सरकारी कार्यालय और निजी कंपनियां भी सप्ताह में एक दिन No Vehicle Day लागू करें, तो इसका बड़ा असर दिखाई दे सकता है।

स्वास्थ्य पर बढ़ता खतरा

डॉक्टरों का कहना है कि वायु प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरणीय समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। हरिद्वार के डॉक्टर केके त्रिपाठी के अनुसार, बच्चों और बुजुर्गों में सांस, एलर्जी और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।

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उन्होंने बताया कि वाहनों से निकलने वाला धुआं हवा की गुणवत्ता खराब कर रहा है, जिसका सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ता है। यदि वाहन कम होंगे तो लोगों को साफ हवा मिलेगी और बीमारियों का खतरा भी घटेगा।

डॉक्टरों का मानना है कि छोटी दूरी के लिए पैदल चलने, कार पूलिंग अपनाने और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ाने से लोगों की जीवनशैली भी बेहतर हो सकती है। इससे न केवल Pollution कम होगा बल्कि ईंधन की बचत और स्वास्थ्य लाभ दोनों मिलेंगे।

जनता की भागीदारी से ही सफल होगा अभियान

विशेषज्ञों का कहना है कि No Vehicle Day केवल सरकारी आदेश बनकर सफल नहीं हो सकता। इसके लिए लोगों की भागीदारी सबसे जरूरी होगी। यदि लोग स्वेच्छा से इस पहल का हिस्सा बनें और अपनी आदतों में बदलाव लाएं, तभी इसका वास्तविक असर दिखाई देगा।

उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां पर्यटन और प्राकृतिक संसाधन अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, वहां पर्यावरण संरक्षण और Sustainable Transport को प्राथमिकता देना समय की जरूरत माना जा रहा है। यदि अभी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में पहाड़ों की स्वच्छ हवा और प्राकृतिक सुंदरता भी प्रदूषण की चपेट में आ सकती है।

सरकार की इस पहल को फिलहाल एक सकारात्मक शुरुआत माना जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि राज्य में No Vehicle Day को किस तरह लागू किया जाता है और आम लोग इसे कितनी गंभीरता से अपनाते हैं।

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