Gold Repatriation by India: दुनिया की अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है और वैश्विक तनावों के बीच अब देश अपनी संपत्तियों को लेकर ज्यादा सतर्क हो गए हैं। इसी बीच भारत ने भी एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाया है। Gold Repatriation by India अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पिछले कुछ समय से विदेशों में रखा अपना सोना तेजी से वापस देश ला रहा है। यह सिर्फ एक वित्तीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक आत्मनिर्भरता से जुड़ा फैसला माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते भू-राजनीतिक माहौल में भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार और सोने को बाहरी जोखिमों से सुरक्षित करना चाहता है।
भारत के पास कितना सोना है?
RBI की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास इस समय कुल 880.52 मीट्रिक टन सोना मौजूद है। इनमें से करीब 680 टन सोना अब देश के भीतर सुरक्षित रखा गया है। यानी कुल भंडार का लगभग 77 प्रतिशत हिस्सा भारत में ही मौजूद है।
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वहीं करीब 197.67 टन सोना अभी भी बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) के पास रखा हुआ है। Gold Repatriation by India की रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल छह महीनों के भीतर 104 टन से ज्यादा सोना वापस भारत लाया गया है।
पहले विदेशों में क्यों रखा जाता था सोना?
दशकों से दुनिया के कई देश अपना सोना लंदन और न्यूयॉर्क जैसे वित्तीय केंद्रों में रखते रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह सुरक्षा और आसान अंतरराष्ट्रीय लेन-देन थी। बैंक ऑफ इंग्लैंड और फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क लंबे समय से वैश्विक गोल्ड स्टोरेज हब माने जाते हैं।
यहां रखा सोना जरूरत पड़ने पर तेजी से खरीदा-बेचा जा सकता था, इसलिए कई केंद्रीय बैंक विदेशों में अपनी संपत्ति सुरक्षित रखते थे।
अब क्यों बदल रही है रणनीति?
Gold Repatriation by India के पीछे सबसे बड़ा कारण दुनिया में बढ़ती राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता मानी जा रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस और अफगानिस्तान की विदेशी संपत्तियों पर लगाए गए प्रतिबंधों ने कई देशों को सतर्क कर दिया। दुनिया को यह एहसास हुआ कि विदेशों में रखी संपत्तियां राजनीतिक फैसलों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। ऐसे में भारत अब अपनी आर्थिक सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए सोना देश के भीतर रखना चाहता है।
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RBI की रणनीति क्या कहती है?
विशेषज्ञों के अनुसार, Gold Repatriation by India एक तरह का ‘स्ट्रैटेजिक इंश्योरेंस’ है। अगर भविष्य में वैश्विक संकट या वित्तीय अस्थिरता बढ़ती है, तो अपने देश में रखा सोना तुरंत इस्तेमाल किया जा सकता है। यह कदम विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के साथ-साथ भारत की आर्थिक स्वतंत्रता को भी बढ़ाता है। हालांकि भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार कुछ समय में घटा है, लेकिन उसमें सोने की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है।
दुनिया के दूसरे देश भी उठा रहे ऐसे कदम
भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जो अपना सोना वापस ला रहा हो। Gold Repatriation by India की तरह कई यूरोपीय देशों ने भी हाल के वर्षों में अपनी रणनीति बदली है। फ्रांस ने न्यूयॉर्क से अपना 129 टन सोना वापस पेरिस शिफ्ट किया है। जर्मनी ने भी 2014 से 2017 के बीच सैकड़ों टन सोना वापस मंगाया था। पोलैंड और अन्य देशों ने भी अपने गोल्ड रिजर्व को घरेलू तिजोरियों में रखने पर जोर दिया है।
भारत को क्या होगा फायदा?
विशेषज्ञों का मानना है कि Gold Repatriation by India से देश को कई स्तर पर फायदा मिलेगा। सबसे पहले, इससे भारत की आर्थिक सुरक्षा मजबूत होगी। दूसरा, किसी वैश्विक संकट की स्थिति में सोने तक तत्काल पहुंच बनी रहेगी।
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तीसरा, यह कदम अंतरराष्ट्रीय बाजारों को यह संकेत देता है कि भारत अपनी वित्तीय रणनीति को लेकर गंभीर और आत्मनिर्भर बन रहा है। इसके अलावा घरेलू स्तर पर गोल्ड रिजर्व बढ़ने से निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होता है।
क्या इससे वैश्विक बाजार पर असर पड़ेगा?
हालांकि फिलहाल इससे वैश्विक बाजार पर बड़ा असर देखने को नहीं मिला है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में यह ट्रेंड और तेज हो सकता है। अगर कई देश लगातार अपना सोना वापस मंगाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय गोल्ड स्टोरेज सिस्टम और वित्तीय ढांचे पर असर पड़ सकता है। Gold Repatriation by India इस बात का संकेत है कि अब देश अपनी संपत्तियों को लेकर ज्यादा सतर्क और रणनीतिक सोच अपना रहे हैं।
बदलती दुनिया में आर्थिक सुरक्षा की नई सोच
वैश्विक राजनीति और आर्थिक तनावों के इस दौर में सिर्फ विदेशी मुद्रा भंडार होना काफी नहीं माना जा रहा। देश अब यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनकी संपत्तियां उनके अपने नियंत्रण में रहें।
Gold Repatriation by India इसी नई सोच का हिस्सा है, जहां आर्थिक सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह रणनीति भारत की वित्तीय ताकत और वैश्विक स्थिति को और मजबूत कर सकती है।
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