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Lokhitkranti > उत्तराखंड > उत्तराखंड वन विभाग में गहराया संकट, करोड़ों के बजट पर Forest Department Accountant Shortage का साया
उत्तराखंड

उत्तराखंड वन विभाग में गहराया संकट, करोड़ों के बजट पर Forest Department Accountant Shortage का साया

Manisha
Last updated: 2026-06-25 4:56 अपराह्न
Manisha Published 2026-06-25
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Officials discussing financial management challenges in Forest Department accountant shortage and vacant posts affecting budget monitoring.
Officials discussing financial management challenges in Forest Department accountant shortage and vacant posts affecting budget monitoring.
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Forest Department Accountant Shortage: उत्तराखंड का वन विभाग इन दिनों जंगलों के संरक्षण से ज्यादा अपने वित्तीय ढांचे को लेकर चर्चा में है। प्रदेश के लगभग 70 प्रतिशत भूभाग पर फैले वन क्षेत्रों की जिम्मेदारी संभालने वाले विभाग के सामने अब एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। यह चुनौती है Forest Department Accountant Shortage की, जिसने विभागीय कार्यप्रणाली और वित्तीय प्रबंधन दोनों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।

Contents
करोड़ों के बजट के बावजूद लेखाकारों की कमी34 स्वीकृत पदों में से 21 खालीतबादला सूची ने बढ़ाई परेशानीकिन वन प्रभागों पर पड़ा असर?असिस्टेंट अकाउंटेंट्स के भरोसे चल रहा कामक्यों अहम है अकाउंटेंट की भूमिका?वन विभाग ने उठाई मांगसमाधान की ओर सरकार की नजर

वन विभाग के पास करोड़ों रुपये का बजट, दर्जनों विकास योजनाएं और हजारों कर्मचारियों की प्रशासनिक जिम्मेदारी है, लेकिन इन सबका लेखा-जोखा रखने वाले अकाउंटेंट्स की भारी कमी विभाग के लिए गंभीर समस्या बनती जा रही है। हाल ही में जारी तबादला सूची के बाद यह संकट और अधिक गहरा गया है।

करोड़ों के बजट के बावजूद लेखाकारों की कमी

उत्तराखंड वन विभाग राज्य के सबसे महत्वपूर्ण विभागों में से एक माना जाता है। वन संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा, इको-टूरिज्म, कैंपा योजनाएं और विभिन्न पर्यावरणीय परियोजनाओं का संचालन इसी विभाग के माध्यम से किया जाता है।

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वर्ष 2026-27 के लिए राज्य सरकार ने वन विभाग को 131.68 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है। वहीं केंद्र सरकार की कैंपा योजना के तहत विभाग को 253 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि प्राप्त हुई है। इस प्रकार विभाग के पास कुल लगभग 384.68 करोड़ रुपये की वित्तीय जिम्मेदारी है। इसके बावजूद Forest Department Accountant Shortage की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है।

34 स्वीकृत पदों में से 21 खाली

आंकड़ों के अनुसार वन विभाग में अकाउंटेंट के कुल 34 पद स्वीकृत हैं। इनमें से 21 पद लंबे समय से रिक्त पड़े हुए हैं। यानी विभाग के पास वर्तमान में केवल 13 नियमित अकाउंटेंट ही कार्यरत हैं।

इसका सीधा अर्थ यह है कि विभाग अपने आधे से भी कम वित्तीय स्टाफ के सहारे काम चला रहा है। वित्तीय प्रबंधन, भुगतान, वेतन वितरण और बजट मॉनिटरिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्य सीमित कर्मचारियों के भरोसे संचालित किए जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि Forest Department Accountant Shortage जैसी स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो विभागीय कार्यों की गति और पारदर्शिता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

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तबादला सूची ने बढ़ाई परेशानी

वन विभाग की मुश्किलें केवल रिक्त पदों तक सीमित नहीं हैं। हाल ही में निदेशालय विभागीय लेखा द्वारा जारी स्थानांतरण सूची ने भी विभाग की चिंताओं को बढ़ा दिया है। तबादलों के तहत वन विभाग से जुड़े 9 लेखाकारों को अन्य स्थानों पर भेज दिया गया, जबकि बदले में केवल 4 नए लेखाकार विभाग को मिले। परिणामस्वरूप विभाग के पास पांच और अकाउंटेंट कम हो गए।

इस स्थिति ने Forest Department Accountant Shortage को और अधिक गंभीर बना दिया है। कई वन प्रभाग अब सीमित मानव संसाधनों के साथ वित्तीय कार्यों को संभालने के लिए मजबूर हैं।

किन वन प्रभागों पर पड़ा असर?

