Disaster Hotspot: उत्तराखंड में हर साल मानसून अपने साथ तबाही की कहानियां लेकर आता है, लेकिन इस बार राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग पहले से ज्यादा सतर्क दिखाई दे रहा है. हाल ही में हुए विस्तृत सर्वे में उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ को राज्य के सबसे बड़े Disaster Hotspot जिलों के रूप में चिन्हित किया गया है. सैटेलाइट इमेजरी और भू-वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर तैयार रिपोर्ट ने साफ किया है कि आने वाले वर्षों में इन इलाकों में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा और बढ़ सकता है.
राज्य सरकार अब मानसून से पहले इन जिलों के संवेदनशील क्षेत्रों का ड्रोन सर्वे कराने जा रही है, ताकि संभावित खतरे वाले इलाकों की पहचान कर समय रहते सुरक्षा इंतजाम किए जा सकें. विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी भूगर्भीय संरचना, जलवायु परिवर्तन और अनियोजित विकास गतिविधियों ने इन जिलों को गंभीर Disaster Hotspot में बदल दिया है.
उत्तरकाशी क्यों बना सबसे बड़ा Disaster Hotspot?
सीमांत उत्तरकाशी जिला लंबे समय से प्राकृतिक आपदाओं का केंद्र रहा है. यहां बादल फटना, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और भूकंप जैसी घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं. साल 1991 का विनाशकारी भूकंप आज भी लोगों की यादों में जिंदा है. रिक्टर स्केल पर 6.8 तीव्रता वाले इस भूकंप ने हजारों घर तबाह कर दिए थे और सैकड़ों लोगों की जान चली गई थी.
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इसके बाद 2012 में अस्सी गंगा घाटी में बादल फटने की घटना ने भारी तबाही मचाई थी. अचानक आई बाढ़ में कई गांव बह गए और बड़ी संख्या में लोग लापता हो गए थे. हाल के वर्षों में धराली और आसपास के इलाकों में हुई घटनाओं ने भी यह साबित किया कि उत्तरकाशी लगातार एक संवेदनशील Disaster Hotspot बना हुआ है.
विशेषज्ञ बताते हैं कि यहां की कमजोर चट्टानें, खड़ी ढलानें और अत्यधिक वर्षा आपदा के खतरे को कई गुना बढ़ा देती हैं. मानसून के दौरान यहां सड़कें बंद होना और मलबा गिरना आम बात बन चुकी है.
चमोली में ग्लेशियर और भूधंसाव सबसे बड़ी चिंता
चमोली जिला भी उत्तराखंड के सबसे संवेदनशील Disaster Hotspot क्षेत्रों में शामिल है. यह जिला भूकंप, ग्लेशियर टूटने और भूधंसाव जैसी घटनाओं से लगातार जूझ रहा है. साल 2021 में ऋषिगंगा क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने से आई फ्लैश फ्लड ने पूरे देश को हिला दिया था. इस हादसे में 200 से ज्यादा लोग मारे गए या आज तक लापता हैं.
वहीं, 2023 में ज्योतिर्मठ में सामने आया भूधंसाव संकट अब भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है. सैकड़ों घरों में दरारें आ गईं और कई परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट करना पड़ा. वैज्ञानिकों का मानना है कि अनियोजित निर्माण और लगातार बढ़ती मानवीय गतिविधियों ने इस Disaster Hotspot को और अधिक अस्थिर बना दिया है.
चमोली में बदरीनाथ हाईवे सहित कई प्रमुख सड़कें हर साल भूस्खलन की वजह से बाधित होती हैं. इससे न केवल स्थानीय लोग प्रभावित होते हैं बल्कि चारधाम यात्रा पर भी असर पड़ता है.
पिथौरागढ़ में बढ़ रहा फ्लैश फ्लड का खतरा
नेपाल और चीन की सीमा से लगा पिथौरागढ़ जिला भी प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है. यहां काली नदी का जलस्तर बढ़ने पर सीमांत क्षेत्रों में बड़ा खतरा पैदा हो जाता है. साल 2020 में काली नदी में आई बाढ़ ने कई गांवों और संपर्क मार्गों को भारी नुकसान पहुंचाया था.
साल 2016 में मुनस्यारी क्षेत्र में बादल फटने और 2024 में बंगापानी क्षेत्र में आई फ्लैश फ्लड ने इस जिले को बड़े Disaster Hotspot के रूप में स्थापित कर दिया. विशेषज्ञों के अनुसार मिलम ग्लेशियर क्षेत्र में लगातार हो रहे बदलाव आने वाले समय में और गंभीर खतरे का संकेत दे रहे हैं.
मानसून के दौरान यहां भूस्खलन और सड़कें बंद होने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. कई गांवों का संपर्क घंटों नहीं बल्कि कई दिनों तक टूट जाता है.
हिमालय की भूगर्भीय संरचना बढ़ा रही खतरा
भूवैज्ञानिकों के अनुसार उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ की संवेदनशीलता के पीछे सबसे बड़ी वजह हिमालय की भूगर्भीय संरचना है. ये तीनों जिले मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) जोन में आते हैं, जिसे हिमालय का सबसे सक्रिय भूगर्भीय क्षेत्र माना जाता है.
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विशेषज्ञ एसपीएस बिष्ट के मुताबिक, इस क्षेत्र में धरती के भीतर लगातार ऊर्जा रिलीज होती रहती है, जिससे भूकंप और भूगर्भीय हलचल की आशंका बनी रहती है. भारी बारिश, कमजोर चट्टानें और तेजी से बदलता मौसम इन जिलों को स्थायी Disaster Hotspot बना रहे हैं.
बदलता मौसम बढ़ा रहा खतरा
उत्तराखंड में मानसून का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. पहले जहां बारिश सीमित समय तक होती थी, वहीं अब कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ गई हैं. यही वजह है कि बादल फटने और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं.
जलवायु परिवर्तन का असर हिमालयी क्षेत्रों में साफ दिखाई देने लगा है. ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि समय रहते वैज्ञानिक और संतुलित विकास मॉडल नहीं अपनाया गया, तो आने वाले वर्षों में ये Disaster Hotspot जिले और ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं.
सरकार ने शुरू की नई तैयारी
उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग ने मानसून से पहले विशेष कार्ययोजना तैयार करनी शुरू कर दी है. संवेदनशील इलाकों में ड्रोन सर्वे कराया जाएगा और जिला प्रशासन को अलर्ट मोड पर रहने के निर्देश दिए गए हैं.
आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, संभावित खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान कर वहां समय रहते सुरक्षा उपाय लागू किए जाएंगे. इसके अलावा स्थानीय लोगों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण देने पर भी जोर दिया जा रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल राहत और बचाव कार्यों से समस्या का समाधान नहीं होगा. अनियोजित निर्माण, पहाड़ों की कटाई और नदियों के किनारे बढ़ते अतिक्रमण पर सख्ती जरूरी है. उत्तराखंड के ये तीन Disaster Hotspot जिले आने वाले समय के लिए गंभीर चेतावनी बन चुके हैं.
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