Women Strength Training: आजकल फिटनेस का मतलब अक्सर पसीना बहाना समझ लिया गया है। पार्क में तेज़ चाल से चलती महिलाएं, जिम में ट्रेडमिल पर दौड़ती युवतियां या ज़ुम्बा क्लास में थिरकती गृहिणियां ज्यादातर महिलाएं कार्डियो एक्सरसाइज को ही फिट रहने का सबसे अच्छा तरीका मानती हैं। लेकिन फिटनेस एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर महिलाएं लंबे समय तक स्वस्थ, मजबूत और एक्टिव रहना चाहती हैं, तो सिर्फ कार्डियो पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (Women Strength Training) को नजरअंदाज करना भविष्य में बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों को न्योता दे सकता है।
30 की उम्र के बाद मांसपेशियों का नुकसान
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, महिलाओं में मांसपेशियों का क्षय (मसल लॉस) लगभग 30 वर्ष की उम्र के बाद धीरे-धीरे शुरू हो जाता है। उम्र बढ़ने के साथ यह प्रक्रिया तेज हो जाती है, खासकर मेनोपॉज के बाद। मांसपेशियों की कमी से मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ता है, शरीर जल्दी थकने लगता है और गिरने या चोट लगने का खतरा बढ़ जाता है।स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (Women Strength Training) इस गिरावट को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब महिलाएं वजन उठाती हैं या रेजिस्टेंस एक्सरसाइज करती हैं, तो मांसपेशियों को चुनौती मिलती है। इससे शरीर नई मांसपेशियों का निर्माण करता है, जो न केवल ताकत बढ़ाती हैं बल्कि शरीर को लंबे समय तक सक्रिय बनाए रखने में मदद करती हैं।
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हड्डियों की सेहत के लिए क्यों जरूरी है वेट ट्रेनिंग?
भारत सहित दुनिया भर में महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा पुरुषों की तुलना में अधिक पाया जाता है। केवल वॉकिंग या हल्की दौड़ हड्डियों के घनत्व को पर्याप्त रूप से नहीं बढ़ा पाती। इसके विपरीत, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (Women Strength Training) के दौरान जब मांसपेशियां हड्डियों पर दबाव डालती हैं, तो हड्डियां मजबूत होती हैं और उनका घनत्व बढ़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित वेट ट्रेनिंग फ्रैक्चर के खतरे को कम कर सकती है, खासकर उन महिलाओं में जो 40 वर्ष की उम्र पार कर चुकी हैं।
मेटाबॉलिज्म बूस्ट और वजन नियंत्रण
कार्डियो एक्सरसाइज कैलोरी बर्न करने में मदद करती है, लेकिन इसका असर अक्सर उसी समय तक सीमित रहता है जब तक आप एक्सरसाइज कर रही होती हैं। वहीं, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (Women Strength Training) से बनने वाली मांसपेशियां आराम की अवस्था में भी कैलोरी बर्न करती रहती हैं। इसका मतलब है कि आपका शरीर पूरे दिन अधिक ऊर्जा खर्च करता है। यदि कोई महिला केवल कार्डियो पर निर्भर रहती है, तो समय के साथ मांसपेशियों में कमी आ सकती है, जिससे वजन घटाने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। संतुलित तरीके से की गई स्ट्रेंथ ट्रेनिंग वजन घटाने और उसे नियंत्रित रखने में अधिक प्रभावी साबित हो सकती है।
हार्मोनल बैलेंस और तनाव में राहत
आज की कामकाजी और गृहिणी महिलाओं के जीवन में तनाव आम बात है। अत्यधिक कार्डियो, खासकर जब वह सख्त डाइट के साथ किया जाए, तो शरीर में कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर बढ़ सकता है। इससे नींद की समस्या, थकान और मूड स्विंग जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। मध्यम स्तर की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग हार्मोन संतुलन में मदद कर सकती है। यह न केवल मानसिक मजबूती बढ़ाती है, बल्कि आत्मविश्वास में भी इजाफा करती है।
‘बुल्की’ होने का डर छोड़ें
कई महिलाएं वजन उठाने से इसलिए बचती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे बॉडी बिल्डर जैसी दिखने लगेंगी। यह एक मिथक है। महिलाओं के शरीर में टेस्टोस्टेरोन का स्तर पुरुषों की तुलना में काफी कम होता है, जिससे बहुत ज्यादा मांसल शरीर बनाना आसान नहीं होता। भारी मसल्स के लिए विशेष डाइट, सख्त ट्रेनिंग और लंबा समय चाहिए।स्ट्रेंथ ट्रेनिंग का वास्तविक लाभ है बेहतर पोश्चर, टोंड बॉडी, ज्यादा स्टैमिना और रोजमर्रा के कामों में आसानी।
कैसा हो आदर्श फिटनेस रूटीन?
फिटनेस एक्सपर्ट्स के अनुसार, कार्डियो को पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं है। दिल और फेफड़ों की सेहत के लिए मध्यम स्तर का कार्डियो फायदेमंद है। लेकिन इसके साथ हफ्ते में कम से कम 2 से 4 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को शामिल करना चाहिए। शुरुआत हल्के वजन, बॉडीवेट एक्सरसाइज या रेजिस्टेंस बैंड से की जा सकती है।
बदलता फिटनेस ट्रेंड – ताकत की ओर बढ़ता कदम
महिलाओं के बीच अब फिटनेस का नजरिया बदल रहा है। पहले जहां पतला दिखना प्राथमिकता था, अब मजबूत और सक्षम होना नई पहचान बन रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में स्ट्रेंथ ट्रेनिंग महिलाओं की फिटनेस (Women Strength Training) दिनचर्या का मुख्य हिस्सा बन जाएगी। अंत में, फिटनेस केवल पसीना बहाने का नाम नहीं है। असली फिटनेस वह है जो आपको अंदर से मजबूत बनाए। कार्डियो और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग का संतुलन बनाकर महिलाएं न सिर्फ बेहतर दिख सकती हैं, बल्कि बेहतर महसूस भी कर सकती हैं।
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