Air Pollution Crisis: उत्तराखंड के श्रीनगर गढ़वाल और आसपास के हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बिगड़ती वायु गुणवत्ता ने वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय की हिमालयी वातावरणीय एवं अंतरिक्ष भौतिकी शोध प्रयोगशाला द्वारा जारी “चतुर्थ सूचना बुलेटिन” में मई 2026 के दौरान बढ़ते Air Pollution Crisis, Heat Stress, Black Carbon और वनाग्नि के गंभीर प्रभावों को लेकर बड़ा खुलासा किया गया है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हिमालयी पारिस्थितिकी, जल स्रोतों और मानव स्वास्थ्य पर इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
मई में तेजी से बिगड़ी वायु गुणवत्ता
शोध रिपोर्ट के अनुसार 6 मई से 20 मई 2026 के बीच श्रीनगर गढ़वाल क्षेत्र में Air Pollution Crisis लगातार गंभीर होता गया। शुरुआती दिनों में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 83 से 116 के बीच रहा, जिसे “Moderate” श्रेणी में रखा गया। लेकिन कुछ ही दिनों में स्थिति तेजी से खराब हुई और 10 मई तक AQI बढ़कर 215 पहुंच गया, जो “Poor” श्रेणी में दर्ज किया गया।
सबसे चिंताजनक स्थिति 19 और 20 मई को सामने आई। 19 मई को AQI लगभग 356 रिकॉर्ड किया गया, जबकि 20 मई की सुबह यह आंकड़ा 390 तक पहुंच गया। वैज्ञानिकों के अनुसार यह स्तर मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है और लंबे समय तक ऐसे वातावरण में रहना गंभीर बीमारियों को जन्म दे सकता है।
लोगों के स्वास्थ्य पर बढ़ रहा खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते Air Pollution Crisis का सीधा असर आम लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि खराब वायु गुणवत्ता के कारण सांस लेने में दिक्कत, आंखों में जलन, गले में खराश, एलर्जी, अस्थमा और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
विशेष रूप से बच्चे, बुजुर्ग और पहले से श्वसन रोगों से पीड़ित लोग सबसे ज्यादा जोखिम में हैं। डॉक्टरों का कहना है कि लगातार प्रदूषित हवा में रहने से हृदय रोग और फेफड़ों की क्षमता पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।
तापमान में रिकॉर्ड बढ़ोतरी से बढ़ा Heat Stress
रिपोर्ट में केवल Air Pollution Crisis ही नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ते तापमान को भी गंभीर संकेत माना गया है। अध्ययन के मुताबिक 7 मई को क्षेत्र का अधिकतम तापमान लगभग 27 डिग्री सेल्सियस था, जो 19 मई तक बढ़कर करीब 39 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया।
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हिमालयी घाटी क्षेत्रों में इतनी तेज तापमान वृद्धि को वैज्ञानिकों ने “Heat Stress Condition” बताया है। विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव सामान्य मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन के स्पष्ट संकेत हैं। बढ़ती गर्मी के साथ आर्द्रता भी 70 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई, जिससे उमस और मौसमीय अस्थिरता में बढ़ोतरी हुई।
Black Carbon बना सबसे बड़ा खतरा
अध्ययन का सबसे गंभीर पहलू Black Carbon के स्तर में रिकॉर्ड वृद्धि माना जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार 6 मई को Black Carbon का औसत स्तर लगभग 512 ng/m³ था, जो 8 मई तक बढ़कर 914 ng/m³ पहुंच गया। वहीं 9 मई को यह स्तर 8502 ng/m³ तक रिकॉर्ड किया गया।
19 और 20 मई के दौरान भी Black Carbon का औसत स्तर करीब 1928 ng/m³ दर्ज हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि यह अत्यंत सूक्ष्म कार्बन कण होते हैं, जो वातावरण में गर्मी को बढ़ाने का काम करते हैं। हिमालयी क्षेत्रों में इनका प्रभाव और भी खतरनाक माना जाता है क्योंकि इससे ग्लेशियर तेजी से पिघल सकते हैं।
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वनाग्नि और बायोमास बर्निंग से बढ़ा संकट
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि मई के दौरान जंगलों में आग और Biomass Burning की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई। कई दिनों में Biomass Burning का प्रतिशत 60 प्रतिशत से अधिक दर्ज किया गया।
विशेषज्ञों के मुताबिक जंगलों में लगने वाली आग से निकलने वाला धुआं और कार्बन कण Air Pollution Crisis को और गंभीर बना रहे हैं। इससे न केवल वायु गुणवत्ता खराब हो रही है बल्कि हिमालयी जैव विविधता, जल स्रोत और कृषि प्रणाली पर भी असर पड़ रहा है।
वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी
भौतिकी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर त्रिलोक चंद्र उपाध्याय ने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान का उद्देश्य केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज और पर्यावरण संरक्षण के लिए भी इसका उपयोग जरूरी है।
वहीं शोध का नेतृत्व कर रहे डॉ. आलोक चंद्र गौतम और उनकी टीम ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि वनाग्नि नियंत्रण, स्वच्छ ऊर्जा उपयोग, वैज्ञानिक निगरानी और सतत पर्यावरणीय प्रबंधन की दिशा में जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरणीय संकट और गहरा सकता है।
विशेषज्ञों ने कहा कि बढ़ता Air Pollution Crisis केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य, जल संसाधनों और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है। ऐसे में सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों और आम लोगों को मिलकर इस चुनौती से निपटने की जरूरत है।
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