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Lokhitkranti > अंतर्राष्ट्रीय > Iran Nuclear Deal: ईरान परमाणु डील में पाकिस्तान की एंट्री! अमेरिका क्यों बना रहा गारंटर?
अंतर्राष्ट्रीय

Iran Nuclear Deal: ईरान परमाणु डील में पाकिस्तान की एंट्री! अमेरिका क्यों बना रहा गारंटर?

Lokhit Kranti
Last updated: 2026-05-29 8:48 अपराह्न
By Lokhit Kranti 2 महीना ago
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America Iran Relations
Iran Nuclear Deal: ईरान परमाणु डील में पाकिस्तान की एंट्री! अमेरिका क्यों बना रहा गारंटर?
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America Iran Relations: मध्य पूर्व की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। ईरान और अमेरिका के बीच संभावित परमाणु समझौते को लेकर अब पाकिस्तान का नाम सबसे अहम किरदार के तौर पर सामने आ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और कतर समेत कई देशों के बीच इस बात पर सहमति बन गई है कि अगर नई परमाणु डील होती है, तो उसमें पाकिस्तान को “गारंटर’ यानी गवाही देने वाले देश के रूप में शामिल किया जाएगा। माना जा रहा है कि इस समझौते के फाइनल ड्राफ्ट पर अमेरिका, ईरान और पाकिस्तान तीनों के हस्ताक्षर हो सकते हैं।

Contents
पाकिस्तान को गारंटर बनाने के पीछे क्या है अमेरिका की रणनीति?ईरान पर दबाव बनाने का आसान रास्तामुस्लिम देशों को भरोसे में लेने की कोशिशचीन और रूस को दूर रखने की चालदक्षिण एशिया में अमेरिका की नई चालपाकिस्तान और ईरान का पुराना परमाणु कनेक्शन

ईरान लंबे समय से यह मांग कर रहा था कि किसी भी नई परमाणु डील में एक भरोसेमंद गारंटर जरूर होना चाहिए, क्योंकि तेहरान को अमेरिका पर पूरी तरह भरोसा नहीं है। इससे पहले भी कई बार परमाणु समझौतों को लेकर बातचीत हुई, लेकिन बाद में हालात बदल गए और समझौते कमजोर पड़ गए। ऐसे में अब पाकिस्तान को गारंटर बनाने की चर्चा ने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। (America Iran Relations)

पाकिस्तान को गारंटर बनाने के पीछे क्या है अमेरिका की रणनीति?

अमेरिका की इस रणनीति के पीछे सिर्फ परमाणु समझौता ही नहीं, बल्कि मिडिल ईस्ट और दक्षिण एशिया की बड़ी भू-राजनीतिक चाल भी छिपी हुई मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान को बीच में लाकर अमेरिका कई मोर्चों पर एक साथ अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। (America Iran Relations)

ईरान पर दबाव बनाने का आसान रास्ता

पाकिस्तान और ईरान के बीच करीब 909 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है। दोनों देशों के बीच वर्षों से रणनीतिक और सुरक्षा संबंध बने हुए हैं। अमेरिका का मानना है कि अगर भविष्य में ईरान गुप्त तरीके से अपने परमाणु कार्यक्रम को दोबारा शुरू करने की कोशिश करता है, तो पाकिस्तान के जरिए इसकी जानकारी जल्दी मिल सकती है।

पाकिस्तान खुद एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है। ऐसे में अमेरिका को लगता है कि इस्लामाबाद ईरान पर दबाव बनाने की स्थिति में रहेगा। रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि जब फरवरी में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या हुई थी, तब पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिन्हें सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने सख्ती से नियंत्रित किया था। (America Iran Relations)

read also: US-Iran Deal: कतर में चल रही है महाडील की तैयारी, 60 दिनों के सीजफायर में रिलीज होगा ईरान का पैसा

मुस्लिम देशों को भरोसे में लेने की कोशिश

अमेरिका यह भी समझता है कि अगर किसी पश्चिमी देश को गारंटर बनाया गया तो मिडिल ईस्ट के कई मुस्लिम देशों में अविश्वास पैदा हो सकता है। पाकिस्तान को आगे कर अमेरिका सऊदी अरब, तुर्की और कतर जैसे देशों को भरोसे में लेना चाहता है। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पहले से मजबूत डिफेंस साझेदारी है। वहीं तुर्की और पाकिस्तान के रिश्ते भी काफी करीबी माने जाते हैं। कतर भी पाकिस्तान को एक भरोसेमंद इस्लामिक सहयोगी के रूप में देखता है। ऐसे में अमेरिका पाकिस्तान के जरिए यह संदेश देना चाहता है कि इस समझौते से मुस्लिम देशों के हितों को नुकसान नहीं पहुंचेगा। (America Iran Relations)

चीन और रूस को दूर रखने की चाल

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चीन या रूस को इस परमाणु समझौते का गारंटर बनाया जाता, तो भविष्य में अमेरिका की सैन्य रणनीतियां सीमित हो सकती थीं। चीन और रूस दोनों ही ईरान के करीबी साझेदार हैं और वे किसी संभावित अमेरिकी हमले का खुलकर विरोध कर सकते हैं। लेकिन पाकिस्तान के मामले में अमेरिका के सामने ऐसी कोई बड़ी रणनीतिक बाध्यता नहीं होगी। पाकिस्तान अमेरिका के साथ भी रिश्ते बनाए रखना चाहता है और चीन के साथ भी। ऐसे में वॉशिंगटन के लिए इस्लामाबाद एक “संतुलित विकल्प’ बनकर उभर रहा है। (America Iran Relations)

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दक्षिण एशिया में अमेरिका की नई चाल

अमेरिका की नजर सिर्फ ईरान पर नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के बदलते हालात पर भी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार अफगानिस्तान के बरगाम बेस को दोबारा हासिल करने की इच्छा जता चुके हैं। चीन की बढ़ती ताकत को देखते हुए अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाना चाहता है। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान की मदद अमेरिका के लिए बेहद अहम हो सकती है। यही वजह है कि वॉशिंगटन इस्लामाबाद को नाराज करने के बजाय उसे रणनीतिक सहयोगी के रूप में मजबूत करना चाहता है। (America Iran Relations)

पाकिस्तान और ईरान का पुराना परमाणु कनेक्शन

ईरान के परमाणु कार्यक्रम में पाकिस्तान का नाम पहले भी कई बार जुड़ चुका है। पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान पर अतीत में यह आरोप लग चुका है कि उन्होंने तेहरान को परमाणु तकनीक से जुड़ी अहम जानकारियां दी थीं। यही कारण है कि अमेरिका मानता है कि पाकिस्तान ईरान की परमाणु गतिविधियों को सबसे बेहतर तरीके से समझता है। खुद डोनाल्ड ट्रंप भी कह चुके हैं कि “तेहरान को सबसे ज्यादा अगर कोई जानता है तो वह पाकिस्तान है।’ (America Iran Relations)

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