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Lokhitkranti > उत्तराखंड > Kishau Dam Project: 17 गांवों के 5000 लोगों की पुकार, “देश की प्यास बुझाएंगे, लेकिन हमारा पुनर्वास दर्द की कहानी न बने”
उत्तराखंड

Kishau Dam Project: 17 गांवों के 5000 लोगों की पुकार, “देश की प्यास बुझाएंगे, लेकिन हमारा पुनर्वास दर्द की कहानी न बने”

Manisha
Last updated: 2026-06-23 10:49 पूर्वाह्न
Manisha Published 2026-06-23
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Kishau Dam Project
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Kishau Dam Project: देश के बड़े राज्यों की बढ़ती जल आवश्यकता और भविष्य में पानी की चुनौती को देखते हुए राष्ट्रीय महत्व की Kishau Dam Project एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर टौंस नदी पर प्रस्तावित यह विशाल परियोजना करोड़ों लोगों के लिए पेयजल और बिजली का महत्वपूर्ण स्रोत बनने जा रही है। लेकिन विकास की इस बड़ी तस्वीर के पीछे हजारों लोगों के विस्थापन और पुनर्वास का सवाल भी उतनी ही गंभीरता से सामने खड़ा है।

Contents
आठ साल पुराना गतिरोध टूटने के बाद बढ़ी परियोजना की रफ्तारदिल्ली से लेकर राजस्थान तक कई राज्यों की प्यास बुझाएगी परियोजनाभाखड़ा बांध से भी ऊंचा होगा Kishau Dam Project17 गांवों के 5000 से ज्यादा लोग होंगे प्रभावितस्थानीय लोगों की चिंता, “जमीन के बदले जमीन मिले”पर्यावरणविदों ने उठाए गंभीर सवाल2014 से शुरू हुआ सफर, लागत पहुंची 15 हजार करोड़ के पारविकास और संवेदनाओं के बीच संतुलन की चुनौती

करीब 17 गांवों के पांच हजार से अधिक लोग इस परियोजना से सीधे प्रभावित होंगे। इन गांवों के लोगों का कहना है कि वे देश की जरूरत के लिए अपने हिस्से का त्याग करने को तैयार हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि पुनर्वास केवल सरकारी फाइलों तक सीमित न रह जाए।

आठ साल पुराना गतिरोध टूटने के बाद बढ़ी परियोजना की रफ्तार

हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद Kishau Dam Project को नई गति मिली है। बैठक में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्य के हितों का पक्ष रखते हुए बिजली घटक की लागत उन राज्यों से वहन करवाने की मांग रखी, जिन्हें इस परियोजना से पानी मिलेगा।

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इस प्रस्ताव पर सैद्धांतिक सहमति बनने के बाद लगभग आठ वर्षों से चली आ रही वित्तीय बाधाएं दूर हो गई हैं। केंद्र सरकार पहले से ही परियोजना की लगभग 90 प्रतिशत लागत वहन कर रही है। ऐसे में हिमाचल प्रदेश पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं रहेगा।

दिल्ली से लेकर राजस्थान तक कई राज्यों की प्यास बुझाएगी परियोजना

Kishau Dam Project के पूरा होने के बाद दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड को बड़ी मात्रा में पानी उपलब्ध होगा। आंकड़ों के अनुसार हरियाणा को सबसे अधिक 5.71 बिलियन क्यूबिक लीटर पानी मिलेगा। इसके अलावा उत्तर प्रदेश को 3.71 बिलियन क्यूबिक लीटर, राजस्थान को 1.119 बिलियन क्यूबिक लीटर, दिल्ली को 0.724 बिलियन क्यूबिक लीटर और उत्तराखंड को 0.311 बिलियन क्यूबिक लीटर पानी मिलेगा।

इस परियोजना से लगभग 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई भी संभव होगी। साथ ही 1379 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन होने की उम्मीद है, जिससे हिमाचल प्रदेश को हर वर्ष लगभग 600 करोड़ रुपये का आर्थिक लाभ प्राप्त होगा।

