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Lokhitkranti > राष्ट्रीय > Climate Change : पहाड़ों से मैदान तक क्यों विकराल रूप में आई प्रकृति
राष्ट्रीय

Climate Change : पहाड़ों से मैदान तक क्यों विकराल रूप में आई प्रकृति

Lokhit Kranti
Last updated: 2025-09-03 12:53 अपराह्न
By Lokhit Kranti 12 महीना ago
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Climate Change
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Climate Change : पहाड़ खिसक रहे हैं,जो शहर के शहर को खत्म कर रहे हैं , नदिया उफान पर है,कही कही भूकंप की खबरे भी आ रही है, बादल पानी बरसाने चले तो बीच में ही फट गए और फिर लोगों के पलायन का कहर शुरू जिसमें मकान ढह रहे हैं,गाड़िया बह रही है,आदमी पेड़ के पत्ते की तरह जल में बह रहा है । जल जो जीवन देता है वहीं मृत्यु का कारण भी बन रहा हैं।

Contents
Climate Change : झूठा का पर्यावरण बचाओ का खेलClimate Change : शहरीकरण के नाम पर पर्यावरण से हो रहा खेलClimate Change : क्या बदला ?Climate Change : फिर बताओ प्रकृति बदला क्यों ना ले?Climate Change : पर्यावरण टैक्स के नाम पर भी हो रहा प्रदूषणClimate Change : डायनामाइट से चिरा पहाड़ों का सीना

आखिर क्या माजरा है? दरअसल माजरा ,पूरी तरह समझने की जरूरत है। पर्यावरण बचाओ ,धरती बचाओ के नाम पर जो खेल पर्यावरण प्रेमी , सरकारें कर रही है वो समझने की जरूरत है ।

Climate Change : झूठा का पर्यावरण बचाओ का खेल

बड़ी शान से कानून बना दिया गया की एक पेड़ काटो तो दस लगाओ,नहीं तो पर्यावरण नष्ट करने में जेल जाओ,जुर्माना भरो। सच तो यह है कि पेड़ लगाने को ही पर्यावरण रक्षा मान लिया ,और पर्यावरण बचाने का पूरा भार इन पेड़ों पर डाल दिया। जो प्रकृति के नियम विरुद्ध है। बढ़ता हुआ शहरीकरण इसके लिए जिम्मेदार है , दिल्ली के आसपास सैकड़ों किमोमीटर तक मल्टी स्टोरी भवन बन चुके है ।

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Climate Change : शहरीकरण के नाम पर पर्यावरण से हो रहा खेल

छोटा सा उदाहरण लेते है।पहले नोएडा ,फिर ग्रेटर नोएडा ,फिर यमुना एक्सप्रेस ऑथोरिटी,अब न्यू नोएडा ,आगे बुलंदशहर ऑथोरियो ,हापुड़ पिलखुवा,गुरुग्राम सुंदर शहर यानी दिल्ली के चारों ओर जहां हरियाली होती थी ,कभी सरसों के फूल,कभी खेत में गेहूं की लहराती बालिया,कभी मक्का के खेत ,ज्वार बाजरा , चना मटर के फूल फिर फसल ,गन्ने के खेत और हर घर गाय, भैंस बलिया,रथ, बैलगाड़ियां ये कृषक की जीविका का साधन ही नहीं , अपितु पर्यावरण का भी श्रोत थे और है।

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Climate Change : क्या बदला ?

आज क्या है? थैली का दूध, खेती की जमीन पर बहुमंजिला भवन जिसमें पर्यावरण रक्षा के लिए कुछ गमले और गिनती के बॉटल पाम के पेड़ लगे है और सैकड़ों गाड़िया खड़ी है,जनरेटर है ,सुबह को विदेश नस्ल के कुत्ते घूमते मिलेंगे।ये वही जगह है जहां कभी हिरन,खरगोश,नीलगाय, सुकर,कछुआ , सियार,लोमड़ी आदि स्वच्छंद विचरते थे।हजारों तरह के पक्षी तितलियों ,मोर,चिड़ियां जिनकी अलग अलग आवाजें मानव से उनके प्रेम और एकीकरण का प्रतीक रही हैं,आज चिड़ियाघर में टिकट लेकर देख सकते हैं। जंगलों में जहां गाय चरने जाती थीं वो अब गौशाला के कैदखाने में अंतिम सांस ले रही है,क्योंकि शहरी कानून में आप गौ नहीं रख सकते बकरी , ऊट भेड़ रख सकते हैं। मानव ने कितनी तरक्की की है।

