Allahabad High Court decision: धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर कोई व्यक्ति अपने निजी घर, निजी भवन या निजी परिसर में शांतिपूर्ण तरीके से पूजा, नमाज या किसी भी तरह की धार्मिक प्रार्थना करता है, तो उसके लिए प्रशासन से अनुमति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह फैसला 2 फरवरी 2026 को सुनाया गया, जिसे मौलिक अधिकारों की मजबूती की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
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संविधान ने दी है धर्म मानने की पूरी आजादी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा कि हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उससे जुड़े कर्मकांड करने की पूरी स्वतंत्रता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कोई धार्मिक गतिविधि पूरी तरह निजी दायरे में हो और उससे किसी तरह की अशांति न फैलती हो, तो उस पर रोक लगाना संविधान की भावना के खिलाफ है। प्रशासन का कर्तव्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है, न कि बिना वजह हस्तक्षेप करना।
निजी परिसर में छूट, लेकिन पूरी तरह अनुशासित तरीके से
हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह स्वतंत्रता बिना शर्त नहीं है। यह अधिकार तभी तक मान्य होगा, जब तक प्रार्थना सभा पूरी तरह निजी परिसर के भीतर हो, किसी तरह का शोर-शराबा न हो, लाउडस्पीकर या तेज आवाज का इस्तेमाल न किया जाए और न ही इसका असर सार्वजनिक व्यवस्था पर पड़े। अगर किसी धार्मिक गतिविधि से आम लोगों को परेशानी होती है या कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है, तो प्रशासन कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगा।
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सार्वजनिक स्थानों पर नियम पहले जैसे ही रहेंगे
हाईकोर्ट ने निजी और सार्वजनिक स्थानों के बीच साफ फर्क भी बताया। अदालत ने कहा कि सड़क, पार्क, मैदान, सार्वजनिक भवन या किसी खुले स्थान पर धार्मिक कार्यक्रम, जुलूस या सभा आयोजित करने से पहले संबंधित प्रशासन या पुलिस को सूचना देना और अनुमति लेना जरूरी रहेगा। सार्वजनिक स्थानों पर शांति और सुरक्षा बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, इसलिए वहां नियमों का पालन अनिवार्य होगा।
किस विवाद से जुड़ा था मामला
यह फैसला एक याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता का आरोप था कि प्रशासन ने उसके निजी परिसर में हो रही शांतिपूर्ण प्रार्थना सभा पर आपत्ति जताई और अनुमति की मांग की। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि वह बिना किसी शोर-शराबे के अपने निजी भवन में धार्मिक गतिविधि कर रहा था, इसके बावजूद प्रशासन ने रोकने की कोशिश की, जो उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
प्रशासन को कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की बात से सहमति जताते हुए प्रशासन की भूमिका पर नाराज़गी जाहिर की। अदालत ने कहा कि निजी जीवन और निजी संपत्ति में नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों में अनावश्यक हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने साफ संदेश दिया कि प्रशासन को कानून के दायरे में रहकर ही कार्रवाई करनी चाहिए।
आने वाले समय में क्या होगा असर
इस फैसले के बाद धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में एक स्पष्ट दिशा तय हो गई है। निजी घरों में पूजा-पाठ, नमाज़, सत्संग या प्रार्थना सभा करने वालों को बड़ी राहत मिलेगी। साथ ही प्रशासन के लिए भी यह साफ हो गया है कि हर धार्मिक गतिविधि को संदेह की नजर से नहीं देखा जा सकता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला एक संतुलित संदेश देता है धर्म मानना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक शांति और व्यवस्था से समझौता किसी भी हाल में नहीं किया जा सकता।
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