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Lokhitkranti > उत्तराखंड > Uttarakhand River Rejuvenation: उत्तराखंड की 13 सूखती नदियों को मिलेगा नया जीवन, बड़े राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थान करेंगे वैज्ञानिक अध्ययन
उत्तराखंड

Uttarakhand River Rejuvenation: उत्तराखंड की 13 सूखती नदियों को मिलेगा नया जीवन, बड़े राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थान करेंगे वैज्ञानिक अध्ययन

Manisha
Last updated: 2026-07-06 11:41 पूर्वाह्न
Manisha Published 2026-07-06
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Uttarakhand River Rejuvenation project for 13 rivers with scientific study by leading research institutes
Uttarakhand River Rejuvenation project for 13 rivers with scientific study by leading research institutes
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Uttarakhand River Rejuvenation: उत्तराखंड की जीवनदायिनी नदियों को पुनर्जीवित करने की दिशा में राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। प्रदेश में लगातार घटते जल प्रवाह, सूखते प्राकृतिक जल स्रोतों और भूजल स्तर में गिरावट को देखते हुए अब Uttarakhand River Rejuvenation अभियान के तहत राज्य की 13 प्रमुख नदियों का वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाएगा। इस महत्वाकांक्षी योजना में देश के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को शामिल किया गया है, जो हर जिले की एक महत्वपूर्ण नदी का विस्तृत अध्ययन कर उसके संरक्षण और पुनर्जीवन का रोडमैप तैयार करेंगे।

Contents
वन डिस्ट्रिक्ट-वन रिवर मॉडल पर होगा कामवैज्ञानिक आधार पर तैयार होगी विस्तृत रिपोर्टइन संस्थानों को मिली अध्ययन की जिम्मेदारीजल प्रवाह में कमी के कारणों की होगी पहचानझीलों, तालाबों और भूजल पर भी रहेगा फोकसतकनीकी रिपोर्ट के आधार पर तैयार होंगी परियोजनाएं10 वर्षों तक होगी लगातार निगरानीस्थानीय लोगों की भागीदारी होगी सबसे अहमउत्तराखंड के जल भविष्य के लिए अहम पहल

यह पहल केवल नदियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि नदी के जलग्रहण क्षेत्र, भूजल पुनर्भरण, झीलों, तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों का भी व्यापक विश्लेषण किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि Uttarakhand River Rejuvenation परियोजना भविष्य में जल संकट से निपटने के लिए एक प्रभावी मॉडल साबित हो सकती है।

वन डिस्ट्रिक्ट-वन रिवर मॉडल पर होगा काम

स्प्रिंग एंड रिवर रिजूवनेशन अथॉरिटी (SARA) ने इस योजना को वन डिस्ट्रिक्ट-वन रिवर मॉडल के आधार पर तैयार किया है। इसके तहत उत्तराखंड के सभी 13 जिलों से एक-एक ऐसी नदी का चयन किया गया है, जो स्थानीय लोगों के जीवन, कृषि और पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण है तथा वर्तमान में जल प्रवाह की कमी जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है।

योजना का उद्देश्य केवल नदी में पानी बढ़ाना नहीं, बल्कि पूरे जल तंत्र को वैज्ञानिक तरीके से मजबूत करना है। इसी कारण Uttarakhand River Rejuvenation कार्यक्रम में भूजल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और प्राकृतिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन को भी समान प्राथमिकता दी जाएगी।

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वैज्ञानिक आधार पर तैयार होगी विस्तृत रिपोर्ट

SARA लंबे समय से राज्य में झरनों, धाराओं और जल स्रोतों के संरक्षण पर कार्य कर रही है। हालांकि पहली बार पूरे प्रदेश की प्रमुख नदियों को लेकर इतने बड़े स्तर पर वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाएगा।

अध्ययन के दौरान विशेषज्ञ नदी के जल प्रवाह, जलग्रहण क्षेत्र, भूगर्भीय संरचना, वर्षा के पैटर्न, मिट्टी की स्थिति, भूजल स्तर और आसपास के प्राकृतिक संसाधनों का विश्लेषण करेंगे। इसके आधार पर प्रत्येक नदी के लिए विस्तृत तकनीकी रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिससे Uttarakhand River Rejuvenation के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनाई जा सके।

इन संस्थानों को मिली अध्ययन की जिम्मेदारी

योजना के तहत अलग-अलग नदियों के अध्ययन के लिए देश के प्रतिष्ठित संस्थानों को जिम्मेदारी दी गई है। जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान अल्मोड़ा की जटा गंगा, बागेश्वर की गरुड़ गंगा और पिथौरागढ़ की पूर्वी रामगंगा का अध्ययन करेगा।

