बिहार के दरभंगा जिले में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस बार विवाद का कारण PhD Course Work Exam बना है, जिसे लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन पर नियमों और निर्धारित प्रक्रियाओं की अनदेखी करने के आरोप लगे हैं। अकादमिक जगत के कई विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने परीक्षा प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
पीएचडी जैसे उच्च शैक्षणिक कार्यक्रमों में पारदर्शिता और गुणवत्ता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
PhD Course Work Exam को विभागीय स्तर पर कराने पर उठे सवाल
जानकारी के अनुसार पैट-2023 से जुड़े PhD Course Work Exam का आयोजन विभागीय स्तर पर किया गया। आरोप है कि परीक्षा के लिए न तो केंद्रीकृत व्यवस्था अपनाई गई और न ही सामान्य परीक्षाओं की तरह फार्म भरवाने, प्रवेश पत्र जारी करने तथा निर्धारित परीक्षा केंद्र तय करने जैसी प्रक्रियाओं का पालन किया गया।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि राज्य के अधिकांश विश्वविद्यालयों में पीएचडी कोर्स वर्क परीक्षा निर्धारित नियमों के अनुसार आयोजित की जाती है। वहां अभ्यर्थियों को परीक्षा फार्म भरना होता है, प्रवेश पत्र जारी किए जाते हैं और परीक्षा अलग केंद्रों पर पारदर्शी ढंग से कराई जाती है।
इसके विपरीत मिथिला विश्वविद्यालय में PhD Course Work Exam को लेकर अपनाई गई प्रक्रिया को लेकर कई तरह की शंकाएं व्यक्त की जा रही हैं।
PhD Course Work Exam के परिणाम ने बढ़ाई चर्चा
चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि परीक्षा में शामिल सभी अभ्यर्थियों को उत्तीर्ण घोषित कर दिया गया। शिक्षा जगत के कई लोगों का मानना है कि किसी भी परीक्षा में सौ प्रतिशत सफलता असामान्य स्थिति मानी जाती है और इससे प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
शिक्षाविदों का कहना है कि PhD Course Work Exam का उद्देश्य शोधार्थियों की शैक्षणिक क्षमता का मूल्यांकन करना होता है। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया का निष्पक्ष, गोपनीय और मानकों के अनुरूप होना बेहद आवश्यक है।
कई शिक्षकों और बुद्धिजीवियों ने इस पूरे घटनाक्रम पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि यदि नियमों का पालन नहीं किया गया तो भविष्य में शोध की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
PhD Course Work Exam में क्या कहते हैं नियम?
विशेषज्ञों के अनुसार पीएचडी रेगुलेशन में स्पष्ट प्रावधान हैं कि छह माह का नियमित कोर्स वर्क पूरा करने और न्यूनतम 75 प्रतिशत उपस्थिति हासिल करने वाले शोधार्थी ही परीक्षा में बैठने के पात्र होते हैं।
इसके अलावा PhD Course Work Exam में गोपनीयता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए संबंधित विभाग के शिक्षकों की प्रत्यक्ष भूमिका सीमित रखी जाती है। कई विश्वविद्यालयों में परीक्षा केंद्र भी विभाग से अलग बनाए जाते हैं ताकि किसी प्रकार का हितों का टकराव न हो।
नियमों के अनुसार परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक प्राप्त करना आवश्यक होता है। असफल अभ्यर्थियों को अगले सत्र में एक और अवसर प्रदान किया जाता है।
PhD Course Work Exam विवाद पर विशेषज्ञों की चिंता
प्रो. अखिलेश मिश्रा, डॉ. प्रभोद कुमार और नितेश चंद्र समेत कई शिक्षाविदों ने कहा कि देश के अनेक विश्वविद्यालय पहले भी पीएचडी नियमों के उल्लंघन के कारण विवादों में आ चुके हैं। ऐसे मामलों में डिग्रियों की विश्वसनीयता तक प्रभावित हुई है।
उनका कहना है कि PhD Course Work Exam जैसे महत्वपूर्ण शैक्षणिक चरण में यदि पारदर्शिता नहीं रहेगी तो शोध प्रणाली की साख को नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने संबंधित एजेंसियों से पूरे मामले की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
PhD Course Work Exam से जुड़ी पुरानी शिकायतें भी चर्चा में
विश्वविद्यालय में पीएचडी प्रक्रिया को लेकर विवाद कोई नया विषय नहीं है। विभिन्न एजेंसियों के पास पहले से कई शिकायतें लंबित बताई जा रही हैं। इनमें प्रवेश प्रक्रिया, सीटों की संख्या, शोध निर्देशन और अन्य प्रशासनिक मामलों से जुड़े आरोप शामिल हैं।
शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि PhD Course Work Exam विवाद ने एक बार फिर विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली को चर्चा में ला दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि प्रशासन इन आरोपों पर क्या कदम उठाता है और क्या किसी स्तर पर जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।


