Supreme Court Judges Increase: देश की न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा एक अहम फैसला सामने आया है। केंद्र सरकार ने अध्यादेश जारी कर सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 कर दिया है। इस फैसले के बाद शीर्ष अदालत में लंबित नियुक्तियों की प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है। विधि मंत्रालय द्वारा शनिवार को जारी अधिसूचना के अनुसार, यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956 में किया गया है और इसे तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है। इस बदलाव (Supreme Court Judges Increase) के बाद अब मुख्य न्यायाधीश सहित सुप्रीम कोर्ट में कुल 38 जज होंगे।
क्या है नया बदलाव?
अब तक सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court Judges Increase) में प्रधान न्यायाधीश समेत 34 जजों की स्वीकृत संख्या थी। नए अध्यादेश के तहत इसमें चार पदों की वृद्धि की गई है। इसका सीधा मतलब है कि अब अदालत में अधिक मामलों की सुनवाई और तेजी से निपटान की संभावना बढ़ सकती है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में दो जजों के पद पहले से ही खाली चल रहे थे। नई व्यवस्था लागू होने के बाद अब कुल छह पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकेगी।
कॉलेजियम सिस्टम पर भी असर
इस फैसले (Supreme Court Judges Increase) का असर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की कार्यप्रणाली पर भी देखने को मिलेगा। अब कॉलेजियम को शीर्ष अदालत में जजों की नियुक्ति के लिए छह नामों की सिफारिश करनी होगी। न्यायिक व्यवस्था में नियुक्तियों की यह प्रक्रिया बेहद अहम मानी जाती है, क्योंकि इससे सीधे तौर पर न्याय वितरण की गति और गुणवत्ता प्रभावित होती है।
सरकार का तर्क: न्याय व्यवस्था को मजबूत करना उद्देश्य
सरकारी सूत्रों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में बढ़ते मामलों के बोझ को देखते हुए यह कदम उठाया गया है। लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे न्याय देने की प्रक्रिया पर दबाव बन रहा है। सरकार का मानना है कि जजों की संख्या बढ़ने से मामलों का निपटारा तेज होगा और आम नागरिकों को न्याय पाने में कम समय लगेगा।
पहले भी हुआ था संशोधन
यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या में बदलाव किया गया हो। इससे पहले वर्ष 2019 में जजों की संख्या को 30 से बढ़ाकर 33 किया गया था। उस समय भी उद्देश्य न्यायिक क्षमता को मजबूत करना और लंबित मामलों को कम करना था।
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मानसून सत्र में लाया जाएगा विधेयक
सूत्रों के अनुसार, इस अध्यादेश को कानून का स्थायी रूप देने के लिए संसद के आगामी मानसून सत्र में एक विधेयक पेश किया जाएगा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 5 मई को ही इस प्रस्तावित विधेयक को मंजूरी दे दी थी। संसद से पारित होने के बाद यह संशोधन स्थायी कानून का हिस्सा बन जाएगा और न्यायपालिका की संरचना में औपचारिक बदलाव दर्ज हो जाएगा।
न्यायिक प्रणाली पर संभावित असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जजों की संख्या बढ़ाने से मामलों के निपटारे की गति में सुधार हो सकता है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि न्यायिक ढांचे और संसाधनों में भी सुधार जरूरी है। लंबित मामलों का बोझ भारतीय न्यायपालिका के सामने लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है, और इस तरह के कदम उस दिशा में सुधारात्मक प्रयास माने जा रहे हैं।
आगे की प्रक्रिया पर नजर
अब सभी की नजर इस बात पर है कि कॉलेजियम द्वारा कौन से नामों की सिफारिश की जाती है और नई नियुक्तियां कितनी तेजी से पूरी होती हैं। इसके साथ ही मानसून सत्र में पेश होने वाला विधेयक भी इस फैसले को कानूनी रूप से और मजबूत करेगा। यह बदलाव भारतीय न्यायिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम माना जा रहा है, जिसका असर आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली पर साफ दिखाई दे सकता है।
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