आईआईटी रुड़की नैनीताल की शिप्रा नदी, चंपावत की गौड़ी नदी और उधम सिंह नगर की फीका नदी का वैज्ञानिक विश्लेषण करेगा। इसके साथ अर्थ साइंस विशेषज्ञ भी सहयोग करेंगे।

राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH), रुड़की पौड़ी की नयार पूर्वी और नयार पश्चिमी नदियों के साथ टिहरी एवं देहरादून क्षेत्र की सोंग नदी का अध्ययन करेगा। वन अनुसंधान संस्थान (FRI), देहरादून चमोली की चंद्रभागा और रुद्रप्रयाग की पुनार नदी पर शोध करेगा। वहीं भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान उत्तरकाशी की कमल गंगा तथा भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) हरिद्वार की पथरी नदी का अध्ययन करेगा।

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जल प्रवाह में कमी के कारणों की होगी पहचान

विशेषज्ञ केवल वर्तमान स्थिति का आकलन नहीं करेंगे, बल्कि यह भी पता लगाएंगे कि आखिर किन कारणों से इन नदियों का जल प्रवाह लगातार घट रहा है।

जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास, जंगलों में कमी, प्राकृतिक जल स्रोतों का सूखना, भूजल दोहन और वर्षा के बदलते पैटर्न जैसे कारणों का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद Uttarakhand River Rejuvenation के तहत ऐसे स्थायी समाधान सुझाए जाएंगे जो आने वाले वर्षों में नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को मजबूत कर सकें।

झीलों, तालाबों और भूजल पर भी रहेगा फोकस

इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नदी संरक्षण को केवल नदी तक सीमित नहीं रखा जाएगा। विशेषज्ञ आसपास की झीलों, तालाबों, पारंपरिक जल स्रोतों और वर्षा जल संचयन की संभावनाओं का भी अध्ययन करेंगे।

भूजल रिचार्ज बढ़ाने के लिए किन क्षेत्रों में संरचनाएं विकसित की जा सकती हैं, जल संरक्षण के कौन-कौन से मॉडल प्रभावी होंगे और किस प्रकार प्राकृतिक जल चक्र को मजबूत किया जा सकता है, इस पर भी विस्तृत सुझाव दिए जाएंगे।

तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर तैयार होंगी परियोजनाएं

अध्ययन पूरा होने के बाद संबंधित संस्थान विस्तृत तकनीकी रिपोर्ट सरकार को सौंपेंगे। इन रिपोर्टों के आधार पर जिला स्तरीय समितियां परियोजनाओं का प्रस्ताव तैयार करेंगी और उन्हें SARA मुख्यालय भेजा जाएगा।

10 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली परियोजनाओं को मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली समिति से मंजूरी मिलेगी, जबकि कम लागत वाली योजनाओं को सचिव स्तर पर स्वीकृति दी जाएगी।

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10 वर्षों तक होगी लगातार निगरानी

सरकार ने इस योजना को केवल अध्ययन तक सीमित नहीं रखा है। Uttarakhand River Rejuvenation के तहत तैयार परियोजनाओं की अगले दस वर्षों तक लगातार मॉनिटरिंग की जाएगी।

SARA के जिला स्तरीय विशेषज्ञ समय-समय पर यह मूल्यांकन करेंगे कि जल प्रवाह, भूजल स्तर और पर्यावरण पर परियोजनाओं का कितना प्रभाव पड़ा है। जरूरत पड़ने पर सुधारात्मक कदम भी उठाए जाएंगे।

स्थानीय लोगों की भागीदारी होगी सबसे अहम

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी जल संरक्षण अभियान की सफलता तभी संभव है जब स्थानीय समुदाय उसकी जिम्मेदारी अपने हाथ में ले। इसलिए इस योजना में ग्रामीणों, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय निकायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। इससे न केवल जल संरक्षण को मजबूती मिलेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति लोगों में जागरूकता विकसित होगी।

उत्तराखंड के जल भविष्य के लिए अहम पहल

राज्य में बढ़ते जल संकट और बदलते जलवायु परिदृश्य के बीच Uttarakhand River Rejuvenation अभियान को एक दूरदर्शी पहल माना जा रहा है। यदि वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर सुझाए गए उपाय प्रभावी ढंग से लागू किए जाते हैं, तो इससे न केवल सूखती नदियों में दोबारा जीवन लौट सकता है, बल्कि उत्तराखंड के जल संसाधनों, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण को भी नई दिशा मिल सकती है। आने वाले वर्षों में यह मॉडल देश के अन्य पर्वतीय राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।

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