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RBI: डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट थामने के लिए RBI का सख्त कदम, नवंबर में 9.7 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री

Lokhit Kranti
Last updated: 2026-01-22 9:01 pm
Lokhit Kranti Published 2026-01-22
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RBI
RBI: डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट थामने के लिए RBI का सख्त कदम, नवंबर में 9.7 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री
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RBI: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में लगातार जारी कमजोरी पर लगाम लगाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार में आक्रामक हस्तक्षेप किया है। केंद्रीय बैंक के मासिक बुलेटिन के अनुसार, नवंबर महीने में आरबीआई ने कुल 9.7 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की। आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान RBI ने 14.35 अरब डॉलर की खरीद की, जबकि 24.06 अरब डॉलर की बिक्री की गई। इससे पहले अक्टूबर में भी आरबीआई ने रुपये को सहारा देने के लिए बाजार में करीब 11.88 अरब डॉलर की बिक्री की थी।

Contents
नवंबर में रुपये पर लगातार बना रहा दबावरिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपयावैश्विक संकेतों का असर भारतीय मुद्रा पररुपये की कमजोरी के प्रमुख कारणअमेरिकी बॉन्ड यील्ड ने बढ़ाई चिंताRBI की रणनीति और बाजार पर असरआम लोगों पर रुपये की गिरावट का असरआगे क्या रह सकता है रुझान

नवंबर में रुपये पर लगातार बना रहा दबाव

नवंबर महीने के दौरान रुपये पर दबाव लगातार बना रहा। 21 नवंबर को रुपया डॉलर के मुकाबले 89.49 के स्तर तक फिसल गया था, जिसे उस समय का ऐतिहासिक निचला स्तर माना गया। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका से जुड़े व्यापारिक और आर्थिक मोर्चे पर बढ़ती अनिश्चितता तथा विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी ने रुपये की कमजोरी को और गहरा किया। पूरे नवंबर महीने में भारतीय मुद्रा में लगभग 0.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

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रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया

हालात और ज्यादा बिगड़ते हुए हाल ही में बुधवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 91.7425 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। यह पिछले दो महीनों में एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है। वैश्विक बाजारों में बने “रिस्क-ऑफ” माहौल, यानी निवेशकों का जोखिम से दूर रहना, और घरेलू शेयर बाजार से पूंजी की लगातार निकासी ने दक्षिण एशियाई मुद्राओं, खासकर भारतीय रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाला है।

वैश्विक संकेतों का असर भारतीय मुद्रा पर

विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण निवेशक सुरक्षित विकल्पों की तलाश में हैं। ऐसे में अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड को प्राथमिकता मिल रही है। इसका सीधा असर उभरते बाजारों की मुद्राओं पर पड़ रहा है। भारतीय रुपया भी इसी वैश्विक दबाव से अछूता नहीं रह पाया है।

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रुपये की कमजोरी के प्रमुख कारण

बाजार जानकारों के अनुसार, मेटल और अन्य कच्चे माल के आयातकों की ओर से डॉलर की बढ़ती मांग रुपये की कमजोरी का एक बड़ा कारण है। जब आयातक ज्यादा डॉलर खरीदते हैं, तो बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे रुपया दबाव में आ जाता है।

इसके अलावा, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) द्वारा भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से पूंजी निकालना भी रुपये पर नकारात्मक असर डाल रहा है। निवेशक जब अपना पैसा भारत से निकालते हैं, तो वे रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं, जिससे भारतीय मुद्रा और कमजोर होती है।

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ने बढ़ाई चिंता

रुपये की गिरावट के पीछे एक अहम वजह अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर बढ़ती यील्ड भी है। जैसे-जैसे अमेरिकी बॉन्ड अधिक रिटर्न देने लगते हैं, वैश्विक निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिका जैसे सुरक्षित और ज्यादा यील्ड वाले विकल्पों की ओर रुख करते हैं। इससे डॉलर मजबूत होता है और रुपये जैसी मुद्राओं पर दबाव बढ़ जाता है।

RBI की रणनीति और बाजार पर असर

RBI द्वारा डॉलर की बिक्री का मकसद बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना और रुपये में अचानक आई तेज गिरावट को थामना है। आरबीआई आमतौर पर किसी तय स्तर को बचाने के बजाय, अस्थिरता को कम करने पर ध्यान देता है। हालांकि, लगातार हस्तक्षेप से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव भी बढ़ सकता है, जिसे लेकर विशेषज्ञ सतर्कता बरतने की सलाह दे रहे हैं।

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आम लोगों पर रुपये की गिरावट का असर

रुपये में गिरावट का सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ता है। कमजोर रुपया आयात को महंगा बना देता है, जिससे कच्चा तेल, खाद्य तेल और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका नतीजा महंगाई के रूप में सामने आता है, जिससे घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

इसके साथ ही, विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और उनके परिवारों पर भी इसका असर पड़ता है। डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से ट्यूशन फीस, रहने और अन्य खर्च ज्यादा महंगे हो जाते हैं।

आगे क्या रह सकता है रुझान

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में रुपये की चाल काफी हद तक वैश्विक संकेतों, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों और विदेशी निवेशकों के रुख पर निर्भर करेगी। यदि वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बनी रहती है, तो रुपये पर दबाव जारी रह सकता है। ऐसे में RBI की भूमिका और उसकी रणनीति बाजार के लिए बेहद अहम बनी रहेगी।

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