UP Missing Persons Case: उत्तर प्रदेश में लापता लोगों की बढ़ती संख्या अब केवल आंकड़ों की बात नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक संकट का रूप ले चुकी है। बीते दो वर्षों में राज्य से 1 लाख 8 हजार से ज्यादा लोग लापता होने की शिकायतें दर्ज की गईं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इनमें से सिर्फ करीब 9,700 मामलों में ही पुलिस ने सक्रिय कार्रवाई शुरू की। इस चौंकाने वाले खुलासे के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका (PIL) में बदल दिया है।
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UP Missing Persons Case: आंकड़े जो चिंता बढ़ाते हैं
सरकार द्वारा कोर्ट में दाखिल हलफनामे के अनुसार, 1 जनवरी 2024 से 18 जनवरी 2026 के बीच प्रदेश में करीब 1,08,300 लापता लोगों की शिकायतें दर्ज हुईं। इनमें बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और युवा सभी शामिल हैं। लेकिन इन मामलों में से केवल लगभग 9,700 केसों में ही खोजबीन या ठोस कार्रवाई की गई। बाकी मामलों में या तो जांच शुरू ही नहीं हुई या फाइलें लंबित पड़ी रहीं।
UP Missing Persons Case: हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस बबीता रानी शामिल हैं, ने इन आंकड़ों को ‘हैरान करने वाला और चिंताजनक’ बताया। कोर्ट ने कहा कि लापता लोगों से जुड़े मामलों में तुरंत कार्रवाई सबसे जरूरी होती है, लेकिन अधिकारियों का रवैया बेहद सुस्त नजर आ रहा है। बेंच ने साफ कहा कि इस तरह की लापरवाही आम नागरिकों की सुरक्षा पर सवाल खड़े करती है।
UP Missing Persons Case: एक पिता की याचिका बनी बड़ी सुनवाई की वजह
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब विक्रमा प्रसाद नामक व्यक्ति ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। उन्होंने बताया कि उनका बेटा जुलाई 2024 में लापता हो गया, लेकिन पुलिस ने उसे ढूंढने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई। इस याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूरे प्रदेश के आंकड़े तलब किए, जिसके बाद यह चौंकाने वाली स्थिति सामने आई।
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UP Missing Persons Case: पुलिस की निष्क्रियता पर सवाल
कोर्ट ने यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। बेंच ने कहा कि जब किसी परिवार का सदस्य लापता होता है, तो वह केवल एक केस नहीं होता, बल्कि पूरे परिवार के लिए मानसिक, सामाजिक और आर्थिक संकट बन जाता है। इसके बावजूद यदि समय पर जांच न हो, तो यह प्रशासनिक असफलता मानी जाएगी।
UP Missing Persons Case: PIL में बदला गया मामला
हाईकोर्ट ने इस मुद्दे को व्यापक जनहित से जुड़ा मानते हुए कोर्ट रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इसे ‘In re: Missing Persons in the State’ नाम से जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया जाए। साथ ही यह भी आदेश दिया गया कि इस मामले की सुनवाई 5 फरवरी को फिर से की जाए, ताकि सरकार से ठोस जवाब और कार्ययोजना मांगी जा सके।
UP Missing Persons Case: समाज के लिए चेतावनी
लापता लोगों की बढ़ती संख्या केवल कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह समाज की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है। मानव तस्करी, जबरन मजदूरी, अपराध और साइबर फ्रॉड जैसे मामलों से इसका सीधा संबंध हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति और भयावह हो सकती है।
UP Missing Persons Case: उम्मीद की किरण
हालांकि, हाईकोर्ट का हस्तक्षेप इस मामले में एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। कोर्ट की सख्ती से यह उम्मीद जगी है कि अब सरकार और पुलिस तंत्र पर जवाबदेही तय होगी। यदि सही मॉनिटरिंग, टेक्नोलॉजी का उपयोग और त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था की जाए, तो हजारों परिवारों को राहत मिल सकती है।
UP Missing Persons Case: आगे क्या?
अब सबकी नजरें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या लापता लोगों की तलाश के लिए कोई विशेष टास्क फोर्स बनेगी? क्या पुलिस की जवाबदेही तय होगी? और सबसे बड़ा सवाल क्या उन हजारों परिवारों को इंसाफ मिलेगा, जो अब भी अपनों की राह देख रहे हैं?
यह मामला सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और सिस्टम की जिम्मेदारी का है। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद उम्मीद की जा रही है कि उत्तर प्रदेश में लापता लोगों की तलाश को अब गंभीरता से लिया जाएगा और प्रशासन की सुस्ती पर लगाम लगेगी।
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