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Lokhitkranti > बिज़नेस > SIP Investment: रुपये की कमजोरी पर छिड़ी नई बहस, क्या Mutual Funds की वजह से बढ़ा दबाव?
बिज़नेस

SIP Investment: रुपये की कमजोरी पर छिड़ी नई बहस, क्या Mutual Funds की वजह से बढ़ा दबाव?

Manisha
Last updated: 2026-05-24 6:57 पूर्वाह्न
Manisha Published 2026-05-24
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SIP Investment
SIP Investment: रुपये की कमजोरी पर छिड़ी नई बहस, क्या Mutual Funds की वजह से बढ़ा दबाव?
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SIP Investment: भारतीय शेयर बाजार में लगातार मजबूत घरेलू निवेश और दूसरी तरफ विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच अब एक नई बहस शुरू हो गई है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या SIP Investment के जरिए आने वाला भारी पैसा विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार से आसानी से बाहर निकलने का मौका दे रहा है? इसी के साथ रुपये की कमजोरी को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।

Contents
SIP Investment पर उठे सवालसमीर अरोड़ा ने किया SIP का बचावGold और Foreign Investment क्यों बने चिंता?क्यों कमजोर हो रहा भारतीय रुपया?SIP Investment क्यों बन रहा पसंदीदा विकल्प?आगे क्या कहता है बाजार?

हाल ही में ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म Jefferies की एक रिपोर्ट सामने आने के बाद यह मुद्दा चर्चा में आया। रिपोर्ट में कहा गया कि भारतीय रुपये पर दबाव का बड़ा कारण कमजोर पूंजी प्रवाह है। इसके बाद बाजार विशेषज्ञों और फंड मैनेजर्स के बीच बहस शुरू हो गई कि क्या लगातार बढ़ रहे SIP Investment का अप्रत्यक्ष असर रुपये की गिरावट पर पड़ रहा है।

SIP Investment पर उठे सवाल

पिछले कुछ वर्षों में भारत में म्यूचुअल फंड निवेश तेजी से बढ़ा है। खासतौर पर SIP Investment छोटे निवेशकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ है। हर महीने लाखों लोग नियमित निवेश के जरिए इक्विटी बाजार में पैसा लगा रहे हैं।

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Association of Mutual Funds in India (AMFI) के आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2026 में इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में रिकॉर्ड 38,503 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो आया। अप्रैल 2026 में भी यह आंकड़ा 38,410 करोड़ रुपये के ऊंचे स्तर पर बना रहा।

इसी दौरान विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FII ने भारतीय बाजार से भारी निकासी की। Jefferies की रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो वर्षों में विदेशी निवेशकों ने करीब 78 अरब डॉलर भारतीय इक्विटी बाजार से निकाल लिए।

विश्लेषकों का कहना है कि घरेलू निवेशकों के मजबूत SIP Investment ने बाजार को गिरने से बचाए रखा। हालांकि इसी बात को लेकर कुछ विशेषज्ञों ने सवाल उठाया कि क्या घरेलू पैसा बाजार में लगातार सपोर्ट न देता, तो विदेशी निवेशकों के लिए इतनी आसानी से बाहर निकलना संभव नहीं होता।

समीर अरोड़ा ने किया SIP का बचाव

इस पूरे विवाद के बीच Helios Capital के संस्थापक और अनुभवी निवेशक समीर अरोड़ा ने SIP Investment का जोरदार समर्थन किया है। उनका कहना है कि SIP को रुपये की कमजोरी से जोड़ना पूरी तरह गलत सोच है।

उन्होंने साफ कहा कि अगर लोग SIP में पैसा नहीं लगाते, तो वह पैसा कहीं और जाता। ऐसे में यह मान लेना कि उससे रुपये को मजबूती मिलती, व्यावहारिक नहीं है।

समीर अरोड़ा के मुताबिक अगर निवेशक SIP की बजाय विदेशी बाजारों में निवेश करते, तो डॉलर की मांग और बढ़ती। इससे रुपये पर और ज्यादा दबाव आता। उन्होंने यह भी कहा कि सोने में निवेश भी रुपये के लिए फायदेमंद नहीं माना जा सकता क्योंकि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश सोना आयात करता है।

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Gold और Foreign Investment क्यों बने चिंता?

भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड उपभोक्ताओं में शामिल है। ऐसे में जब लोग ज्यादा सोना खरीदते हैं तो देश का Import Bill बढ़ता है। इससे Current Account Deficit पर असर पड़ता है और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।

समीर अरोड़ा का कहना है कि SIP Investment के जरिए पैसा देश के वित्तीय बाजार में ही बना रहता है, जबकि विदेशी निवेश या गोल्ड खरीदारी से डॉलर की मांग बढ़ सकती है।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर लोग यह पैसा खर्च कर देते, जैसे लग्जरी सामान, मोबाइल या विदेशी प्रोडक्ट्स पर, तब भी रुपये को कोई विशेष फायदा नहीं मिलता। इसलिए SIP को रुपये की कमजोरी का कारण बताना सही नहीं है।

क्यों कमजोर हो रहा भारतीय रुपया?

इस साल भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करीब 7 फीसदी कमजोर हो चुका है। डॉलर के मुकाबले रुपया 96 के स्तर को पार कर गया है। इसके पीछे कई वैश्विक कारण माने जा रहे हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहने, पश्चिम एशिया तनाव और विदेशी निवेशकों की बिकवाली से Emerging Markets की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।

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हालांकि Jefferies की रिपोर्ट में कहा गया कि रुपये में कमजोरी के बावजूद भारतीय बाजार में घरेलू निवेशकों का भरोसा मजबूत बना हुआ है। यही वजह है कि बाजार में बड़ी गिरावट देखने को नहीं मिली।

SIP Investment क्यों बन रहा पसंदीदा विकल्प?

बीते कुछ वर्षों में भारतीय निवेशकों की सोच तेजी से बदली है। पहले लोग बैंक FD, सोना और रियल एस्टेट को सुरक्षित निवेश मानते थे, लेकिन अब SIP Investment लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न का विकल्प बनता जा रहा है।

वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि SIP निवेश अनुशासित तरीके से संपत्ति बनाने का मजबूत माध्यम है। इसमें छोटे-छोटे निवेश के जरिए लंबे समय में बड़ा फंड तैयार किया जा सकता है।

यही वजह है कि युवा निवेशकों के बीच Mutual Funds और SIP की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और फिनटेक ऐप्स ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है।

आगे क्या कहता है बाजार?

Jefferies का मानना है कि अगर भारतीय बाजार का वैल्यूएशन आकर्षक होता है और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव कम होते हैं, तो विदेशी निवेशकों की वापसी संभव है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत ग्रोथ, बढ़ती घरेलू बचत और लगातार बढ़ रहे SIP Investment आने वाले वर्षों में शेयर बाजार को स्थिरता दे सकते हैं।

फिलहाल, रुपये की कमजोरी और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच SIP Investment को लेकर छिड़ी बहस ने यह जरूर दिखा दिया है कि भारतीय निवेशकों की भूमिका अब बाजार में पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुकी है।

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