Iran Nuclear Deal: मध्य पूर्व की राजनीति एक बार फिर दुनिया के सबसे बड़े भू-राजनीतिक संकट की तरफ बढ़ती दिखाई दे रही है। चर्चा तेज है कि ईरान अमेरिका को अपना संवर्धित यूरेनियम सौंपने के लिए तैयार हो गया है। इस खबर ने पूरी दुनिया में नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या ईरान वही ऐतिहासिक गलती दोहराने जा रहा है, जो कभी लीबिया के पूर्व शासक मुअम्मर गद्दाफी ने की थी?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान ने अपना न्यूक्लियर ‘डिटेरेंस’ खो दिया, तो भविष्य में उसके लिए हालात बेहद खतरनाक हो सकते हैं। यही वजह है कि अब “लीबिया मॉडल” और “गद्दाफी सिंड्रोम” जैसे शब्द फिर से वैश्विक राजनीति में चर्चा का केंद्र बन गए हैं। (Iran Nuclear Deal)
अमेरिका को यूरेनियम सौंपने की चर्चा क्यों अहम?
रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि ईरान अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार को अमेरिका के हवाले करने पर विचार कर रहा है। कहा जा रहा है कि इसके बदले तेहरान को आर्थिक प्रतिबंधों में राहत, विदेशों में जमा अरबों डॉलर की संपत्ति तक पहुंच और पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद है। लेकिन रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ इसे सिर्फ एक “शांति समझौता” नहीं बल्कि अमेरिका और इजराइल की बड़ी रणनीतिक चाल बता रहे हैं। उनका कहना है कि इतिहास में कई ऐसे उदाहरण हैं, जहां हथियार छोड़ने वाले देशों की सत्ता बाद में गिरा दी गई। (Iran Nuclear Deal)
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क्या था लीबिया मॉडल?
साल 2003 में लीबिया के तत्कालीन राष्ट्रपति Muammar Gaddafi ने अमेरिका के साथ समझौता किया था। उन्होंने अपना परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम खत्म कर दिया और पश्चिमी देशों को निरीक्षण की अनुमति दे दी। गद्दाफी को उम्मीद थी कि इससे लीबिया पर लगे प्रतिबंध हट जाएंगे और उनका देश वैश्विक मंच पर स्वीकार कर लिया जाएगा। लेकिन 2011 में अमेरिका और नाटो ने लीबिया पर सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी। गद्दाफी की सत्ता गिर गई और बाद में उनकी हत्या कर दी गई। इसी घटना को आज “लीबिया मॉडल” कहा जाता है, जिसे लेकर अब ईरान में भी डर बढ़ता दिखाई दे रहा है। (Iran Nuclear Deal)
नेतन्याहू कई बार दे चुके हैं संकेत
इजराइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu पिछले कई वर्षों से सार्वजनिक मंचों पर कह चुके हैं कि ईरान पर “लीबिया मॉडल” लागू किया जाना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि इस रणनीति का पहला चरण ईरान को बातचीत और समझौते के जरिए पूरी तरह निहत्था करना है। यानी उसका यूरेनियम और परमाणु क्षमता खत्म कर देना। इसके बाद दूसरा चरण ‘रिजीम चेंज” यानी सत्ता परिवर्तन का हो सकता है। (Iran Nuclear Deal)
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यूक्रेन और उत्तर कोरिया के उदाहरण भी चर्चा में
विश्लेषक 1994 के यूक्रेन का उदाहरण भी दे रहे हैं। बुडापेस्ट मेमोरेंडम के तहत यूक्रेन ने अपने परमाणु हथियार छोड़ दिए थे। बदले में उसे सुरक्षा की गारंटी मिली, लेकिन बाद के वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध ने उस भरोसे को कमजोर कर दिया। इसके उलट उत्तर कोरिया को देखा जा रहा है, जिसने भारी प्रतिबंधों के बावजूद अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखा। आज अमेरिका खुलकर उत्तर कोरिया पर सैन्य हमला करने से बचता नजर आता है। (Iran Nuclear Deal)
क्या ईरान लीबिया से अलग है?
हालांकि कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान की स्थिति लीबिया से अलग है। लीबिया के पास मजबूत क्षेत्रीय नेटवर्क नहीं था, जबकि ईरान के पास पूरे पश्चिम एशिया में फैले सहयोगी समूह और बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता मौजूद है। ईरान के प्रभाव वाले संगठन जैसे हिजबुल्लाह और हूती समूह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बड़ी भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि कुछ रणनीतिकार मानते हैं कि ईरान को पूरी तरह कमजोर करना इतना आसान नहीं होगा। (Iran Nuclear Deal)
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ट्रंप की डील पर क्यों उठ रहे सवाल?
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump पहले भी 2018 में ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर निकल चुके हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि अगर भविष्य में अमेरिका दोबारा समझौता तोड़ देता है, तो ईरान के पास अपनी परमाणु क्षमता दोबारा विकसित करने में वर्षों लग सकते हैं। फिलहाल यूरेनियम सौंपने की शर्तें शुरुआती बातचीत और अमेरिकी दावों का हिस्सा हैं। ईरान ने अभी इस पर अंतिम मुहर नहीं लगाई है। लेकिन अगर तेहरान “लीबिया मॉडल” की राह पर आगे बढ़ता है, तो पूरी दुनिया की नजर इस बात पर होगी कि क्या इतिहास खुद को दोहराएगा। (Iran Nuclear Deal)
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