Human Wildlife Conflict: उत्तराखंड में लगातार बढ़ रहे Human Wildlife Conflict को लेकर अब सरकार ने नई और व्यापक रणनीति अपनाने का फैसला किया है। इस दिशा में सबसे अहम बदलाव यह है कि अब Human Wildlife Conflict समस्या केवल वन विभाग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जनप्रतिनिधियों, स्थानीय समुदायों और सामाजिक संगठनों की भी इसमें सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के निर्देशों के क्रम में राज्य में संवाद, जागरूकता और सामुदायिक सहयोग को केंद्र में रखकर कार्ययोजना तैयार की गई है।
इसी कड़ी में देहरादून में वन विभाग द्वारा एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें जनप्रतिनिधियों, विशेषज्ञों और Human Wildlife Conflict से सीधे प्रभावित लोगों को आमंत्रित किया गया। इस कार्यशाला का उद्देश्य न केवल समस्या पर चर्चा करना था, बल्कि जमीनी स्तर से सुझाव लेकर तुरंत प्रभावी दिशा-निर्देश जारी करना भी रहा।
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अब साझा जिम्मेदारी होगी संघर्ष की रोकथाम
कार्यशाला में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि Human Wildlife Conflict भूमिका को अहम बनाया जा रहा है। सरकार का मानना है कि जब तक स्थानीय लोग और जनप्रतिनिधि इस मुद्दे को अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक स्थायी समाधान संभव नहीं है। राज्य में चलाए जाने वाले जन जागरूकता अभियानों में स्थानीय भाषा के प्रयोग पर विशेष जोर दिया जाएगा, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग आसानी से संदेश को समझ सकें और समय रहते सावधानी बरत सकें।
संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और तकनीक का उपयोग
देहरादून में आयोजित कार्यशाला में राज्यसभा सांसद नरेश बंसल और कल्पना सैनी ने भी भाग लिया। इस दौरान Human Wildlife Conflict से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों की पहचान, मौजूदा रोकथाम उपायों की समीक्षा और नई तकनीकों के इस्तेमाल पर गहन चर्चा की गई।
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WWF इंडिया के प्रतिनिधियों ने जानकारी दी कि उत्तराखंड वन विभाग को रेडियो कॉलर उपलब्ध कराए गए हैं, जिनकी मदद से वन्यजीवों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। इन उपकरणों के बेहतर उपयोग से एक प्रभावी अलर्ट सिस्टम विकसित किया जा सकता है, जिससे ग्रामीणों को पहले ही खतरे की जानकारी मिल सके।
सोलर लाइट, फलदार पेड़ और जंगल प्रबंधन पर जोर
कार्यशाला में संवेदनशील गांवों में सोलर लाइट लगाने और उनके नियमित रखरखाव पर सहमति बनी। रात के समय रोशनी होने से वन्यजीवों की आवाजाही पर नजर रखना आसान होगा और हमलों की आशंका कम की जा सकेगी।
इसके साथ ही जंगलों के किनारे फलदार वृक्ष लगाने का प्रस्ताव रखा गया, ताकि वन्यजीवों को जंगल के भीतर ही पर्याप्त भोजन मिल सके और वे आबादी वाले क्षेत्रों की ओर न आएं। झाड़ी कटान और लैटाना जैसी आक्रामक वनस्पतियों को हटाने का निर्णय भी लिया गया, जिसमें ग्राम सभाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
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गुलदार हमलों पर विशेष फोकस
उत्तराखंड में गुलदार के हमले सबसे अधिक सामने आते हैं। इसे देखते हुए गुलदारों की वास्तविक संख्या जानने के लिए विशेष गणना कराने का सुझाव दिया गया। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन क्षेत्रों में खतरा अधिक है और वहां किस तरह की रणनीति अपनाई जानी चाहिए। इसके अलावा, फसल या जान-माल के नुकसान पर मिलने वाली अनुग्रह राशि को शीघ्र वितरित करने पर जोर दिया गया। अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि पीड़ितों को लंबा इंतजार न कराना पड़े, जिससे लोगों का भरोसा बना रहे और विभाग के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित हो।
सांसद निधि से मिलेगी आर्थिक मदद
राज्यसभा सांसद कल्पना सैनी ने इस अवसर पर घोषणा की कि Human Wildlife Conflict की रोकथाम के लिए उत्तराखंड के 12 जिलों को सांसद निधि से प्रति जिला 5-5 लाख रुपये दिए जाएंगे। इस राशि का उपयोग सोलर लाइट, सुरक्षा उपकरण और अन्य आवश्यक उपायों में किया जाएगा। सरकार और वन विभाग का मानना है कि जनप्रतिनिधियों और समुदाय की सक्रिय भागीदारी से Human Wildlife Conflict को काफी हद तक कम किया जा सकता है और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को सुरक्षित माहौल दिया जा सकेगा।
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