स्थानांतरण का असर कई महत्वपूर्ण वन इकाइयों पर देखने को मिला है। इनमें पिथौरागढ़ वन प्रभाग, चकराता वन प्रभाग, देहरादून वन प्रभाग, तराई केंद्रीय वन प्रभाग रुद्रपुर, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, रामनगर वन प्रभाग, तराई पूर्वी वन प्रभाग और मसूरी वन प्रभाग शामिल हैं।

इन इकाइयों में वित्तीय लेन-देन और परियोजनाओं का दायरा काफी बड़ा है। ऐसे में Forest Department Accountant Shortage का असर सीधे योजनाओं के क्रियान्वयन और वित्तीय निगरानी पर पड़ सकता है।

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असिस्टेंट अकाउंटेंट्स के भरोसे चल रहा काम

हालांकि विभाग के लिए राहत की बात यह है कि उसके पास सहायक लेखाकारों की व्यवस्था मौजूद है। फिलहाल इन्हीं कर्मचारियों के माध्यम से बजट प्रबंधन, बिल सत्यापन और भुगतान जैसी प्रक्रियाएं पूरी की जा रही हैं।

लेकिन विभागीय अधिकारियों का मानना है कि नियमित अकाउंटेंट्स की कमी को केवल असिस्टेंट स्टाफ के भरोसे लंबे समय तक पूरा नहीं किया जा सकता। वित्तीय जवाबदेही और ऑडिट से जुड़े मामलों में अनुभवी अकाउंटेंट्स की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।

क्यों अहम है अकाउंटेंट की भूमिका?

वन विभाग में अकाउंटेंट केवल हिसाब-किताब रखने का काम नहीं करते, बल्कि विभाग की पूरी वित्तीय व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं।

उन्हें बजट आवंटन, खर्च की निगरानी, कर्मचारियों के वेतन और पेंशन भुगतान, ठेकेदारों के बिल सत्यापन, वित्तीय रिपोर्ट तैयार करने और ऑडिट से जुड़े दस्तावेजों का प्रबंधन करना होता है।

इसके अलावा कैंपा, इको-टूरिज्म और वन्यजीव संरक्षण जैसी योजनाओं में खर्च की गई राशि का रिकॉर्ड रखना भी उनकी जिम्मेदारी होती है। ऐसे में Forest Department Accountant Shortage का असर विभाग के हर स्तर पर महसूस किया जा रहा है।

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वन विभाग ने उठाई मांग

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग ने निदेशालय विभागीय लेखा को पत्र लिखकर अतिरिक्त लेखाकार उपलब्ध कराने की मांग की है।

सीसीएफ एचआरडी पीके पात्रो के अनुसार विभाग पहले से ही भारी कमी का सामना कर रहा है। यदि रिक्त पदों को जल्द नहीं भरा गया तो वित्तीय प्रबंधन और प्रशासनिक कार्यों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

वहीं वन दारोगा संगठन ने भी सरकार से जल्द नियुक्तियां करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि Forest Department Accountant Shortage विभाग की कार्यक्षमता को प्रभावित कर रही है और इसे प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाना चाहिए।

समाधान की ओर सरकार की नजर

विशेषज्ञों का मानना है कि वन विभाग जैसी महत्वपूर्ण संस्था में वित्तीय स्टाफ की कमी केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं बल्कि नीति निर्माण और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़ा विषय है।

यदि सरकार जल्द ही रिक्त पदों पर नियुक्तियां करती है तो विभाग की वित्तीय व्यवस्था मजबूत होगी और विकास योजनाओं के संचालन में भी गति आएगी। लेकिन यदि Forest Department Accountant Shortage लंबे समय तक बनी रहती है तो करोड़ों रुपये की योजनाओं और परियोजनाओं के प्रबंधन में कठिनाइयां बढ़ सकती हैं।

उत्तराखंड वन विभाग इस समय जंगलों की सुरक्षा के साथ-साथ अपने वित्तीय ढांचे को मजबूत रखने की चुनौती से भी जूझ रहा है। करोड़ों रुपये के बजट और व्यापक जिम्मेदारियों वाले विभाग में लेखाकारों की कमी अब गंभीर प्रशासनिक मुद्दा बन चुकी है। आने वाले समय में सरकार और संबंधित विभाग इस समस्या का कितना प्रभावी समाधान निकालते हैं, इस पर वन विभाग की कार्यक्षमता और योजनाओं का भविष्य काफी हद तक निर्भर करेगा।

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