फिर करीब आते दिख रहे SAD और बीजेपी
2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय जनता पार्टी के बीच गठबंधन को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। एक तरफ SAD गठबंधन के संकेत दे रहा है, तो दूसरी तरफ बीजेपी ने साफ कर दिया है कि अगर गठबंधन होता है तो पार्टी को इसमें ‘बड़े भाई’ की भूमिका चाहिए। पूर्व केंद्रीय मंत्री और SAD सांसद हरसिमरत बादल ने संगरूर में एक रैली के दौरान गठबंधन के मजबूत संकेत दिए थे, जिसके अगले दिन उनके भाई और पूर्व कैबिनेट मंत्री बिक्रम मजीठिया ने इसे पंजाब की जरूरत बताया।
मजीठिया बोले- गठबंधन वक्त की मांग
शिरोमणि अकाली दल के महासचिव बिक्रम मजीठिया ने कहा कि पंजाब को गठबंधन की जरूरत है और राज्य के लोग भी यही चाहते हैं। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था, सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से यह गठबंधन बेहद जरूरी है। मजीठिया के मुताबिक दोनों पार्टियों के बीच अलगाव कृषि कानूनों के मुद्दे पर हुआ था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं और रुख भी बदलना चाहिए।
बीजेपी की शर्त- ‘बड़े भाई’ का दर्जा चाहिए
पंजाब बीजेपी के उपाध्यक्ष फतेह जंग बाजवा ने कहा कि पार्टी अब पांच साल पहले वाली बीजेपी नहीं रही और सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। उनके मुताबिक अगर अकाली दल बीजेपी को ‘बड़े भाई’ की भूमिका देने पर राजी होता है, तभी पार्टी हाईकमान गठबंधन पर विचार कर सकता है। उन्होंने साफ किया कि ‘बड़े भाई’ होने का मतलब ज्यादा सीटें और मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी बीजेपी का होना है।
क्यों तेज हुईं अटकलें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और SAD प्रदेश अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की हालिया मुलाकात के बाद से गठबंधन की चर्चाओं ने जोर पकड़ा है। दोनों दल लंबे समय तक साथ रहे, लेकिन कृषि कानूनों को लेकर मतभेद के बाद 2020 में गठबंधन टूट गया था। इसका असर 2022 के विधानसभा चुनाव में भी दिखा, जब SAD को सिर्फ तीन और बीजेपी को दो सीटें मिलीं। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 18.56% वोट मिले, जबकि SAD को 13.42% वोट मिले।
एक्सपर्ट बोले- दोनों को होगा फायदा
गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर कुलदीप सिंह के मुताबिक गठबंधन होने या न होने का फैसला दोनों दलों पर निर्भर करेगा, लेकिन इससे दोनों को राजनीतिक फायदा मिल सकता है क्योंकि पहले भी यह गठबंधन सफल रहा है। उनका मानना है कि गठबंधन से बीजेपी को मजबूती मिलेगी, जबकि अकाली दल बिखरे गुटों के बीच एक प्रमुख ताकत बनकर उभर सकता है।


