Digital Rape ऐसा शब्द बन गया हैं जो आपने कई सूर्खियों में पढ़ा होगा। इस पर डिबेट भी तेज हो गई हैं कि क्या इसे बाकी रेप केसों की तरह ही देखा जाएंगा। यह एक गंभीर यौन अपराध हैं जिसके बारे में कई लोगों को गलत सूचना प्राप्त है।
दरअसल लोगों को अकसर इस शब्द को सुनकर ऐसा लगता हैं कि यह अपराध किसी ऑनलाइन गतिविधि से जुड़ा होता होगा। लेकिन शायद आपको यह हैरान कर देगा कि Digital Rape में ऑनलाइन जैसा कुछ भी नहीं होता हैँ।
क्या हैं डिजिटल रेप ?
डिजिटल रेप में इस्तेमाल हुआ शब्द डिजिटल लैटीन शब्द डिजिटस से लिया गया हैं। डिजिटस का मतलब होता हैं अंगुलियों से। दरअसल पहले के दौर में रेप उसे कहा जाता था जिसमें कोई पुरुष अपने पैनीस को किसी महिला की वैजाइना में उसकी इजाजत के बिना डालने की कोशिश करता था।

लेकिन जब पैनीस के स्थान पर महिला के प्राइवेट पार्ट को अंगुलियों से छुआ जाता था या किसी अन्य चीज को प्राइवेट पार्ट में डाला जाता, तो ऐसे में केस सर्वाइवर के पक्ष में कमजोर हो जाता था। क्योंकि उस मामले मे वह केस रेप की जगह महिला की मर्यादा भंग करने का केस बन जाता था। जिसे धारा 375 की जगह धारा 354 या धारा 377 के तहत दर्ज किया जाता था और इसके तहत अपराधी को कम सजा मिल जाती थी।
क्या हैं सजा ?
वक्त के साथ कानून रचनाकारों को इस बात का अहसास हुआ कि महिला हित को ध्यान में रखते हुए कानून में एक नए शब्द की जरुरत हैं, जो इस तरह के केसों में सर्वाइवर का साथ दे। इसके लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) के लागू होने के साथ ही आईपीसी की धारा 375 को बीएनएस की धारा 63 से बदल दिया गया है। ‘डिजिटल रेप’ के केस में कम से कम दस साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती है।
यह भी पढ़े- अत्याचार के खिलाफ एकजुट हुआ Brahmin समाज



