North East Insurgency Elimination: केंद्र सरकार ने देश में आंतरिक सुरक्षा को लेकर एक बड़ा और निर्णायक लक्ष्य तय किया है। North East Insurgency Elimination को ध्यान में रखते हुए अब रणनीति का फोकस पूरी तरह पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर मणिपुर, पर शिफ्ट कर दिया गया है। सरकार का दावा है कि वामपंथी उग्रवाद (LWE) को लगभग समाप्त कर दिया गया है और अब अगला बड़ा अभियान पूर्वोत्तर क्षेत्र में सक्रिय उग्रवादी नेटवर्क और नशीली दवाओं की तस्करी को खत्म करना है।
नक्सलवाद पर काबू, अब पूर्वोत्तर पर फोकस
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त प्रयासों से नक्सल प्रभावित इलाकों में हिंसा और घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट आई है। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, मार्च 2026 तक LWE को खत्म करने का लक्ष्य लगभग हासिल कर लिया गया है। इसी सफलता के बाद अब North East Insurgency Elimination मिशन के तहत संसाधनों और रणनीतिक बलों को पूर्वोत्तर राज्यों की ओर मोड़ा जा रहा है।
कोबरा यूनिट्स और आधुनिक संसाधनों की तैनाती
पूर्वोत्तर में बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की विशेष कमांडो यूनिट ‘CoBRA’ (Commando Battalion for Resolute Action) को तैनात करने की योजना बनाई गई है। यह यूनिट गुरिल्ला युद्ध में विशेषज्ञ मानी जाती है और अब तक माओवादी क्षेत्रों में सफल ऑपरेशन कर चुकी है।
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इसके साथ ही, मणिपुर जैसे संवेदनशील राज्यों में माइन-प्रोटेक्टेड व्हीकल (MPV) और बुलेटप्रूफ गाड़ियों की आपूर्ति भी शुरू हो चुकी है। इन संसाधनों का इस्तेमाल कठिन और जोखिम भरे इलाकों में ऑपरेशन को सुरक्षित बनाने के लिए किया जाएगा। North East Insurgency Elimination के तहत यह कदम सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करेगा।
मणिपुर बना रणनीति का केंद्र
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पूर्वोत्तर में सक्रिय कुल 16 उग्रवादी समूहों में से 8 अकेले मणिपुर में सक्रिय हैं। यही वजह है कि North East Insurgency Elimination की रणनीति में मणिपुर को प्राथमिकता दी गई है।
पिछले कुछ वर्षों में यहां जातीय तनाव और उग्रवादी गतिविधियों के कारण हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं। 2024 के आंकड़े बताते हैं कि पूर्वोत्तर में हुई कुल उग्रवादी घटनाओं का लगभग 77 प्रतिशत हिस्सा मणिपुर से जुड़ा रहा। ऐसे में सुरक्षा बलों की तैनाती और संसाधनों का बड़ा हिस्सा यहीं केंद्रित किया जा रहा है।
हिंसा में आई गिरावट, लेकिन चुनौती बाकी
आंकड़ों पर नजर डालें तो 2014 में उग्रवाद से जुड़ी 824 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जिनमें 212 नागरिकों की मौत हुई थी। वहीं 2024 तक यह संख्या घटकर 294 रह गई है और नागरिक मौतों में भी भारी कमी आई है।
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हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि North East Insurgency Elimination का लक्ष्य हासिल करने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। खासकर सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय नेटवर्क और ड्रग्स तस्करी इस मिशन के सामने बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
चरणबद्ध तरीके से सुरक्षा बलों का पुनर्गठन
सरकार ने स्पष्ट किया है कि LWE प्रभावित क्षेत्रों से सुरक्षा बलों की वापसी अचानक नहीं होगी। यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से की जाएगी ताकि किसी भी क्षेत्र में सुरक्षा का शून्य न पैदा हो।
इस दौरान जिन इलाकों में हालात सामान्य हो चुके हैं, वहां से संसाधनों को पूर्वोत्तर में शिफ्ट किया जाएगा। North East Insurgency Elimination के तहत यह रणनीति संसाधनों के बेहतर उपयोग को सुनिश्चित करेगी।
ड्रग्स तस्करी पर भी सख्ती
पूर्वोत्तर क्षेत्र लंबे समय से ‘गोल्डन ट्रायंगल’ के नजदीक होने के कारण नशीली दवाओं की तस्करी का हब माना जाता रहा है। सरकार अब उग्रवाद के साथ-साथ इस अवैध कारोबार पर भी सख्ती से रोक लगाने की तैयारी में है।
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अधिकारियों के अनुसार, उग्रवादी गतिविधियों और ड्रग्स नेटवर्क के बीच गहरा संबंध है। इसलिए North East Insurgency Elimination अभियान में दोनों मोर्चों पर एक साथ कार्रवाई की जाएगी।
स्थानीय सहयोग और खुफिया नेटवर्क पर जोर
सिर्फ सैन्य कार्रवाई ही नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर विश्वास बहाली और खुफिया नेटवर्क को मजबूत करना भी इस रणनीति का अहम हिस्सा है। सरकार का मानना है कि स्थानीय समुदायों के सहयोग के बिना North East Insurgency Elimination का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा। इसी दिशा में प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां मिलकर काम कर रही हैं, ताकि लोगों में सुरक्षा का भरोसा बढ़े और उग्रवादी संगठनों को समर्थन न मिल सके।
पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद को खत्म करने का लक्ष्य सरकार के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होगा। हालांकि, पिछले वर्षों में मिली सफलता और नई रणनीतियों के आधार पर उम्मीद जताई जा रही है कि North East Insurgency Elimination मिशन अपने उद्देश्य को हासिल कर सकता है।
मणिपुर और अन्य संवेदनशील राज्यों में सुरक्षा बलों की बढ़ती मौजूदगी, आधुनिक संसाधनों की तैनाती और सख्त नीतियों से यह साफ है कि सरकार इस मुद्दे को लेकर गंभीर है। आने वाले वर्षों में इस अभियान के नतीजे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए निर्णायक साबित होंगे।
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