Shia Mosque Attacks: पाकिस्तान में शिया मुसलमानों की मस्जिदों, इमामबारगाहों और मजलिसों पर होने वाले धमाके कोई नई बात नहीं हैं। पिछले कई दशकों से यह समुदाय सुनियोजित हिंसा का शिकार होता रहा है। सवाल यह नहीं है कि धमाके क्यों हो रहे हैं, बल्कि सवाल यह है कि ये बार-बार शिया मुसलमानों को ही क्यों निशाना बनाते हैं?
Shia Mosque Attacks: शिया-सुन्नी टकराव – जड़ में छुपी वैचारिक नफरत
पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा की सबसे बड़ी वजह शिया और सुन्नी समुदाय के बीच लंबे समय से चला आ रहा वैचारिक टकराव है। हालांकि आम शिया और सुन्नी मुसलमान साथ रहते हैं, लेकिन कुछ कट्टरपंथी सुन्नी संगठन शिया समुदाय को ‘काफिर’ मानते हैं। यही सोच आगे चलकर हिंसा का रूप ले लेती है।
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Shia Mosque Attacks: कट्टरपंथी संगठनों की खुली साजिश
पाकिस्तान में कई प्रतिबंधित आतंकी संगठन रहे हैं, जैसे –
- लश्कर-ए-झंगवी
- सिपाह-ए-सहाबा पाकिस्तान
- तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP)
इन संगठनों का घोषित एजेंडा ही शिया मुसलमानों का सफाया रहा है। ये संगठन शिया मस्जिदों को इसलिए निशाना बनाते हैं क्योंकि –
- एक ही जगह बड़ी संख्या में लोग मौजूद होते हैं
- धार्मिक स्थल होने से डर और दहशत ज्यादा फैलती है
- अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खिंचता है
Shia Mosque Attacks: ईरान फैक्टर और क्षेत्रीय राजनीति
शिया मुसलमानों को अक्सर ईरान से जोड़ा जाता है। पाकिस्तान में कट्टरपंथी गुट शिया समुदाय को ‘ईरान समर्थक’ बताकर उनके खिलाफ नफरत फैलाते हैं।
सऊदी अरब और ईरान के बीच चल रही क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता भी पाकिस्तान के अंदर सांप्रदायिक हिंसा को हवा देती है। कई बार विदेशी फंडिंग भी इन हमलों के पीछे बताई जाती है।
Shia Mosque Attacks: कमजोर कानून व्यवस्था और सरकारी चुप्पी
पाकिस्तान में शिया समुदाय बार-बार यह आरोप लगाता रहा है कि –
- हमलों के बाद जांच ठंडी पड़ जाती है
- दोषियों को सजा नहीं मिलती
- सुरक्षा के वादे सिर्फ कागजों तक सीमित रहते हैं
जब आतंकियों को सजा नहीं मिलती, तो उनका हौसला बढ़ता है। यही कारण है कि एक हमले के बाद दूसरा हमला होता है।
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Shia Mosque Attacks: अल्पसंख्यक होने की कीमत
पाकिस्तान में शिया मुसलमान आबादी का लगभग 15–20% हैं, लेकिन कई इलाकों में वे अल्पसंख्यक हैं। अल्पसंख्यक होने की वजह से उनकी राजनीतिक आवाज कमजोर रहती है। सुरक्षा की मांगों को नजरअंदाज किया जाता है और उनकी हत्याएं ‘रूटीन खबर’ बन जाती हैं।
Shia Mosque Attacks: धार्मिक स्थलों को क्यों बनाया जाता है निशाना?
आतंकी जानते हैं कि मस्जिद या इमामबारगाह पर हमला करने से धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं, बदले की भावना पैदा होती है और समाज में तनाव और दंगे भड़क सकते हैं। यानी मकसद सिर्फ जान लेना नहीं, बल्कि पूरे देश को अस्थिर करना होता है।
Shia Mosque Attacks: मीडिया और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान में शिया मस्जिदों पर हमले अक्सर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां नहीं बनते। कई मामलों में खबरें दबा दी जाती हैं। हमलावर संगठनों का नाम लेने से बचा जाता है। सांप्रदायिक एंगल को ‘सुरक्षा मुद्दा’ कहकर टाल दिया जाता है
Shia Mosque Attacks: क्या यह सिर्फ धार्मिक हिंसा है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक, वैचारिक और रणनीतिक हिंसा है। आतंकी संगठन शिया समुदाय को निशाना बनाकर यह दिखाना चाहते हैं कि राज्य उन्हें रोक नहीं सकता।
Shia Mosque Attacks: आगे का रास्ता क्या है?
अगर पाकिस्तान को इस हिंसा से बाहर निकलना है तो कट्टरपंथी विचारधारा पर सख्त कार्रवाई करनी होगी। शिया समुदाय को समान सुरक्षा देनी होगी। आतंकी संगठनों की फंडिंग रोकनी होगी और सबसे जरूरी, नफरत फैलाने वालों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस अपनानी होगी। जब तक ऐसा नहीं होगा, शिया मस्जिदों में धमाके सिर्फ खबरें बनते रहेंगे और इंसानियत हर बार हारती रहेगी।
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