Calcutta High Court On Bakrid: ईद-उल-अजहा यानी बकरीद से पहले पश्चिम बंगाल में पशु वध को लेकर जारी सरकारी नियमों पर शुरू हुआ विवाद अब राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए न सिर्फ राज्य सरकार की अधिसूचना को सही ठहराया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के 1958 के ऐतिहासिक फैसले “मो. हनीफ कुरैशी बनाम बिहार राज्य” का हवाला देकर बड़ा संदेश भी दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि “इस्लाम में गाय की कुर्बानी देना कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है।”
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद धार्मिक स्वतंत्रता, सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य के अधिकारों को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। अदालत ने कहा कि त्योहारों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है और धार्मिक परंपराएं भी संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही संचालित की जा सकती हैं। (Calcutta High Court On Bakrid)
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
दरअसल, 13 मई को पश्चिम बंगाल सरकार ने बकरीद को देखते हुए पशुओं की कुर्बानी से जुड़े नियमों को लेकर एक अधिसूचना जारी की थी। सरकार का कहना था कि हर साल त्योहार के दौरान सार्वजनिक स्थानों पर पशु वध, गंदगी और कानून-व्यवस्था की शिकायतें सामने आती हैं, इसलिए इस बार स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए। अधिसूचना के अनुसार (Calcutta High Court On Bakrid) गाय, भैंस, बैल और बछड़ों की कुर्बानी के लिए विशेष प्रमाणपत्र जरूरी किया गया। यह प्रमाणपत्र नगरपालिका या पंचायत समिति के अध्यक्ष और सरकारी पशु चिकित्सक द्वारा जारी किया जाना अनिवार्य बताया गया। इसके अलावा खुले स्थान, सड़क किनारे, फ्लैट, अपार्टमेंट या किसी सार्वजनिक जगह पर पशु वध पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। सरकार ने साफ किया कि कुर्बानी केवल अधिकृत बूचड़खानों में ही की जा सकेगी। (Calcutta High Court On Bakrid)
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नियम तोड़ने पर जेल और जुर्माने का प्रावधान
सरकार की अधिसूचना में नियमों के उल्लंघन पर सख्त सजा का भी प्रावधान रखा गया। आदेश के मुताबिक नियम तोड़ने वालों को छह महीने तक की जेल, एक हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों सजा दी जा सकती है। इसी अधिसूचना को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं कलकत्ता हाईकोर्ट में दाखिल की गईं। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह आदेश मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करता है और परंपरागत धार्मिक अधिकारों को सीमित करता है। v
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हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की याचिकाएं?
मुख्य न्यायाधीश सुजय पॉल और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि राज्य सरकार कोई नया प्रतिबंध नहीं लगा रही है, बल्कि 2018 में हाईकोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों को ही लागू कर रही है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि “सार्वजनिक स्थानों पर पशु वध की अनुमति नहीं दी जा सकती। बिना स्वास्थ्य परीक्षण के पशु वध रोकना सार्वजनिक स्वास्थ्य और पशु संरक्षण के लिए आवश्यक है।” कोर्ट ने यह भी माना कि त्योहारों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी है। (Calcutta High Court On Bakrid)
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सुप्रीम कोर्ट के 1958 के फैसले का क्यों हुआ जिक्र?
हाईकोर्ट के फैसले में जिस हिस्से ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा, वह था सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक केस “Mohd. Hanif Quareshi vs State of Bihar” का उल्लेख। 1958 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “इस्लाम में गाय की कुर्बानी देना कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है।” उस समय मुस्लिम कसाइयों ने (Calcutta High Court On Bakrid) दलील दी थी कि बकरीद पर गाय की कुर्बानी उनका धार्मिक अधिकार है, लेकिन शीर्ष अदालत ने इसे अनिवार्य धार्मिक अभ्यास मानने से इनकार कर दिया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि मवेशियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना व्यापार के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है। अदालत ने माना था कि 13-14 साल से अधिक उम्र के वे पशु, जो दूध देने या कृषि कार्य में सक्षम नहीं हैं, उनके वध की अनुमति दी जा सकती है। (Calcutta High Court On Bakrid)
धार्मिक स्वतंत्रता बनाम संवैधानिक व्यवस्था
कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि धार्मिक स्वतंत्रता की सीमाएं क्या हैं। अदालत ने साफ कहा कि धार्मिक अधिकार पूर्ण नहीं होते और उन पर सार्वजनिक स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और संवैधानिक नियम लागू होते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य नियंत्रण से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। (Calcutta High Court On Bakrid)



