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Harish Rana Case: सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हरीश राणा पर लागू होगा पैसिव यूथेनेशिया, समझें पूरी प्रक्रिया

ShreeJi
Last updated: 2026-03-16 2:45 अपराह्न
ShreeJi Published 2026-03-16
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Harish Rana Passive Euthanasia
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Harish Rana Passive Euthanasia: भारत में इच्छामृत्यु को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है। अब एक बार फिर यह मुद्दा चर्चा में है क्योंकि Harish Rana Passive Euthanasia केस ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हरीश राणा को दिल्ली के एम्स के पैलिएटिव केयर विभाग में रखा गया है, जहां उन्हें परोक्ष इच्छामृत्यु की प्रक्रिया के तहत रखा गया है।

Contents
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद शुरू हुई प्रक्रियाएम्स के डॉक्टरों ने क्या कहा?पैसिव यूथेनेशिया कैसे करता है काम?पैलिएटिव केयर विभाग की भूमिकाभारत में क्या है इच्छामृत्यु पर कानून?क्यों चर्चा में आया हरीश राणा का मामला?मौत में कितना समय लग सकता है?देश में फिर शुरू हुई इच्छामृत्यु पर बहस

डॉक्टरों के मुताबिक, इस प्रक्रिया में मौत तुरंत नहीं होती बल्कि इसमें कुछ समय लग सकता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर हरीश राणा की मौत में कितना समय लग सकता है और यह पूरी प्रक्रिया कैसे काम करती है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद शुरू हुई प्रक्रिया

Harish Rana Passive Euthanasia मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मेडिकल टीम ने तय प्रोटोकॉल के तहत कार्रवाई शुरू कर दी है।

भारत में पैसिव यूथेनेशिया यानी परोक्ष इच्छामृत्यु का मतलब है कि मरीज को कृत्रिम जीवन रक्षक उपकरणों या दवाओं से धीरे-धीरे हटाया जाता है।

इस प्रक्रिया में डॉक्टर सीधे तौर पर मौत नहीं देते, बल्कि शरीर को प्राकृतिक तरीके से जीवन समाप्त होने दिया जाता है। यही कारण है कि इस प्रक्रिया को मेडिकल एथिक्स के दायरे में माना जाता है।

Read : दिल्ली में बनेगा AIIMS जैसा सुपर मेडिकल हब, तीन बड़े अस्पताल होंगे एक साथ

एम्स के डॉक्टरों ने क्या कहा?

एम्स के पूर्व निदेशक डॉ. एम.सी. मिश्रा के अनुसार Harish Rana Passive Euthanasia के मामले में मौत का समय निश्चित नहीं होता। उन्होंने बताया कि जब मरीज को जीवन रक्षक उपकरणों से हटाया जाता है तो उसके शरीर की स्थिति पर सब कुछ निर्भर करता है।

कुछ मामलों में यह प्रक्रिया कुछ घंटों में पूरी हो जाती है, जबकि कई बार इसमें कई दिन या कभी-कभी उससे भी ज्यादा समय लग सकता है। यही वजह है कि डॉक्टर लगातार मरीज की स्थिति पर नजर रखते हैं।

पैसिव यूथेनेशिया कैसे करता है काम?

Harish Rana Passive Euthanasia को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि यह प्रक्रिया कैसे काम करती है। पैसिव यूथेनेशिया में, डॉक्टर धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट इक्विपमेंट हटा देते हैं। आर्टिफिशियल ऑक्सीजन या वेंटिलेटर सपोर्ट बंद कर दिया जाता है। सिर्फ दर्द कम करने वाली दवाएं दी जाती हैं। मरीज को पैलिएटिव केयर में रखा जाता है। इस दौरान डॉक्टर यह सुनिश्चित करते हैं कि मरीज को किसी तरह की असहनीय पीड़ा न हो।

पैलिएटिव केयर विभाग की भूमिका

Harish Rana Passive Euthanasia मामले में हरीश राणा को एम्स के पैलिएटिव केयर विभाग में रखा गया है। पैलिएटिव केयर का मुख्य उद्देश्य मरीज को आराम देना और दर्द कम करना होता है।

इस विभाग में डॉक्टर, नर्स और काउंसलर मिलकर मरीज की शारीरिक और मानसिक स्थिति का ख्याल रखते हैं। यह सुनिश्चित किया जाता है कि मरीज के अंतिम समय में उसे ज्यादा तकलीफ न हो।

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भारत में क्या है इच्छामृत्यु पर कानून?

Harish Rana Passive Euthanasia केस के कारण भारत में इच्छामृत्यु का कानून भी फिर से चर्चा में आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में एक ऐतिहासिक फैसले में पैसिव यूथेनेशिया को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी थी। इस फैसले के तहत मरीज़ की इच्छा या लिविंग विल जरूरी है, परिवार की सहमति ली जाती है, मेडिकल बोर्ड की मंजूरी ली जाती है और कोर्ट की गाइडलाइंस को मानना ​​होता है। इन सभी प्रक्रियाओं के बाद ही पैसिव यूथेनेशिया लागू किया जाता है।

क्यों चर्चा में आया हरीश राणा का मामला?

Harish Rana Passive Euthanasia केस इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यह देश के उन मामलों में से एक है जहां सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह प्रक्रिया लागू की गई है।

मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और कानूनी सावधानी दोनों जरूरी होती हैं। यह मामला एक बार फिर यह सवाल भी उठा रहा है कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए इच्छामृत्यु कितना मानवीय विकल्प हो सकता है।

Also Read : लंबे इंतजार के बाद आया फैसला, सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की मंजूरी

मौत में कितना समय लग सकता है?

डॉक्टरों के अनुसार Harish Rana Passive Euthanasia प्रक्रिया में समय का अनुमान लगाना मुश्किल होता है। मरीज की शारीरिक स्थिति, बीमारी की गंभीरता और शरीर की प्रतिक्रिया पर यह निर्भर करता है।

कुछ मामलों में यह प्रक्रिया कुछ घंटों में पूरी हो सकती है, जबकि कई बार इसमें कई दिन भी लग जाते हैं। यही कारण है कि डॉक्टर लगातार निगरानी रखते हैं और मरीज को आराम देने के लिए जरूरी इलाज जारी रखते हैं।

देश में फिर शुरू हुई इच्छामृत्यु पर बहस

Harish Rana Passive Euthanasia केस के बाद देश में इच्छामृत्यु को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। कुछ लोग इसे मानवीय विकल्प मानते हैं, जबकि कुछ लोग इसे नैतिक और धार्मिक दृष्टि से गलत बताते हैं।

हालांकि मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात मरीज की गरिमा और उसकी पीड़ा को कम करना होता है। आने वाले दिनों में यह मामला भारत में इच्छामृत्यु के कानून और मेडिकल एथिक्स पर बड़ी चर्चा को जन्म दे सकता है।

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