Kedarghati Forest Fire: केदारघाटी के सीमांत और ऊंचाई वाले इलाकों में इन दिनों जंगलों में लगी आग ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। आमतौर पर इस समय जिन क्षेत्रों में बर्फ जमी रहती थी, वहां अब धुएं के गुबार और जलते पेड़ों के दृश्य सामने आ रहे हैं। इस असामान्य स्थिति ने न केवल वन संपदा को भारी नुकसान पहुंचाया है, बल्कि वन्यजीवों और पर्यावरण संतुलन पर भी गहरा प्रभाव डाला है।
सर्दियों में मई-जून जैसी Kedarghati Forest Fire ने बढ़ाई चिंता
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि Kedarghati Forest Fire की तीव्रता सामान्य नहीं है। सर्दियों के मौसम में इस तरह की भीषण वनाग्नि आमतौर पर देखने को नहीं मिलती। हालात ऐसे हैं मानो मई या जून का तपता हुआ समय हो। चारों ओर फैला धुआं न सिर्फ दृश्यता को प्रभावित कर रहा है, बल्कि सांस संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ा रहा है। ग्रामीणों को आशंका है कि यदि आग पर जल्द काबू नहीं पाया गया, तो आसपास के और भी जंगल इसकी चपेट में आ सकते हैं।
वन संपदा को करोड़ों का नुकसान
जंगलों में फैली आग से कीमती पेड़-पौधे, जड़ी-बूटियां और घास जलकर राख हो रही हैं। इससे वन क्षेत्र की जैव विविधता को भारी क्षति पहुंची है। वहीं जंगलों में रहने वाले जंगली जानवरों के लिए भोजन और सुरक्षित आश्रय का संकट खड़ा हो गया है। कई वन्यजीव सुरक्षित स्थानों की तलाश में आबादी वाले इलाकों की ओर बढ़ सकते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका भी बढ़ गई है।
दुर्गम और चट्टानी इलाकों ने बढ़ाई चुनौती
Kedarghati Forest Fire भूगोल पहले से ही कठिन माना जाता है। सीमांत क्षेत्रों में फैले जंगल चट्टानी ढलानों और दुर्गम रास्तों से घिरे हुए हैं। ऐसे में आग बुझाने का कार्य बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है। कई स्थानों तक वाहनों की पहुंच संभव नहीं है, जिससे वन विभाग की टीमों को पैदल ही लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है। तेज हवाएं और सूखी वनस्पति आग को और तेजी से फैलाने का काम कर रही हैं।
वन विभाग की टीमें लगातार कर रही प्रयास
वन विभाग ने आग पर नियंत्रण पाने के लिए मोर्चा संभाल रखा है। फील्ड में तैनात टीमें लगातार आग बुझाने के प्रयास कर रही हैं और संवेदनशील क्षेत्रों पर विशेष नजर रखी जा रही है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि सीमांत और ऊंचाई वाले इलाकों में आग को नियंत्रित करना आसान नहीं है, लेकिन हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं ताकि नुकसान को कम किया जा सके।
पर्यावरण संतुलन पर पड़ रहा प्रतिकूल असर
विशेषज्ञों के अनुसार, Kedarghati Forest Fire की असमय वनाग्नि से पर्यावरण संतुलन बिगड़ने का खतरा रहता है। जंगल नष्ट होने से न केवल कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है, बल्कि जल स्रोतों और मिट्टी की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है। आने वाले समय में इसका प्रभाव स्थानीय जलवायु और कृषि पर भी देखने को मिल सकता है।
नंदा देवी नेशनल पार्क की घटना से पहले ही बढ़ी थी चिंता
गौरतलब है कि हाल ही में चमोली जिले के नंदा देवी नेशनल पार्क क्षेत्र में भीषण आग लगी थी। लक्ष्मण गंगा और अलकनंदा नदी के बीच स्थित पहाड़ियों पर फैली आग को काबू में लाने में वन विभाग को करीब छह दिन लग गए थे। उस घटना ने पहले ही वनाग्नि को लेकर प्रशासन की चिंताओं को बढ़ा दिया था। अब केदारघाटी में सामने आई स्थिति ने एक बार फिर जंगलों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय लोगों ने की सतर्कता बढ़ाने की मांग
ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से जंगलों में निगरानी और संसाधन बढ़ाने की मांग की है। उनका कहना है कि आग की शुरुआती अवस्था में ही यदि नियंत्रण कर लिया जाए, तो बड़े नुकसान से बचा जा सकता है। साथ ही लोगों से भी अपील की जा रही है कि जंगलों में आग से जुड़ी किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना प्रशासन को दें।
समय रहते कदम उठाना जरूरी
Kedarghati Forest Fire केवल एक क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए चेतावनी है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल सभी की निगाहें वन विभाग और प्रशासन के प्रयासों पर टिकी हैं, ताकि इस असामान्य संकट से जंगलों और वन्यजीवों को बचाया जा सके।



