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Devkinandan Thakur: टीआरपी की दौड़ में सच गायब? सनातन, इतिहास और मीडिया की चयनात्मक चुप्पी पर बड़ा सवाल

Lokhit Kranti
Last updated: 2026-01-13 8:40 अपराह्न
By Lokhit Kranti 7 महीना ago
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Devkinandan Thakur Media Coverage Controversy
Devkinandan Thakur: टीआरपी की दौड़ में सच गायब? सनातन, इतिहास और मीडिया की चयनात्मक चुप्पी पर बड़ा सवाल
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Devkinandan Thakur Media Coverage Controversy: आज के दौर में भारतीय मीडिया एक गहरे अंतर्विरोध से जूझती नजर आती है। खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाली मीडिया की भूमिका पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि उसकी प्राथमिकताएं अक्सर जनहित से हटकर TRP, क्लिक और वायरल बहसों तक सीमित दिखती हैं। नतीजा यह है कि कुछ मुद्दे बार-बार उछाले जाते हैं, जबकि कई गंभीर, संवेदनशील और सभ्यतागत विषय हाशिए पर चले जाते हैं।

Contents
Devkinandan Thakur Media Coverage Controversy : धर्माचार्य बोले तो विवाद क्यों?Devkinandan Thakur Media Coverage Controversy : इतिहास की बात या साजिश का नैरेटिव?Devkinandan Thakur Media Coverage Controversy : सनातन दर्शन और टीआरपी का टकरावDevkinandan Thakur Media Coverage Controversy:  पड़ोसी देशों में अत्याचार, लेकिन प्राइम टाइम खामोशDevkinandan Thakur Media Coverage Controversy : देवकीनंदन ठाकुर का पक्ष क्यों अहमDevkinandan Thakur Media Coverage Controversy: शोर बनाम विचारDevkinandan Thakur Media Coverage Controversy : विमर्श का स्तर तय करने की जरूरत

Devkinandan Thakur Media Coverage Controversy : धर्माचार्य बोले तो विवाद क्यों?

जब कोई धर्माचार्य समाज, संस्कृति या इतिहास के संदर्भ में बात करता है खासतौर पर सनातन परंपरा से जुड़ा कोई संत तो कई TV चैनलों के लिए वह बयान अचानक ‘विवाद’ बन जाता है। लेकिन यही संत जब ज्ञान, भक्ति, नीति, समाज सुधार या सांस्कृतिक एकता जैसे विषयों पर बोलते हैं, तो कैमरे अक्सर बंद ही रहते हैं। सवाल उठता है कि क्या मीडिया का फोकस अब विचारों से ज्यादा विवाद पर टिक गया है?

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Devkinandan Thakur Media Coverage Controversy : इतिहास की बात या साजिश का नैरेटिव?

भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश एक साझा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूभाग से निकले हैं। यह तथ्य न नया है और न ही विवादित। इतिहासकारों और दस्तावेजों में यह दर्ज है कि विभाजन से पहले यह क्षेत्र सामाजिक और पारिवारिक रूप से जुड़ा हुआ था। समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियों, आक्रमणों और सत्ता समीकरणों के कारण बड़े पैमाने पर बदलाव हुए।

लेकिन जब कोई संत इस ऐतिहासिक सच्चाई का उल्लेख करता है, तो कुछ चैनल इसे ‘नफरत फैलाने’ या ‘साजिश’ के रूप में पेश करने लगते हैं। बयान के संदर्भ को काट-छांट कर ब्रेकिंग न्यूज बनाई जाती है और स्टूडियो बहसों में पहले ही फैसला सुना दिया जाता है।

Devkinandan Thakur Media Coverage Controversy : सनातन दर्शन और टीआरपी का टकराव

यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि वेद, उपनिषद, गीता या भारतीय ज्ञान परंपरा जैसे विषय मीडिया के लिए आकर्षक नहीं माने जाते। अखंड भारत की अवधारणा, जो सांस्कृतिक एकता की बात करती है, उसे कई बार राजनीतिक एजेंडा कहकर खारिज कर दिया जाता है।

इसके उलट, अगर कोई आधा-अधूरा वीडियो क्लिप या सनसनीखेज लाइन मिल जाए, तो वही घंटों तक चलाई जाती है। यहां सवाल धर्म का नहीं, बल्कि चयनात्मक नजरिए का है।

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Devkinandan Thakur Media Coverage Controversy:  पड़ोसी देशों में अत्याचार, लेकिन प्राइम टाइम खामोश

पाकिस्तान में मंदिरों पर हमले, जबरन धर्मांतरण और अल्पसंख्यक हिंदुओं की स्थिति कोई छिपी हुई सच्चाई नहीं है। बांग्लादेश में भी समय-समय पर हिंदू समुदाय और मठों पर हमलों की खबरें सामने आती रही हैं। इसके बावजूद ये मुद्दे मीडिया के प्राइम टाइम का हिस्सा नहीं बनते।

ना तो इन पर बड़ी बहसें होती हैं, न ही लगातार कवरेज। सवाल उठता है कि क्या ये मुद्दे इसलिए नजरअंदाज किए जाते हैं क्योंकि इनमें टीआरपी की चमक नहीं है?

Devkinandan Thakur Media Coverage Controversy : देवकीनंदन ठाकुर का पक्ष क्यों अहम

कथावाचक और धर्माचार्य देवकीनंदन ठाकुर वर्षों से सनातन मूल्यों, संस्कृति और समाज को जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। उनकी कथाएं सिर्फ भक्ति तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि इतिहास, नीति और राष्ट्रबोध से भी जुड़ी होती हैं।

जब वह अखंड भारत या सभ्यतागत एकता की बात करते हैं, तो उसका अर्थ राजनीतिक सीमाएं मिटाना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखना होता है। ऐसे वक्तव्यों को पूरे संदर्भ में समझना और दिखाना मीडिया की जिम्मेदारी होनी चाहिए।

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Devkinandan Thakur Media Coverage Controversy: शोर बनाम विचार

आज की मीडिया में ज्ञान से ज्यादा शोर बिकता नजर आता है। संतुलित व्याख्या की जगह टकराव और सनसनी को प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे में धर्माचार्यों की बात को समझने की बजाय उन्हें कटघरे में खड़ा करना आसान हो जाता है। अगर मीडिया सचमुच समाज का दर्पण है, तो उसे यह भी दिखाना होगा कि पड़ोसी देशों में क्या हो रहा है, सनातन परंपरा क्या कहती है और संत किस संदर्भ में बोल रहे हैं।

Devkinandan Thakur Media Coverage Controversy : विमर्श का स्तर तय करने की जरूरत

यह लेख किसी एक चैनल या व्यक्ति पर आरोप नहीं, बल्कि मीडिया की एक व्यापक प्रवृत्ति पर सवाल है। सनातन, इतिहास और धर्माचार्यों से जुड़े मुद्दों पर भावनाओं के बजाय तथ्यों और संदर्भों के साथ विमर्श होना चाहिए।

देवकीनंदन ठाकुर जैसे संतों की बात को सुनना, समझना और फिर सहमति या असहमति जताना यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। TRP क्षणिक हो सकती है, लेकिन सभ्यता और समाज से जुड़े सवाल स्थायी होते हैं। अब यह मीडिया को तय करना है कि वह किसे प्राथमिकता देती है क्षणिक शोर को या दीर्घकालिक सत्य को।

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