Himalayan Glacier Threat: देश के अन्य हिमालयी राज्यों की तरह उत्तराखंड में भी इस सर्दी कुछ इलाकों में बर्फबारी जरूर हुई है, लेकिन विशेषज्ञ इसे नाकाफी मान रहे हैं। आमतौर पर नवंबर से शुरू होने वाली बारिश और बर्फबारी का सिलसिला इस बार लगभग गायब रहा। नवंबर और दिसंबर के बाद जनवरी के तीन हफ्ते भी प्रदेश में सूखे जैसे हालात बने रहे। ऐसे में यह स्थिति केवल मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा Himalayan Glacier Threat , प्राकृतिक जल स्रोतों और आने वाले महीनों में पेयजल उपलब्धता पर पड़ सकता है।
बदलता सर्दियों का मिजाज बना चिंता का कारण
उत्तराखंड में सर्दियों का मौसम इस बार पूरी तरह बदला-बदला नजर आया। जहां पहले नवंबर से ही ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ गिरने लगती थी, वहीं इस बार लंबा इंतजार करना पड़ा। जनवरी के तीसरे हफ्ते तक प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में बारिश की एक बूंद तक दर्ज नहीं हुई। 23 जनवरी को जरूर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी हुई, लेकिन जानकारों का कहना है कि यह बहुत देर से हुई और मात्रा भी जरूरत के मुताबिक नहीं है।
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ग्लोबल वार्मिंग और मौसम चक्र में बदलाव
वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौसम का प्राकृतिक चक्र तेजी से बदल रहा है। Himalayan Glacier Threat इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनते जा रहे हैं। समय पर बर्फबारी न होना, मानसून का असंतुलन और तापमान में असामान्य उतार-चढ़ाव इसी बदलाव का नतीजा है। उत्तराखंड में इस बार नवंबर और दिसंबर लगभग पूरी तरह सूखे रहे, जबकि यही समय ग्लेशियरों के लिए सबसे अहम माना जाता है।

Himalayan Glacier के लिए खतरे की घंटी
भू-वैज्ञानिकों का मानना है कि देर से होने वाली बर्फबारी ग्लेशियरों को पर्याप्त पोषण नहीं दे पाती। उत्तराखंड अंतरिक्ष विज्ञान केंद्र के पूर्व निदेशक और भू-वैज्ञानिक एमपीएस बिष्ट के अनुसार, जब बर्फ समय पर गिरती है तो ऊंची चोटियों पर धीरे-धीरे जमती रहती है। इससे नीचे की पुरानी बर्फ मजबूत होती है और ग्लेशियर को जीवन मिलता है। लेकिन जब बर्फबारी देर से होती है, तो वह ज्यादा समय तक टिक नहीं पाती और जल्दी पिघल जाती है। यही वजह है कि इस साल की Himalayan Glacier Threat के लिहाज से कमजोर माना जा रहा है।
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आंकड़े भी जता रहे हैं गंभीर हालात
अगर बारिश और बर्फबारी के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और साफ हो जाती है। 1 नवंबर से 20 जनवरी के बीच उत्तराखंड में शून्य बारिश दर्ज की गई। इसी अवधि में हिमाचल प्रदेश में 3.8 मिमी, जम्मू-कश्मीर में 20.5 मिमी और लद्दाख में 1.2 मिमी बारिश हुई। जनवरी महीने के पहले 21 दिनों में भी उत्तराखंड में कहीं बारिश नहीं हुई, जबकि अन्य हिमालयी राज्यों में हल्की बारिश रिकॉर्ड की गई। यह पिछले करीब 10 वर्षों में पहली बार हुआ है जब दिसंबर में पूरे राज्य में एक बूंद भी बारिश नहीं हुई।
23 जनवरी की बर्फबारी से मिली सीमित राहत
23 जनवरी 2026 को उत्तराखंड सहित कई हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी और बारिश जरूर हुई। ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ की सफेद चादर बिछने से लोगों ने राहत की सांस ली। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि एक या दो स्पेल से शुरुआती महीनों की कमी की भरपाई नहीं हो सकती। अगर आने वाले हफ्तों में पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय नहीं हुआ, तो गर्मियों में इसके दुष्परिणाम साफ नजर आएंगे।
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सूखते जल स्रोत और बढ़ता पेयजल संकट
बारिश और बर्फबारी की कमी का सबसे सीधा असर पहाड़ों के प्राकृतिक जल स्रोतों पर पड़ता है। कई इलाकों में गाड़-गधेरे, नौले और धाराएं पहले से कमजोर हो चुकी हैं। जियोलॉजिस्ट प्रो. एसपी सती का कहना है कि समय पर बर्फबारी न होने से जमीन के अंदर पानी का रिचार्ज नहीं हो पाता, जिससे गर्मियों में पेयजल संकट गहराने लगता है। पहाड़ी क्षेत्रों की बड़ी आबादी आज भी इन्हीं प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर है।
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सरकार की बढ़ी सतर्कता
मौजूदा हालात को देखते हुए राज्य सरकार भी अलर्ट मोड में आ गई है। पेयजल विभाग के अधिकारियों के अनुसार, जल स्रोतों के संरक्षण और निगरानी को तेज किया जा रहा है ताकि आने वाली गर्मियों में संकट को कम किया जा सके। विभागीय स्तर पर वैकल्पिक योजनाओं पर भी काम शुरू किया गया है।
आने वाले समय के लिए चेतावनी
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आने वाले महीनों में भी बारिश और बर्फबारी सामान्य से कम रही, तो इसका असर खेती, जल विद्युत परियोजनाओं और पर्यावरण संतुलन पर भी पड़ेगा। उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के लिए बर्फबारी केवल मौसम नहीं, बल्कि जीवन रेखा है। 23 जनवरी की बर्फबारी ने थोड़ी राहत जरूर दी है, लेकिन प्रदेश को अभी और नियमित बारिश व बर्फबारी की सख्त जरूरत है, वरना गर्मियों में हालात बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
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