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Lokhitkranti > राष्ट्रीय > RSS Chief News: संस्कृत ही भारत की पहचान, मोहन भागवत का बड़ा बयान
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RSS Chief News: संस्कृत ही भारत की पहचान, मोहन भागवत का बड़ा बयान

Lokhit Kranti
Last updated: 2026-04-20 11:33 pm
Lokhit Kranti Published 2026-04-20
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Mohan Bhagwat Sanskrit Statement
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Mohan Bhagwat Sanskrit Statement: दिल्ली में आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में मोहन भगवत ने एक गहरा सांस्कृतिक संदेश देते हुए कहा कि भारत को उसकी असली पहचान में समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान बेहद जरूरी है। Mohan Bhagwat Sanskrit Statement के अनुसार, संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है, जो हजारों वर्षों की परंपराओं और विचारों को अपने भीतर समेटे हुए है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारत को सिर्फ नक्शे पर नहीं समझा जा सकता, बल्कि उसकी संस्कृति, इतिहास और जीवन मूल्यों के माध्यम से समझना होगा और इस समझ की कुंजी संस्कृत है।

Contents
‘प्रणव’ ऑफिस उद्घाटन और खास संदेशसंस्कृत – भाषा नहीं, संस्कृति का आधारजीवन का सिद्धांत – सब्जियों से उदाहरणसंस्कृत और बौद्धिक विकास का संबंधबचपन का अनुभव और सीखसंस्कृत में बढ़ती रुचि

‘प्रणव’ ऑफिस उद्घाटन और खास संदेश

इस अवसर पर संस्कृत भारती के केंद्रीय कार्यालय ‘प्रणव’ का उद्घाटन भी किया गया। यह कार्यक्रम अक्षय तृतीया के शुभ दिन आयोजित हुआ, जिसे भागवत ने विशेष महत्व का दिन बताया। Mohan Bhagwat Sanskrit Statement में उन्होंने कहा कि जिस तरह अक्षय तृतीया का महत्व कभी कम नहीं होता, उसी तरह संस्कृत भी एक ऐसी विरासत है जो कभी समाप्त नहीं हो सकती। इस कार्यक्रम में निर्मला सीतारमण, अनुराग ठाकुर और बी. एल. संतोष जैसी प्रमुख हस्तियों की उपस्थिति ने इसे और खास बना दिया।

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संस्कृत – भाषा नहीं, संस्कृति का आधार

अपने संबोधन में भागवत ने जोर देकर कहा कि संस्कृत सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की नींव है। Mohan Bhagwat Sanskrit Statement के मुताबिक, भारत में भले ही कई भाषाएं बोली जाती हों, लेकिन संस्कृत उन सभी को जोड़ने वाली कड़ी है। उन्होंने यह भी कहा कि संस्कृत जानने वाला व्यक्ति देश के किसी भी हिस्से में संवाद स्थापित कर सकता है, क्योंकि यह भाषा भारतीय भाषाओं की जड़ में मौजूद है।

जीवन का सिद्धांत – सब्जियों से उदाहरण

अपने भाषण को सरल और प्रभावशाली बनाने के लिए भागवत ने एक दिलचस्प उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जैसे कोई व्यक्ति हर दिन एक ही सब्जी नहीं खा सकता, वैसे ही जीवन में विविधता जरूरी है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि कुछ चीजें कभी बोरिंग नहीं होतीं, जैसे सांस लेना। Mohan Bhagwat Sanskrit Statement के जरिए उन्होंने समझाया कि अगर किसी काम का उद्देश्य स्पष्ट हो, तो वह कभी बोझ नहीं लगता। यही सिद्धांत संस्कृत पर भी लागू होता है, जो हमेशा प्रासंगिक बनी रहती है।

संस्कृत और बौद्धिक विकास का संबंध

भागवत ने संस्कृत को केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि बौद्धिक विकास का माध्यम भी बताया। Mohan Bhagwat Sanskrit Statement के अनुसार, संस्कृत सीखने से व्यक्ति की सोचने और तर्क करने की क्षमता बेहतर होती है। उन्होंने कहा कि किसी भाषा को सीखना केवल शब्दों को याद करना नहीं है, बल्कि उसके पीछे छिपे विचारों और सार को समझना असली उद्देश्य है। जब यह सार समझ में आ जाता है, तब व्यक्ति भारत की आत्मा को सही मायनों में महसूस कर सकता है।

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बचपन का अनुभव और सीख

अपने निजी अनुभव साझा करते हुए भागवत ने बताया कि बचपन में उन्हें संस्कृत सीखना आसान नहीं लगता था। विशेष रूप से व्याकरण के श्लोक याद करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण था। हालांकि, Mohan Bhagwat Sanskrit Statement में उन्होंने यह स्वीकार किया कि समय के साथ उन्होंने व्याकरण से ज्यादा भाषा के सार को महत्व देना सीखा। उन्होंने यह भी कहा कि संस्कृत सीखने का सबसे आसान तरीका बातचीत है, जिससे यह भाषा सहज रूप से समझ में आने लगती है।

संस्कृत में बढ़ती रुचि

भागवत ने यह भी बताया कि पिछले 15 वर्षों में देश में संस्कृत के प्रति लोगों की रुचि बढ़ी है। Mohan Bhagwat Sanskrit Statement में उन्होंने Sanskrit Bharati से अपील की कि वे अधिक से अधिक संवाद शिविर आयोजित करें ताकि यह भाषा आम लोगों तक पहुंच सके। उन्होंने यह भी कहा कि समस्या भाषा में नहीं है, बल्कि ऐसे लोगों की कमी है जो इसे प्रभावी तरीके से आगे बढ़ा सकें।

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