Vande Mataram Controversy: देश में एक बार फिर ‘वंदे मातरम्’ को लेकर सियासी घमासान छिड़ गया है। हाल ही में इसे अनिवार्य करने के फैसले ने राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। समर्थकों का मानना है कि ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है और इसे सम्मान देना हर नागरिक का कर्तव्य होना चाहिए।
वहीं, विरोध करने वाले इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के दायरे में देख रहे हैं। उनका तर्क है कि देशप्रेम किसी पर थोपा नहीं जा सकता।
Vande Mataram Controversy: अरशद मदनी का बयान क्यों बना बड़ा मुद्दा?
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि देशभक्ति दिल से होती है, कानून के डर से नहीं।
मदनी ने सवाल उठाया कि अगर कोई व्यक्ति किसी विशेष गीत को गाने में असहज है, तो क्या उसे मजबूर किया जाना चाहिए? उन्होंने इसे ‘पक्षपाती’ और ‘जबरन थोपा गया फैसला’ बताया।
उनका कहना है कि भारतीय संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी देता है। ऐसे में किसी एक प्रतीक को सभी पर अनिवार्य करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
Vande Mataram Controversy: ‘वंदे मातरम्’ पर पहले भी हो चुका है विवाद
यह पहली बार नहीं है जब ‘वंदे मातरम्’ को लेकर विवाद हुआ हो। इससे पहले भी कई राज्यों में इसे स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य करने को लेकर बहस छिड़ चुकी है। कुछ संगठनों का मानना है कि यह स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत है और इसका सम्मान राष्ट्रगान की तरह किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, कुछ धार्मिक संगठनों का तर्क है कि इसके कुछ अंश उनकी धार्मिक मान्यताओं से मेल नहीं खाते। यही वजह है कि यह मुद्दा समय-समय पर राजनीतिक रंग ले लेता है।
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Vande Mataram Controversy: राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
अरशद मदनी के बयान के बाद राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। एक पक्ष का कहना है कि राष्ट्रभक्ति को किसी एक रूप में सीमित नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, देशप्रेम की भावना व्यक्ति के आचरण और योगदान से झलकती है, न कि किसी एक गीत के गायन से।
वहीं, दूसरे पक्ष ने मदनी के बयान को राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से जोड़ते हुए कहा कि ऐसे बयान समाज में गलत संदेश देते हैं। उनका तर्क है कि ‘वंदे मातरम्’ देश की अस्मिता और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक है।
Vande Mataram Controversy: संविधान और कानूनी पहलू – क्या कहता है कानून?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। वहीं अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सम्मान का अपमान नहीं करता, तब तक उसे किसी विशेष अभिव्यक्ति के लिए मजबूर करना संवैधानिक बहस का विषय हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि नागरिकों को अपने विचार रखने और असहमति जताने का अधिकार है, बशर्ते वह कानून का उल्लंघन न हो।
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Vande Mataram Controversy: सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग
यह मुद्दा सोशल मीडिया पर भी ट्रेंड कर रहा है। ट्विटर (X), फेसबुक और यूट्यूब पर लोग दो गुटों में बंटे नजर आ रहे हैं। एक वर्ग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला बता रहा है, जबकि दूसरा इसे राष्ट्रीय अस्मिता और गौरव से जोड़कर देख रहा है। हैशटैग #VandeMataramControversy और #ArshadMadani जैसे टैग तेजी से वायरल हो रहे हैं।
Vande Mataram Controversy: समाज पर संभावित असर
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर संवाद और सहमति का रास्ता ज्यादा प्रभावी होता है। जबरन लागू किए गए फैसले समाज में विभाजन की भावना को बढ़ा सकते हैं। वहीं, खुली बहस और संवैधानिक दायरे में चर्चा लोकतंत्र को मजबूत बनाती है। यह भी सच है कि राष्ट्रप्रेम और व्यक्तिगत स्वतंत्रता दोनों ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के अहम स्तंभ हैं। संतुलन बनाना ही सबसे बड़ी चुनौती है।
Vande Mataram Controversy: क्या आगे बढ़ेगा विवाद?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमा सकता है। यदि इस पर कानूनी चुनौती दी जाती है, तो अदालत की भूमिका अहम हो सकती है।
फिलहाल, ‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य करने का फैसला एक बार फिर देश में राष्ट्रभक्ति, संविधान और व्यक्तिगत अधिकारों की बहस को केंद्र में ले आया है।
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