Bulldozer vs Justice: शहर में अतिक्रमण के खिलाफ नगर निगम का अभियान एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार यह अभियान 80 वर्षीय ऊर्मिला के जीवन पर भारी पड़ गया। पिछले 40 वर्षों से सड़क किनारे खोखा लगाकर गुजारा करने वाली ऊर्मिला का रोजगार नगर निगम के बुलडोजर ने छीन लिया। वार्ड 59 के पार्षद की शिकायत पर की गई इस कार्रवाई ने न केवल ऊर्मिला की आजीविका छीनी, बल्कि शहर में अतिक्रमण के खिलाफ एकपक्षीय कार्रवाई के सवाल भी उठाए हैं।
ऊर्मिला, जो उम्र के इस पड़ाव पर बीमार रहती हैं, ने अपने खोखे से परिवार का भरण-पोषण किया। उनका छोटा-सा खोखा न सिर्फ उनकी आजीविका का साधन था, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए भी सुविधा का केंद्र था। लेकिन नगर निगम ने बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के उनके खोखे को ध्वस्त कर दिया। ऊर्मिला की व्यथा सुनकर स्थानीय लोग भी आक्रोशित हैं। उनका कहना है कि जब पूरे शहर में बड़े-बड़े अतिक्रमण खुले आम चल रहे हैं, तो एक बुजुर्ग महिला के छोटे से खोखे पर कार्रवाई क्यों?
सुनीता दयाल ने किया कार्रवाई का समर्थन (Bulldozer vs Justice)
महापौर सुनीता दयाल ने इस कार्रवाई का समर्थन करते हुए कहा, “शहर में अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह अभियान व्यवस्था और स्वच्छता के लिए जरूरी है।” लेकिन सवाल यह है कि क्या यह अभियान वास्तव में निष्पक्ष है?

शहर के पॉश इलाकों में अवैध निर्माण, बड़े-बड़े होर्डिंग्स, और अनधिकृत दुकानें खुलेआम चल रही हैं, लेकिन कार्रवाई का शिकार ज्यादातर गरीब और छोटे व्यापारी ही क्यों बनते हैं? ऊर्मिला जैसे लोग, जो समाज के सबसे कमजोर वर्ग से आते हैं, इस अभियान की चपेट में आ रहे हैं, जबकि बड़े अतिक्रमणकारियों पर कार्रवाई की खबरें कम ही सुनाई देती हैं।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि वार्ड 59 के पार्षद ने निजी स्वार्थ के चलते ऊर्मिला के खिलाफ शिकायत दर्ज की। इस घटना ने नगर निगम की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए हैं। क्या अतिक्रमण हटाने का अभियान वास्तव में शहर की बेहतरी के लिए है, या यह सिर्फ दिखावे की कार्रवाई है?

ऊर्मिला जैसे लोगों के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था के बिना ऐसी कार्रवाइयाँ उनके जीवन को और कठिन बना रही हैं। समाज और प्रशासन को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
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