India EU Trade Deal: भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते ने वैश्विक कारोबारी जगत का ध्यान खींच लिया है। दोनों पक्ष ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (MFN) का दर्जा एक-दूसरे को देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह प्रावधान लागू होने के बाद पांच वर्षों तक किसी तीसरे देश को बेहतर टैरिफ शर्तें देने से रोकता है। माना जा रहा है कि इस कदम से भारतीय निर्यात को मजबूत आधार मिलेगा और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई रफ्तार मिल सकती है।
टैरिफ में बड़ी कटौती, व्यापार में उछाल की उम्मीद
प्रस्तावित समझौते के ड्राफ्ट के अनुसार, दोनों पक्ष अधिकांश व्यापारित वस्तुओं पर शुल्क घटाने या समाप्त करने पर सहमत हुए हैं। अनुमान है कि करीब 96 प्रतिशत से अधिक ट्रेड वैल्यू वाले उत्पादों पर टैरिफ कम या खत्म किए जाएंगे। इससे यूरोपीय कंपनियों को अरबों यूरो की ड्यूटी बचत हो सकती है, वहीं भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर यूरोपीय बाजार तक पहुंच आसान होगी।
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व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यह India EU Trade Deal लागू होने के बाद 2032 तक यूरोपीय संघ को भारत का निर्यात दोगुना हो सकता है। ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर व्यापारिक तनाव और संरक्षणवादी नीतियां बढ़ रही हैं, यह पहल द्विपक्षीय व्यापार को स्थिर और दीर्घकालिक दिशा देने वाली मानी जा रही है।
किन उत्पादों को रखा गया बाहर?
हालांकि India EU Trade Deal का दायरा व्यापक है, लेकिन कुछ कृषि उत्पादों को इससे बाहर रखा गया है। सोया, बीफ, चीनी, चावल और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को फिलहाल मुक्त व्यापार व्यवस्था में शामिल नहीं किया गया है। यह कदम दोनों पक्षों के घरेलू किसानों और उद्योगों के हितों को संतुलित रखने के उद्देश्य से उठाया गया है।
भारतीय वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी मसौदे में स्पष्ट किया गया है कि समझौता विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों से आगे जाकर व्यापार को सरल बनाने का प्रयास करेगा, लेकिन जरूरी क्षेत्रों में घरेलू संवेदनशीलता का ध्यान रखा जाएगा।
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डिजिटल ट्रेड और कस्टम सहयोग पर जोर
इस India EU Trade Deal की खास बात यह है कि इसमें डिजिटल व्यापार और कस्टम्स सहयोग को प्रमुख स्थान दिया गया है। नई दिल्ली और ब्रुसेल्स ने आयात-निर्यात प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी और तेज बनाने पर सहमति जताई है।
दोनों पक्ष खाद्य सुरक्षा और पौध संरक्षण उपायों को WTO मानकों के अनुरूप करने पर काम करेंगे। सर्टिफिकेशन और ऑडिट प्रक्रियाओं को आसान बनाया जाएगा ताकि व्यापारिक बाधाएं कम हों। साथ ही, कस्टम क्लियरेंस को तेज करने और सहयोग बढ़ाने के लिए विशेष तंत्र विकसित किया जाएगा।
इंपोर्ट डेटा का वार्षिक आदान-प्रदान
India EU Trade Deal के लागू होने के एक वर्ष बाद दोनों पक्ष सालाना आयात आंकड़ों का आदान-प्रदान शुरू करेंगे। इसका उद्देश्य टैरिफ रियायतों के उपयोग और समझौते के प्रभाव की निगरानी करना है।
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इसके अलावा, आयात, निर्यात या ट्रांजिट से जुड़े कस्टम फैसलों के खिलाफ पारदर्शी और भेदभाव-रहित अपील प्रक्रिया सुनिश्चित की जाएगी। यह प्रावधान कारोबारियों के लिए भरोसे का माहौल तैयार करेगा।
प्राइवेसी और डिजिटल सुरक्षा को मान्यता
डिजिटल India EU Trade Deal से जुड़े प्रावधानों में डेटा सुरक्षा और गोपनीयता को बुनियादी अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है। दोनों पक्ष व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और क्रॉस-बॉर्डर ट्रांसफर नियमों पर अपने-अपने अधिकार बनाए रखेंगे।
पेपरलेस ट्रेड को बढ़ावा देने, इलेक्ट्रॉनिक कॉन्ट्रैक्ट, डिजिटल सिग्नेचर और ऑथेंटिकेशन की कानूनी मान्यता को भी प्रोत्साहित किया जाएगा। इससे सीमा-पार व्यापार की लागत और समय दोनों में कमी आने की संभावना है।
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ग्रीन एजेंडा को मिलेगा समर्थन
India EU Trade Deal ड्राफ्ट में यह भी उल्लेख है कि यूरोपीय संघ, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के लिए भारत के प्रयासों का समर्थन करेगा। इसके लिए वित्त और निवेश जुटाने में सहयोग की बात कही गई है। यह प्रावधान जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक साझेदारी को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
मेक इन इंडिया के लिए अवसर
विश्लेषकों का कहना है कि यह India EU Trade Deal भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए नए अवसर खोलेगा। ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और आईटी सेवाओं जैसे क्षेत्रों को विशेष लाभ मिल सकता है।
यदि कानूनी मंजूरी के बाद यह समझौता निर्धारित समय में लागू होता है, तो भारत और यूरोपीय संघ के बीच आर्थिक साझेदारी एक नए स्तर पर पहुंच सकती है। ऐसे में ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ प्रावधान सिर्फ एक कानूनी शब्द नहीं, बल्कि दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच भरोसे और सहयोग का प्रतीक बन सकता है।
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