Haryana Mustard Procurement Crisis: हरियाणा की मंडियों में सरसों (Haryana Mustard Procurement Crisis) की सरकारी खरीद का पहला दिन किसानों के लिए उम्मीद नहीं, बल्कि निराशा लेकर आया। जिस स्तर की अव्यवस्था, तकनीकी खामियां और प्रबंधन की कमी सामने आई, उसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने राज्य सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए इसे ‘किसानों के साथ धोखा’ करार दिया।
घंटों इंतजार, फिर भी नहीं हुई खरीद
राज्य की 90% से अधिक मंडियों में पहले दिन सरकारी खरीद लगभग ठप रही। हजारों किसान सुबह 5 बजे से अपनी फसल लेकर मंडियों में पहुंचे, लेकिन शाम तक भी उनकी फसल की खरीद शुरू (Haryana Mustard Procurement Crisis) नहीं हो सकी। किसानों को पूरे दिन धूप में लाइन में खड़े रहना पड़ा और कई जगहों से उन्हें बिना फसल बेचे ही वापस लौटना पड़ा। जींद, हिसार, फतेहाबाद, रेवाड़ी और रोहतक जैसे जिलों से सबसे ज्यादा शिकायतें सामने आई हैं।
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आंकड़े बता रहे बड़ी लापरवाही
जानकारी के अनुसार, सरसों (Haryana Mustard Procurement Crisis) की आवक 1.2 लाख क्विंटल से ज्यादा हो चुकी थी, लेकिन सरकारी एजेंसियां 5% तक खरीद भी नहीं कर सकीं। यह स्थिति तब है जब सरकार ने खुद 13 लाख मीट्रिक टन सरसों खरीदने का लक्ष्य तय किया है। पहले ही दिन की यह धीमी शुरुआत न केवल तैयारी की कमी दर्शाती है, बल्कि सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाती है।
ई-खरीद पोर्टल बना सबसे बड़ी बाधा
खरीद प्रक्रिया में सबसे बड़ी रुकावट ई-खरीद पोर्टल की तकनीकी खराबी रही। सर्वर बार-बार क्रैश होता रहा, डेटा वेरिफिकेशन में भारी गड़बड़ी सामने आई और सिस्टम अपडेट न होने के कारण किसानों को गेट पास तक नहीं मिल सके। करीब 5000 से ज्यादा किसानों को ‘रिकॉर्ड मैच नहीं’ का कारण बताकर लौटा दिया गया। यह सवाल उठता है कि जब खरीद की तारीख पहले से तय थी, तो डिजिटल सिस्टम को समय रहते दुरुस्त क्यों नहीं किया गया?
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मंडियों में बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव
तकनीकी खामियों के अलावा मंडियों में बुनियादी सुविधाओं की हालत भी बेहद खराब रही। न बारदाना उपलब्ध था, न तुलाई के कांटे पर्याप्त थे और न ही मजदूरों की व्यवस्था। कई जगहों पर पीने का पानी, शौचालय और बैठने की सुविधा तक नहीं थी। किसान अपनी फसल के साथ खुले आसमान के नीचे परेशान होते रहे।
MSP से कम दाम पर बेचने को मजबूर किसान
सरकार ने सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 6200 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, लेकिन हालात ऐसे बने कि किसानों को अपनी फसल 5300 से 5800 रुपये प्रति क्विंटल के बीच निजी व्यापारियों को बेचनी पड़ी। इससे यह आरोप भी मजबूत हुआ है कि सरकारी खरीद की सुस्ती निजी व्यापारियों को फायदा पहुंचा रही है।
सरकार पर तीखे आरोप
अनुराग ढांडा ने नायब सिंह सैनी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह सरकार ‘घोषणाओं में नंबर वन, लेकिन जमीन पर पूरी तरह फेल’ साबित हो रही है। उन्होंने कहा कि किसानों से बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन फसल बेचने के समय सरकार की तैयारी पूरी तरह नाकाम रही।
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गेहूं सीजन से पहले चेतावनी
उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले दिनों में गेहूं की फसल भी मंडियों (Haryana Mustard Procurement Crisis) में पहुंचेगी। अगर सरकार ने अभी से व्यवस्था नहीं सुधारी, तो हालात और भी खराब हो सकते हैं और लाखों किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है।
आंदोलन की चेतावनी
आम आदमी पार्टी ने साफ किया है कि अगर जल्द ही ई-खरीद पोर्टल दुरुस्त नहीं किया गया, मंडियों में सुविधाएं नहीं बढ़ाई गईं और समय पर खरीद सुनिश्चित नहीं हुई, तो पार्टी किसानों की आवाज को हर मंच पर उठाएगी। हरियाणा की मंडियों में सरसों खरीद (Haryana Mustard Procurement Crisis) के पहले दिन का अनुभव यह बताता है कि सिर्फ नीतियां बनाना काफी नहीं है, बल्कि उनके सही क्रियान्वयन की भी जरूरत होती है।किसानों की मेहनत और समय का सम्मान तभी होगा, जब सिस्टम जमीनी स्तर पर मजबूत और जवाबदेह बने।
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