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Lokhitkranti > दिल्ली एनसीआर > Nilkanth Varni Statue Akshardham: अक्षरधाम में आध्यात्मिक इतिहास रचा गया, 108 फीट ऊंची नीलकंठवर्णी प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा, विश्व शांति का संदेश
दिल्ली एनसीआर

Nilkanth Varni Statue Akshardham: अक्षरधाम में आध्यात्मिक इतिहास रचा गया, 108 फीट ऊंची नीलकंठवर्णी प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा, विश्व शांति का संदेश

Lokhit Kranti
Last updated: 2026-03-26 2:41 अपराह्न
By Lokhit Kranti 6 महीना ago
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Nilkanth Varni Statue Akshardham
Nilkanth Varni Statue Akshardham: अक्षरधाम में आध्यात्मिक इतिहास रचा गया, 108 फीट ऊंची नीलकंठवर्णी प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा, विश्व शांति का संदेश
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Nilkanth Varni Statue Akshardham: देश की राजधानी में स्थित स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर में गुरुवार का दिन आध्यात्मिक दृष्टि से ऐतिहासिक बन गया, जब तपोमूर्ति श्रीनीलकंठवर्णी की 108 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा (Nilkanth Varni Statue Akshardham) वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हुई। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि वैश्विक शांति, मानवता और आध्यात्मिक मूल्यों का एक विराट संदेश बनकर उभरा। इस दिव्य अनुष्ठान का नेतृत्व महंतस्वामी महाराज ने किया, जिनकी उपस्थिति ने पूरे आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की।

Contents
दुनियाभर से संतों का संगम, आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बना दिल्ली108 फीट ऊंची प्रतिमा: तप और त्याग का जीवंत प्रतीकनीलकंठवर्णी की तपस्या – आध्यात्मिक यात्रा की प्रेरक कहानीविश्व शांति का संदेश बना आयोजन का केंद्रआध्यात्मिकता के साथ आधुनिकता का संगमआस्था से आगे बढ़कर मानवता का संदेश

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दुनियाभर से संतों का संगम, आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बना दिल्ली

इस भव्य समारोह में केवल भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया सहित दुनिया के कई देशों से 300 से अधिक संत और महंत शामिल हुए। अक्षरधाम परिसर में इन दिनों एक अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिला, जहां हर ओर भक्ति, साधना और शांति का संदेश गूंजता रहा। आयोजन की शुरुआत एक दिन पहले ‘विश्व शांति महायज्ञ’ से हुई थी, जिसमें वैदिक परंपराओं के अनुसार विशेष अनुष्ठान संपन्न किए गए।

108 फीट ऊंची प्रतिमा: तप और त्याग का जीवंत प्रतीक

श्रीनीलकंठवर्णी (Nilkanth Varni Statue Akshardham) की यह विशाल प्रतिमा अपनी भव्यता और आध्यात्मिक संदेश के कारण विशेष महत्व रखती है। पंचधातु से निर्मित यह प्रतिमा एक ही चरण में तैयार की गई है और इसे 8 फीट ऊंचे आधार पर स्थापित किया गया है। करीब एक वर्ष की मेहनत के बाद तैयार हुई इस प्रतिमा में कांस्य धातु का प्रमुख रूप से उपयोग किया गया है। इसे आकार देने में अक्षरधाम के संतों के साथ लगभग 50 कारीगरों और अनेक स्वयंसेवकों का योगदान रहा। यह प्रतिमा भगवान स्वामीनारायण के उस तपस्वी स्वरूप को दर्शाती है, जब उन्होंने नीलकंठवर्णी के रूप में कठोर साधना की थी।

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नीलकंठवर्णी की तपस्या – आध्यात्मिक यात्रा की प्रेरक कहानी

भगवान स्वामीनारायण ने बाल्यावस्था में ही सांसारिक जीवन त्यागकर आध्यात्मिक मार्ग अपनाया। मात्र 11 वर्ष की आयु में घर छोड़कर उन्होंने पूरे भारत की कठिन यात्रा शुरू की, जो लगभग 7 वर्षों तक चली। इस दौरान उन्होंने 12,000 किलोमीटर से अधिक की पदयात्रा की और देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों का भ्रमण किया। हिमालय की कठिन वादियों से लेकर दक्षिण के रामेश्वरम और पश्चिम के द्वारका तक उनकी यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना की यात्रा थी। नेपाल के मुक्तिनाथ (पुलहाश्रम) में उन्होंने एक पैर पर खड़े रहकर महीनों तक तपस्या की, जिसका प्रतीक यह नई प्रतिमा है।

विश्व शांति का संदेश बना आयोजन का केंद्र

इस आयोजन को केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि वैश्विक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्तमान समय में दुनिया के कई हिस्सों में चल रहे संघर्षों के बीच, यहां से शांति और एकता का संदेश दिया गया। महंतस्वामी महाराज ने इस अवसर पर विश्व के सभी देशों के बीच सद्भाव, मैत्री और शांति की कामना की। उन्होंने सफेद कबूतर छोड़कर यह संदेश दिया कि मानवता के लिए शांति और सहयोग ही सबसे बड़ा मार्ग है।

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आध्यात्मिकता के साथ आधुनिकता का संगम

अक्षरधाम परिसर में स्थापित यह प्रतिमा न केवल आस्था का केंद्र बनेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भारतीय संस्कृति, तप और त्याग के मूल्यों से भी परिचित कराएगी। यह आयोजन इस बात का उदाहरण है कि किस तरह परंपरा और आधुनिक शिल्पकला मिलकर एक ऐसा प्रतीक रच सकते हैं, जो वैश्विक स्तर पर प्रेरणा का स्रोत बन जाए।

आस्था से आगे बढ़कर मानवता का संदेश

नीलकंठवर्णी प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि एक व्यापक संदेश है मानवता, शांति और आध्यात्मिक मूल्यों का। यह आयोजन आज के समय में उस दिशा की ओर इशारा करता है, जहां दुनिया को संघर्ष नहीं, बल्कि सहयोग और सह-अस्तित्व की जरूरत है।

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