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जमीन खत्म करके जीवन खत्म करने की कोई जिम्मेदारी नहीं लेगा। सभी नेताओं ,नीति निर्धारकों ,पर्यावरण रक्षक और न्यायधीशों को प्लॉट चाहिए फॉर्महाउस चाहिए,सुबह घूमने के लिए किलोमीटर लंबा पार्क चाहिए। खेती नहीं सिर्फ डिजाइनर पेड़ लगे होने चाहिए। पहले हर दो तीन किलोमीटर पर एक नहीं दो दो पोखरे होती थी,लेकिन अब वो पुरानी पोखर ,बरसात के अखाड़े ,बरसाती नाले नहीं दिखने चाहिए क्योंकि प्लॉट कट चुके है ,यहां मच्छर होते थे,अब मानव को सुकुन और शान दोनों की जरूरत है।

Climate Change : फिर बताओ प्रकृति बदला क्यों ना ले?

जरा सी गर्मी क्या पड़ गई ,आदमी एसी से बाहर नहीं निकल रहा ,गर्म हवा को इतनी ठंडी बना रहा है कि सर्दी का आनंद अभी से मिल जाए।और ये एसी क्या कर रहे है,गैस उत्सर्जन जो पर्यावरण को खत्म कर रही है। लेकिन मानव को चैन से आनंद से रहना है,क्योंकि सड़क पर कुछ पेड़ लगे है ,उनकी जिम्मेदारी है पर्यावरण बचाओ,मंत्री भी ये कह गए हैं। शुरूआत ने ,1977 में संजय गांधी ने पेड़ लगाओ शुरू किया अब तक सैकड़ों करोड़ पेड़ लगे ,नतीजा शून्य क्योंकि असली मुद्दा गायब है। बड़ी चालाकी वाला शहरीकरण का खेल हुआ है।

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Climate Change : पर्यावरण टैक्स के नाम पर भी हो रहा प्रदूषण

दिल्ली ने कमर्शियल वाहन घुसने से पहले पर्यावरण टैक्स दे रहे है ,और आधा घंटा लाइन में भी लगे है ,सुबह से रात तक गाड़िया का जाम पूरे भारत के हरेक शहर में है । इनका धुवां ,गाड़ियों लगे एसी पर्यावरण की रक्षा कर रहे है। कोई पैदल नहीं चलेगा ,क्योंकि मानव को चैन ,आराम ,और सुख चाहिए ।गाड़ियों के धुवां पर्यावरण की रक्षा ये पर्यावरण टैक्स करेगा । अब पहाड़ की तरफ चलते है ,जो कभी वनस्पति और औषधियों के भंडार रहे है।लेकिन अब वहां होटल ,मार्केट और बहुमंजिला इमारतें बन गई।

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Climate Change : डायनामाइट से चिरा पहाड़ों का सीना

पहाड़ की छाती में डायनामाइट से छेद करके सड़के बना दी और पहाड़वासी जो तेजी ये एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर जाते थे अब वहा बसे चल रही हैं,बड़ी बड़ी गाड़ियों की कतार में लोग पहाड़ देखने जा रहे है।अब कहा कभी ऋषि मुनि तपस्या करने जाया करते थे अब वहा शानदार होटल और देर रात्रि की पार्टियां चल रही होती है। वास्तव में मानव ने बड़ी तरक्की की है,लेकिन प्रकृति भी अपना बदला लेती है। बाढ़ आना , बादल फटना ,,जमीन खिसकना,ये प्राकृतिक आपदा है ,दो चार पेड़ लगाने से नहीं दूर होने वाली।इसके लिए जमीन को बचाओ,पहाड़ बचाओ,खेती को बचाओ,पोखर नाले बचाओ,फार्म हाउस की संस्कृति खत्म करो और अनावश्यक विशाल पार्कों के बजाय वहां सरसों के पीले फूल लहलहाने दो।केवल कानून बनाने और भाषण से काम नहीं होगा,स्वयं को धोखा नहीं देना चाहिए।

यह भी पढ़े- UP News : फतेहपुर में दर्दनाक मंजर, घर में घुसा बेकाबू ट्रक

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