Maharani Kamsundari Devi: बिहार की ऐतिहासिक दरभंगा रियासत की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी अब हमारे बीच नहीं रहीं। सोमवार को 96 वर्ष की उम्र में उन्होंने दरभंगा स्थित कल्याणी निवास में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही पूरे मिथिला क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। राजपरिवार के साथ-साथ आम लोग भी उन्हें श्रद्धांजलि देने बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं।
महारानी का जाना सिर्फ एक शाही परिवार की क्षति नहीं, बल्कि उस परंपरा का अंत माना जा रहा है जिसने देश सेवा, दान और त्याग को जीवन का मूल मंत्र बनाया। दरभंगा राज परिवार की पहचान हमेशा राष्ट्रहित में किए गए ऐतिहासिक योगदानों से रही है, और महारानी कामसुंदरी देवी उसी परंपरा की आखिरी जीवित कड़ी थीं।
सादगी और सेवा की मिसाल
राज परिवार के सदस्य प्रियांशु झा के मुताबिक, Maharani Kamsundari Devi का पूरा जीवन सादगी, अनुशासन और सेवा को समर्पित रहा। वह दरभंगा रियासत के अंतिम शासक महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं। उनका विवाह 1940 के दशक में हुआ था। महाराजा कामेश्वर सिंह का निधन 1962 में हो गया था, जिसके बाद महारानी ने पूरे शाही परिवार की परंपराओं को गरिमा के साथ संभाला।
दरभंगा राज और महात्मा गांधी का ऐतिहासिक रिश्ता
प्रियांशु झा बताते हैं कि दरभंगा राज परिवार देश की आजादी की लड़ाई में हमेशा आगे रहा। जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे और अपने आंदोलन के लिए संसाधनों की जरूरत थी, तब उन्होंने दरभंगा राज को एक पत्र लिखा था। पत्र मिलते ही महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने गांधी जी के आंदोलन के लिए आर्थिक सहायता और मीडिया प्रबंधन की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली। दरभंगा राज महात्मा गांधी का पहला बड़ा समर्थक माना जाता है। गांधी जी का वह हस्तलिखित पत्र आज भी परिवार के पास सुरक्षित है।

1962 के युद्ध में देश को दिया 600 किलो सोना
भारत-चीन युद्ध के समय जब देश गंभीर संकट से गुजर रहा था, तब दरभंगा राज परिवार सबसे आगे खड़ा नजर आया। साल 1962 में दरभंगा के इंद्रभवन मैदान में करीब 15 मन यानी लगभग 600 किलो सोना तौलकर देश को दान किया गया। इतना ही नहीं, राज परिवार ने अपने तीन निजी विमान और 90 एकड़ में फैला निजी हवाई अड्डा भी सरकार को सौंप दिया। आज उसी भूमि पर दरभंगा एयरपोर्ट बना हुआ है, जो उस ऐतिहासिक त्याग की गवाही देता है।
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शिक्षा और आजादी की लड़ाई में भी ऐतिहासिक योगदान
दरभंगा राज का योगदान केवल युद्ध के समय तक सीमित नहीं रहा। आजादी की लड़ाई में इंडियन नेशनल कांग्रेस को भी आर्थिक सहायता दी गई। इंडियन नेशनल कांग्रेस के संस्थापक एओ ह्यूम को हर साल 10 हजार रुपये की मदद दी जाती थी, ताकि आंदोलन मजबूत बना रहे।शिक्षा के क्षेत्र में भी दरभंगा राज परिवार का योगदान बेमिसाल रहा। देश की पहली यूनिवर्सिटी के लिए करीब 230 एकड़ जमीन दान की गई थी। राज परिवार का मानना था कि ज्ञान और सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।
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Maharani Kamsundari Devi के साथ एक युग का अंत
Maharani Kamsundari Devi के निधन के साथ दरभंगा राज की एक गौरवशाली परंपरा का अध्याय समाप्त हो गया है। श्यामा माई मंदिर परिसर में पारंपरिक विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा है, जहां पूरे मिथिला से लोग उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंच रहे हैं।



