Kerala Women Period Leave: केरल सरकार एक बार फिर अपने सामाजिक कल्याण मॉडल को लेकर राष्ट्रीय चर्चा में आ गई है। कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) सरकार ने महिलाओं और बच्चों के लिए कई नई योजनाओं की घोषणा की है, जिनमें स्कूली छात्राओं के लिए हर महीने तीन दिन का मासिक धर्म अवकाश (Kerala Women Period Leave) देने का प्रस्ताव सबसे ज्यादा चर्चा में है। इसके अलावा, 50 से अधिक कर्मचारियों वाले सभी संस्थानों में डे-केयर सेंटर और क्रेच अनिवार्य करने की तैयारी भी की जा रही है।
राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने शुक्रवार को विधानसभा में सरकार का नीतिगत अभिभाषण पढ़ते हुए इन योजनाओं की जानकारी दी। सरकार का दावा है कि इन पहलों का उद्देश्य केरल को देश का सबसे महिला-अनुकूल (Kerala Women Period Leave) राज्य बनाना है।
छात्राओं को हर महीने मिलेगा पीरियड लीव
सरकार की सबसे बड़ी घोषणा स्कूली छात्राओं के लिए मासिक धर्म अवकाश (Kerala Women Period Leave) को लेकर रही। प्रस्ताव के मुताबिक छात्राओं को हर महीने अधिकतम तीन दिन की छुट्टी दी जाएगी, ताकि वे शारीरिक असहजता के दौरान मानसिक दबाव के बिना आराम कर सकें।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि छुट्टियों के कारण पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए सप्ताहांत में अतिरिक्त कक्षाएं आयोजित की जाएंगी। इस योजना को ‘प्रोजेक्ट मेंस्ट्रुअल डिग्निटी’ का हिस्सा बताया गया है, जिसका मकसद स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों को लड़कियों और महिलाओं के लिए अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनाना है। भारत में मासिक धर्म (Kerala Women Period Leave) को लेकर अब भी सामाजिक झिझक मौजूद है। ऐसे में सरकारी स्तर पर यह पहल महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा को लेकर एक बड़ा संदेश मानी जा रही है।
अब हर बड़े संस्थान में होगा क्रेच और डे-केयर सेंटर
केरल सरकार ने कामकाजी महिलाओं को राहत देने के लिए एक और अहम कदम (Kerala Women Period Leave) उठाया है। नई नीति के तहत सरकारी कार्यालयों, औद्योगिक इकाइयों, आईटी पार्क और 50 से अधिक कर्मचारियों वाले सभी संस्थानों में सुरक्षित और उच्च गुणवत्ता वाले डे-केयर सेंटर और क्रेच की व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। यह प्रस्ताव मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के प्रावधानों के आधार पर तैयार किया गया है। सरकार का मानना है कि कामकाजी महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बच्चों की देखभाल है। ऐसे में कार्यस्थल पर ही डे-केयर सुविधा मिलने से महिलाओं की कार्यक्षमता और भागीदारी दोनों बढ़ेंगी।
असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को भी मिलेगा फायदा
सरकार ने केवल कॉर्पोरेट और सरकारी क्षेत्र तक ही अपनी योजनाओं को सीमित नहीं रखा है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए भी छह महीने के मातृत्व अवकाश की घोषणा की गई है। इसके अलावा जरूरतमंद महिलाओं को सैनिटरी नैपकिन, जूते-चप्पल और अन्य जरूरी वस्तुएं उपलब्ध कराने की योजना भी तैयार की जा रही है। सरकार का कहना है कि महिला कल्याण सिर्फ नीतियों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका असर रोजमर्रा के जीवन में भी दिखना चाहिए।
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‘अनाथ-मुक्त केरल’ बनाने की तैयारी
महिलाओं और बच्चों से जुड़ी योजनाओं के साथ सरकार ने ‘निराश्रित एवं अनाथ-मुक्त केरल’ अभियान का भी ऐलान किया है। इसके तहत गोद लेने को बढ़ावा देने के लिए विशेष अभियान चलाए जाएंगे। साथ ही प्रशिक्षित और उचित वेतन पाने वाले फोस्टर परिवारों का नेटवर्क तैयार किया जाएगा, जो अनाथ बच्चों की देखभाल करेंगे। सरकार का लक्ष्य केरल को भारत का पहला ‘अनाथ-मुक्त राज्य’ बनाना है। विशेषज्ञ इसे केवल सामाजिक कल्याण नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक मानवीय निवेश मान रहे हैं।
महिलाओं के लिए समान वेतन और सार्वजनिक सुविधाओं पर जोर
राज्यपाल ने अपने अभिभाषण में कहा कि सरकार कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए समान वेतन सुनिश्चित करने की दिशा में भी काम करेगी। इसके अलावा केरल के प्रमुख शहरों में आधुनिक सार्वजनिक शौचालय सुविधाएं विकसित करने की योजना है। सरकार का कहना है कि महिला सुरक्षा और सम्मान केवल कानूनों से नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं से भी तय होता है। इसलिए सार्वजनिक स्थानों को अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने पर जोर दिया जाएगा।
क्या देश के लिए बनेगा नया मॉडल?
केरल की इन योजनाओं को केवल राज्य की नीति नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रयोग के रूप में भी देखा जा रहा है। ऐसे समय में जब देशभर में महिलाओं की कार्यभागीदारी, स्वास्थ्य और शिक्षा पर बहस जारी है, केरल का यह मॉडल दूसरे राज्यों के लिए उदाहरण बन सकता है। अब निगाहें इस बात पर होंगी कि ये घोषणाएं जमीन पर कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से लागू होती हैं। यदि योजनाएं सफल रहीं, तो केरल एक बार फिर सामाजिक विकास के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर नई दिशा तय कर सकता है।
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