Student Suicide in Lucknow: उत्तर प्रदेश में बच्चों और किशोरों की मानसिक सेहत को लेकर हालात लगातार चिंताजनक होते जा रहे हैं। गाजियाबाद में तीन बहनों की आत्महत्या की घटना के बाद अब राजधानी लखनऊ से एक और दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है। यहां दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले एक छात्र ने मामूली बात पर हुए तनाव के बाद फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हम अपने बच्चों की भावनाओं को समझ पा रहे हैं।
स्कूल से आया मैसेज, घर में बढ़ा तनाव
लखनऊ के आलमबाग इलाके में रहने वाला 16 वर्षीय प्रतीक आनंद एक निजी स्कूल में दसवीं का छात्र था। पढ़ाई के दौरान उसकी प्रैक्टिकल फाइल समय पर तैयार नहीं हो पाई। इसी बात को लेकर स्कूल प्रशासन की ओर से उसकी मां के मोबाइल पर एक मैसेज भेजा गया, जिसमें फाइल जमा न होने पर शैक्षणिक नुकसान की बात कही गई थी।
मैसेज पढ़ते ही मां स्वाभाविक रूप से घबरा गईं। उन्हें डर था कि कहीं बेटे का साल खराब न हो जाए। इसी चिंता में उन्होंने प्रतीक को डांट दिया, लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि यह डांट बेटे के दिल पर इतना गहरा असर छोड़ देगी।
डांट के बाद खुद में सिमट गया छात्र
परिजनों के मुताबिक, मां की बात सुनने के बाद प्रतीक बिना कुछ कहे अपने कमरे में चला गया। उसने किसी से बातचीत नहीं की और दरवाजा बंद कर लिया। घरवालों ने सोचा कि कुछ देर में वह खुद बाहर आ जाएगा, लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी कमरे से कोई हलचल नहीं हुई।
शाम करीब छह बजे मां ने उसे चाय पीने के लिए आवाज लगाई, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया। कई बार आवाज देने और दरवाजा खटखटाने के बाद भी जब कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो पड़ोसियों को बुलाया गया।
दरवाजा खुलते ही सामने आया भयावह सच
पड़ोसियों की मदद से जब दरवाजा तोड़ा गया, तो अंदर का दृश्य देख सभी सन्न रह गए। कमरे में प्रतीक का शव दुपट्टे से बने फंदे से लटका हुआ था। कुछ ही पलों में पूरे घर में चीख-पुकार मच गई। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया।
पहले ही टूट चुका था परिवार
प्रतीक का परिवार पहले ही एक बड़ा दुख झेल चुका था। उसके पिता की साल 2009 में बीमारी के कारण मौत हो गई थी। इसके बाद से मां ही घर की सारी जिम्मेदारियां संभाल रही थीं। प्रतीक अपनी मां और बड़े भाई के साथ रहता था। परिवार का कहना है कि वह शांत स्वभाव का था और कभी किसी बड़ी परेशानी का जिक्र नहीं करता था।
गाजियाबाद की घटना से जुड़ती कड़ियां
इस घटना ने गाजियाबाद में हाल ही में हुई तीन बहनों की सामूहिक आत्महत्या की याद ताजा कर दी है। दोनों मामलों में एक समान बात यह सामने आई है कि बच्चे किसी मानसिक दबाव से जूझ रहे थे, लेकिन अपनी परेशानी किसी से खुलकर साझा नहीं कर सके।
गाजियाबाद में जहां बच्चियों का मोबाइल छीने जाने और सामाजिक दबाव की बात सामने आई थी, वहीं लखनऊ में पढ़ाई से जुड़ा तनाव एक मासूम जान पर भारी पड़ गया।
विशेषज्ञों की चेतावनी
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि किशोरावस्था बेहद संवेदनशील समय होता है। इस उम्र में बच्चों पर पढ़ाई, भविष्य, तुलना और उम्मीदों का दबाव तेजी से बढ़ता है। कई बार माता-पिता की सामान्य डांट भी बच्चों को अपमान या असफलता की तरह महसूस होने लगती है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर बच्चा अचानक चुप रहने लगे, अकेले में समय बिताने लगे या छोटी-छोटी बातों पर ज्यादा भावुक हो जाए, तो यह संकेत गंभीरता से लेने चाहिए।
संवाद की कमी बन रही बड़ी समस्या
आज के समय में सबसे बड़ी समस्या संवाद की कमी है। माता-पिता बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं, जबकि बच्चे अपने डर और दबाव को शब्दों में नहीं बदल पाते। यही खामोशी कई बार जानलेवा साबित हो जाती है।
समाज के लिए गहरी चेतावनी
लखनऊ की यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। पढ़ाई में गलती, फाइल का अधूरा रह जाना या डांट जीवन से बड़ा नहीं होता, लेकिन बच्चों को यह बात समझाने के लिए सहानुभूति और भरोसे की जरूरत होती है।
समय रहते समझ जरूरी
अगर माता-पिता, स्कूल और समाज मिलकर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दें, तो ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है। सख्ती से ज्यादा जरूरी है समझदारी, और डांट से ज्यादा जरूरी है संवाद। यह घटना हमें याद दिलाती है कि बच्चों की चुप्पी को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।



