ISIS Uranium Niger: अफ्रीकी देश नाइजर की राजधानी नियामे एक बार फिर वैश्विक सुरक्षा के केंद्र में आ गई है। यहां करीब 1000 टन यूरेनियम के भंडार को लेकर आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) की नजर होने की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल ही में ISIS से जुड़े लड़ाकों ने इस रणनीतिक सामग्री पर कब्जा जमाने की कोशिश की, लेकिन सुरक्षा बलों ने उनके प्रयास को नाकाम कर दिया। हालांकि, आतंकी संगठन ने दोबारा हमले की धमकी दी है।
यह सवाल अब हर किसी के मन में है कि, अगर 1000 टन यूरेनियम गलत हाथों में चला गया, तो क्या वाकई 107 परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं? आइए, इस पूरे मुद्दे को विस्तार से समझते हैं।
ISIS Uranium Niger: नाइजर का यूरेनियम क्यों है इतना अहम?
नाइजर दुनिया के प्रमुख यूरेनियम उत्पादक देशों में गिना जाता है। यहां की खदानें दशकों से यूरोप और अन्य देशों के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों को ईंधन देती रही हैं। यूरेनियम परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए तो जरूरी है ही, लेकिन इसका संवर्धित (Enriched) रूप परमाणु हथियार बनाने में भी इस्तेमाल होता है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि खदान से निकला कच्चा यूरेनियम सीधे परमाणु बम में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसके लिए जटिल संवर्धन प्रक्रिया, उच्च तकनीक और अत्यधिक नियंत्रित वैज्ञानिक ढांचा चाहिए। फिर भी, इतनी बड़ी मात्रा में यूरेनियम का किसी आतंकी संगठन के हाथ लगना वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
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ISIS Uranium Niger: क्या 1000 टन यूरेनियम से बन सकते हैं 107 परमाणु हथियार?
विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु हथियार बनाने के लिए उच्च स्तर पर संवर्धित यूरेनियम (HEU) की आवश्यकता होती है। आमतौर पर एक परमाणु बम के लिए लगभग 15–25 किलोग्राम उच्च संवर्धित यूरेनियम की जरूरत पड़ती है। यदि 1000 टन (यानी 10,00,000 किलोग्राम) यूरेनियम को पूरी तरह हथियार-ग्रेड में बदला जाए जो कि तकनीकी रूप से बेहद कठिन और महंगा काम है, तो सैद्धांतिक रूप से बड़ी संख्या में हथियार बनाए जा सकते हैं।
हालांकि ‘107 परमाणु हथियार’ का आंकड़ा एक अनुमान है, जो इस आधार पर लगाया जाता है कि उपलब्ध यूरेनियम का कितना हिस्सा हथियार-ग्रेड में परिवर्तित किया जा सकता है। लेकिन यह प्रक्रिया वर्षों की विशेषज्ञता, उन्नत सेंट्रीफ्यूज तकनीक और अंतरराष्ट्रीय निगरानी से बचने की क्षमता मांगती है जो किसी गैर-राज्य आतंकी संगठन के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है।
ISIS Uranium Niger: ISIS की मंशा क्या है?
इस्लामिक स्टेट पहले भी इराक और सीरिया में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल के आरोपों में घिर चुका है। संगठन की रणनीति हमेशा अधिकतम भय और अस्थिरता पैदा करने की रही है। अगर उसे यूरेनियम जैसे रेडियोधर्मी पदार्थ तक पहुंच मिलती है, तो वह ‘डर्टी बम’ (Radiological Dispersal Device) जैसे हथियार बनाने की कोशिश कर सकता है।
डर्टी बम पारंपरिक विस्फोटक के साथ रेडियोधर्मी सामग्री फैलाता है। इससे बड़े पैमाने पर दहशत, आर्थिक नुकसान और पर्यावरणीय प्रदूषण हो सकता है, भले ही परमाणु विस्फोट न हो।
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ISIS Uranium Niger: अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता
संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देशों की खुफिया एजेंसियां इस घटनाक्रम पर करीबी नजर रखे हुए हैं। अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता, सैन्य तख्तापलट और आतंकवादी गतिविधियां बढ़ी हैं। ऐसे में रणनीतिक संसाधनों की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बन गई है।
नाइजर में हालिया राजनीतिक उथल-पुथल के बाद सुरक्षा ढांचे में बदलाव आया है। इससे आतंकवादी संगठनों को मौके तलाशने का अवसर मिल सकता है। यही वजह है कि वैश्विक शक्तियां वहां की यूरेनियम साइट्स की सुरक्षा को लेकर अलर्ट हैं।
ISIS Uranium Niger: परमाणु हथियार बनाना कितना मुश्किल?
परमाणु हथियार निर्माण कोई साधारण प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए चाहिए –
- अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम
- उन्नत वैज्ञानिक विशेषज्ञता
- जटिल इंजीनियरिंग
- सुरक्षित परीक्षण और असेंबली सुविधाएं
- अंतरराष्ट्रीय निगरानी से बचने की क्षमता
कई देशों ने दशकों की मेहनत और अरबों डॉलर खर्च करके परमाणु क्षमता हासिल की है। ऐसे में किसी आतंकी संगठन के लिए यह काम लगभग असंभव माना जाता है। लेकिन रेडियोधर्मी सामग्री का सीमित उपयोग कर दहशत फैलाना संभव है और यही असली खतरा है।
ISIS Uranium Niger: क्या है आगे का रास्ता?
विशेषज्ञों का सुझाव है कि यूरेनियम भंडार की सुरक्षा बढ़ाई जाए। अंतरराष्ट्रीय सहयोग और खुफिया साझेदारी मजबूत हो। साहेल क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने के लिए राजनीतिक समाधान निकाला जाए। परमाणु सामग्री की ट्रैकिंग और निगरानी के लिए उन्नत तकनीक अपनाई जाए। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में ऐसे खतरे और गंभीर रूप ले सकते हैं।
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