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Lokhitkranti > उत्तराखंड > Indian Constitution Printing: देहरादून से जुड़ा है भारतीय संविधान का ऐतिहासिक अध्याय, यहीं छपी थीं पहली प्रतियां
उत्तराखंड

Indian Constitution Printing: देहरादून से जुड़ा है भारतीय संविधान का ऐतिहासिक अध्याय, यहीं छपी थीं पहली प्रतियां

Lokhit Kranti
Last updated: 2026-01-26 2:16 pm
Lokhit Kranti Published 2026-01-26
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Indian Constitution Printing
Indian Constitution Printing: देहरादून से जुड़ा है भारतीय संविधान का ऐतिहासिक अध्याय, यहीं छपी थीं पहली प्रतियां
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Indian Constitution Printing: आज देश 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। 15 अगस्त 1947 को आज़ादी मिलने के बाद भारत ने एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य बनने की दिशा में लंबा और ऐतिहासिक सफर तय किया। भारतीय संविधान के निर्माण में कुल 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन लगे और अंततः 26 जनवरी 1950 को संविधान देश में लागू हुआ। इसी दिन को हर वर्ष गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि Indian Constitution Printing की पहली मुद्रित प्रतियां कहां और कैसे तैयार की गई थीं? Indian Constitution Printing ऐतिहासिक प्रक्रिया में देहरादून की अहम भूमिका रही है।

Contents
हाथ से लिखा गया था संविधान, कला और धैर्य का अद्भुत उदाहरणIndian Constitution Printing की जिम्मेदारी क्यों मिली देहरादून को?फोटो लिथोग्राफिक तकनीक से छपी थीं पहली प्रतियांआज भी सुरक्षित है संविधान की पहली प्रकाशित प्रतिदेहरादून और लोकतंत्र का ऐतिहासिक संबंध

हाथ से लिखा गया था संविधान, कला और धैर्य का अद्भुत उदाहरण

भारतीय संविधान दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे, जबकि प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर थे। संविधान सभा में कुल 299 सदस्य शामिल थे, जिन्होंने गहन विचार-विमर्श के बाद इस ऐतिहासिक दस्तावेज को आकार दिया। खास बात यह रही कि संविधान को पहले हाथ से लिखा गया। प्रसिद्ध कैलिग्राफर प्रेम नारायण रायजादा ने संविधान को सुंदर इटैलिक शैली में लिखा और प्रत्येक पृष्ठ को कलात्मक डिजाइनों से सजाया। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि भारतीय कला और धरोहर का भी अनूठा नमूना बन गया।

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Indian Constitution Printing की जिम्मेदारी क्यों मिली देहरादून को?

जब संविधान का मूल स्वरूप तैयार हो गया, तब उसकी प्रतियां छापने की चुनौती सामने आई। चूंकि यह असाधारण रूप से बड़ा और संवेदनशील दस्तावेज था, इसलिए इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाली और अत्याधुनिक छपाई तकनीक की आवश्यकता थी। उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार और इतिहास के जानकार शीशपाल गुसाईं के अनुसार, उस समय देश में सबसे उन्नत प्रिंटिंग सुविधाएं देहरादून स्थित सर्वे ऑफ इंडिया (Survey of India) प्रेस में उपलब्ध थीं। यही कारण था कि Indian Constitution Printing की पहली प्रतियों की छपाई का कार्य सर्वे ऑफ इंडिया को सौंपा गया। उन्होंने बताया कि यह जिम्मेदारी सर्वे ऑफ इंडिया के लिए भी गर्व का विषय थी। इस Indian Constitution Printing ऐतिहासिक कार्य के साथ देहरादून का नाम देश के सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज से हमेशा के लिए जुड़ गया।

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फोटो लिथोग्राफिक तकनीक से छपी थीं पहली प्रतियां

Indian Constitution Printing की छपाई के लिए उस समय की अत्याधुनिक फोटो लिथोग्राफिक तकनीक का उपयोग किया गया। यह तकनीक हाथ से लिखे गए मूल पाठ की हूबहू प्रतिकृति तैयार करने में सक्षम थी, जिससे लेखन की सुंदरता और शुद्धता बनी रही। देहरादून के हाथीबड़कला क्षेत्र में स्थित सर्वे ऑफ इंडिया प्रेस में Indian Constitution Printing की लगभग एक हजार प्रतियां मुद्रित की गई थीं। यह प्रक्रिया अत्यंत सावधानी और गोपनीयता के साथ पूरी की गई, क्योंकि यह दस्तावेज राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा हुआ था।

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आज भी सुरक्षित है संविधान की पहली प्रकाशित प्रति

देहरादून से जुड़ा यह ऐतिहासिक तथ्य और भी खास इसलिए बन जाता है, क्योंकि भारतीय संविधान की पहली प्रकाशित प्रति आज भी सर्वे ऑफ इंडिया, देहरादून में सुरक्षित रखी गई है। यह प्रति एक अमूल्य धरोहर के रूप में संरक्षित है। वहीं, संविधान की मूल हस्तलिखित प्रति दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में रखी गई है। इसके साथ ही सर्वे ऑफ इंडिया परिसर में वे मशीनें भी आज तक सुरक्षित हैं, जिनका उपयोग संविधान की छपाई में किया गया था। ये मशीनें आज इतिहास की जीवित गवाह के रूप में देखी जाती हैं।

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देहरादून और लोकतंत्र का ऐतिहासिक संबंध

गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह जानना गर्व का विषय है कि भारतीय लोकतंत्र की नींव से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अध्याय देहरादून में लिखा गया। यह शहर न केवल प्रशासनिक और शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि देश के संवैधानिक इतिहास में भी इसकी विशेष पहचान है। देहरादून में छपी संविधान की प्रतियां आज भी हमें उस दौर की मेहनत, तकनीकी दक्षता और राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण की याद दिलाती हैं।

77वें गणतंत्र दिवस पर जब देश संविधान और लोकतंत्र के मूल्यों का उत्सव मना रहा है, तब देहरादून की यह ऐतिहासिक भूमिका हमें यह एहसास कराती है कि राष्ट्र निर्माण में कई ऐसे अनसुने केंद्र रहे हैं, जिन्होंने चुपचाप इतिहास रचा।

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