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Lokhitkranti > राष्ट्रीय > Counting Observer: पर्यवेक्षक विवाद में TMC को सुप्रीम कोर्ट से झटका, EC के अधिकार पर अदालत की बड़ी टिप्पणी
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Counting Observer: पर्यवेक्षक विवाद में TMC को सुप्रीम कोर्ट से झटका, EC के अधिकार पर अदालत की बड़ी टिप्पणी

Lokhit Kranti
Last updated: 2026-05-02 11:44 पूर्वाह्न
By Lokhit Kranti 3 महीना ago
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Counting Observer
Counting Observer: पर्यवेक्षक विवाद में TMC को सुप्रीम कोर्ट से झटका, EC के अधिकार पर अदालत की बड़ी टिप्पणी
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Counting Observer: पश्चिम बंगाल में मतगणना से पहले शुरू हुआ मतगणना पर्यवेक्षक विवाद अब राजनीतिक और कानूनी बहस का बड़ा विषय बन गया है। इस Counting Observer मामले में तृणमूल कांग्रेस को उस समय बड़ा झटका लगा, जब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि चुनाव आयोग को अधिकारियों की नियुक्ति करने का पूरा अधिकार है। अदालत की इस टिप्पणी के बाद बंगाल की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है।

Contents
Counting Observer मामले में TMC की दलीलराज्य सरकार के अधिकारियों को शामिल न करने पर सवालCounting Observer मामले में अदालत की सख्त टिप्पणीचुनाव आयोग के फैसले को मिली राहतबंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचलCounting Observer मामले का राजनीतिक असर

दरअसल, तृणमूल कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें मतगणना पर्यवेक्षक के तौर पर केवल केंद्रीय कर्मचारियों की नियुक्ति की गई थी। पार्टी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में कई सवाल उठाए और दावा किया कि इस फैसले से निष्पक्षता को लेकर आशंकाएं पैदा हो रही हैं। वहीं अदालत ने चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों का हवाला देते हुए साफ संकेत दिया कि अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार आयोग के पास ही है।

Counting Observer मामले में TMC की दलील

Counting Observer सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने चार प्रमुख मुद्दे रखे। उन्होंने कहा कि जिला निर्वाचन अधिकारी को 13 अप्रैल को नोटिस जारी किया गया था, लेकिन इसकी जानकारी पार्टी को काफी देर से यानी 29 अप्रैल को मिली। उनके मुताबिक इतनी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में राजनीतिक दलों को समय रहते जानकारी मिलनी चाहिए थी।

सिब्बल ने यह भी कहा कि पार्टी को आशंका है कि कई बूथों पर गड़बड़ी हो सकती है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि पहले से किसी अनियमितता की संभावना जताई जा रही है, तो उसके पीछे क्या आधार है। उन्होंने अदालत में कहा कि बिना किसी ठोस आंकड़े या तथ्य के ऐसी आशंका जताना गंभीर मामला है।

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उन्होंने आगे कहा कि प्रत्येक मतगणना केंद्र में पहले से एक केंद्रीय सरकारी अधिकारी सूक्ष्म पर्यवेक्षक के रूप में मौजूद रहता है। ऐसे में अतिरिक्त केंद्रीय अधिकारियों की नियुक्ति की आवश्यकता क्यों पड़ी, यह स्पष्ट नहीं किया गया।

राज्य सरकार के अधिकारियों को शामिल न करने पर सवाल

TMC की ओर से सबसे बड़ा सवाल इस बात पर उठाया गया कि चुनाव आयोग ने राज्य सरकार द्वारा नामित अधिकारियों को शामिल नहीं किया। सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव आयोग के परिपत्र में राज्य और केंद्र दोनों के अधिकारियों को शामिल करने की बात कही गई है, लेकिन व्यवहार में केवल केंद्रीय कर्मचारियों की नियुक्ति की गई।

उन्होंने कहा कि अगर आयोग अपने ही दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करेगा, तो राजनीतिक दलों में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। उनके अनुसार, निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के लिए दोनों स्तरों के अधिकारियों की मौजूदगी जरूरी है।

Counting Observer मामले में अदालत की सख्त टिप्पणी

Counting Observer सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कई अहम टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों की सहमति से अधिकारियों की नियुक्ति का कोई नियम नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और उसे अधिकारियों के चयन का अधिकार प्राप्त है।

जस्टिस बागची ने कहा कि नियमों के अनुसार केंद्र या राज्य सरकार के अधिकारियों को नियुक्त किया जा सकता है। यदि आयोग केवल एक वर्ग के अधिकारियों का चयन करता है, तो इसे स्वतः गलत नहीं कहा जा सकता।

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उन्होंने यह भी कहा कि यह धारणा गलत है कि केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारी पूरी तरह अलग-अलग श्रेणियों में आते हैं। अदालत के अनुसार, दोनों ही सरकारी कर्मचारी हैं और चुनाव ड्यूटी के दौरान उनकी जिम्मेदारी निष्पक्ष तरीके से काम करना है।

चुनाव आयोग के फैसले को मिली राहत

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को चुनाव आयोग के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। अदालत ने साफ कर दिया कि आयोग अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर निर्णय ले सकता है और इस प्रक्रिया में राजनीतिक दलों की सहमति आवश्यक नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का यह रुख आने वाले चुनावों में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इससे चुनाव आयोग की स्वायत्तता और अधिकारों को मजबूत संदेश मिला है।

बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल

इस पूरे Counting Observer विवाद ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को और गर्म कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस लगातार यह आरोप लगाती रही है कि केंद्रीय एजेंसियों और केंद्रीय अधिकारियों के जरिए चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। वहीं विपक्षी दल चुनाव आयोग के फैसले को पारदर्शिता के लिए जरूरी बता रहे हैं।

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राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, मतगणना से ठीक पहले इस तरह का विवाद चुनावी माहौल को और संवेदनशील बना सकता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद अब यह साफ हो गया है कि चुनाव आयोग की नियुक्तियों में अदालत फिलहाल हस्तक्षेप करने के पक्ष में नहीं है।

Counting Observer मामले का राजनीतिक असर

इस Counting Observer फैसले का असर सिर्फ कानूनी दायरे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका सीधा प्रभाव राजनीतिक माहौल पर भी पड़ सकता है। TMC इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उठाती रहेगी, जबकि विपक्ष इसे अदालत की मुहर के तौर पर पेश करेगा।

चुनाव विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत का फैसला चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भरोसा बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाएगा। साथ ही यह संदेश भी गया है कि चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़े प्रशासनिक फैसलों में आयोग को पर्याप्त स्वतंत्रता प्राप्त है।

अब सभी की नजरें पश्चिम बंगाल की मतगणना प्रक्रिया पर टिकी हैं। राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनाव परिणामों के दौरान माहौल कितना शांत और पारदर्शी बना रहता है।

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