भाखड़ा बांध से भी ऊंचा होगा Kishau Dam Project

टौंस नदी पर बनने वाला यह बांध 236 मीटर ऊंचा और लगभग 680 मीटर लंबा होगा। इसकी ऊंचाई देश के कई प्रमुख बांधों से अधिक मानी जा रही है। परियोजना के पूरा होने के बाद करीब 32 किलोमीटर लंबी झील का निर्माण होगा।

हालांकि इस झील के बनने से हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के शिलाई क्षेत्र सहित कई इलाके प्रभावित होंगे। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के लगभग 40 राजस्व गांवों पर इसका असर पड़ेगा।

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17 गांवों के 5000 से ज्यादा लोग होंगे प्रभावित

Kishau Dam Project के कारण हिमाचल प्रदेश के आठ गांवों के लगभग 2092 लोग और उत्तराखंड के नौ गांवों के करीब 3406 लोग प्रभावित होंगे। इस प्रकार कुल मिलाकर 17 गांवों के 5000 से अधिक लोगों को विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है।

इसके अलावा लगभग 80 हजार पेड़ों की कटाई, सैकड़ों मकानों का प्रभावित होना और 15 से अधिक मंदिरों के अस्तित्व पर भी संकट आने की आशंका है। अदरक और बेमौसमी सब्जियों की खेती के लिए प्रसिद्ध हजारों हेक्टेयर उपजाऊ भूमि जलमग्न हो सकती है।

स्थानीय लोगों की चिंता, “जमीन के बदले जमीन मिले”

परियोजना से प्रभावित क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि वे विकास के खिलाफ नहीं हैं। उनका मानना है कि देश के लिए पानी और बिजली जरूरी है, लेकिन पुनर्वास की प्रक्रिया संवेदनशील और व्यावहारिक होनी चाहिए।

स्थानीय लोग चाहते हैं कि नकद मुआवजे के बजाय उन्हें उसी तरह की उपजाऊ जमीन दी जाए, जिस पर वे वर्षों से खेती करते आए हैं। उनका मानना है कि एक बार पैसा खत्म हो जाता है, लेकिन जमीन पीढ़ियों तक परिवार का सहारा बनी रहती है।

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पर्यावरणविदों ने उठाए गंभीर सवाल

प्रख्यात पर्यावरणविदों का मानना है कि Kishau Dam Project देश के लिए जरूरी है, लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इतनी बड़ी जलाशय परियोजना का असर जंगलों, जैव विविधता और स्थानीय संस्कृति पर पड़ेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि विस्थापित परिवारों के लिए मजबूत पुनर्वास नीति तैयार की जाए और उन्हें आजीविका के समान अवसर दिए जाएं, तो विकास और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है।

2014 से शुरू हुआ सफर, लागत पहुंची 15 हजार करोड़ के पार

वर्ष 2014 में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बीच इस परियोजना को लेकर सहमति बनी थी। शुरुआत में इसकी अनुमानित लागत करीब 7 हजार करोड़ रुपये थी, जो समय के साथ बढ़कर 10 हजार करोड़ और अब 15 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी है। यह परियोजना किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड के माध्यम से विकसित की जा रही है और दोनों राज्यों की इसमें 50-50 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

विकास और संवेदनाओं के बीच संतुलन की चुनौती

Kishau Dam Project केवल एक बांध परियोजना नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के भविष्य से जुड़ा प्रयास है। एक तरफ यह देश के बड़े हिस्से की जल समस्या का समाधान बन सकती है, तो दूसरी ओर हजारों परिवारों के जीवन, संस्कृति और पहचान को प्रभावित करने वाली चुनौती भी है।

प्रभावित गांवों के लोगों का संदेश साफ है, देश की जरूरत के लिए वे अपना योगदान देने को तैयार हैं, लेकिन बदले में उन्हें सम्मानजनक पुनर्वास, सुरक्षित भविष्य और अपनी संस्कृति को बचाए रखने का भरोसा भी चाहिए। तभी यह परियोजना विकास की मिसाल बनने के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का भी उदाहरण बन सकेगी।

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