Vande Bharat menu controversy: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में कोलकाता से कामाख्या के बीच वंदे भारत स्लीपर ट्रेन (Vande Bharat menu controversy) को हरी झंडी दिखाई गई थी। उम्मीद थी कि यह ट्रेन पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के बीच आधुनिक रेल संपर्क का नया अध्याय लिखेगी। लेकिन नियमित संचालन शुरू होते ही यह ट्रेन विकास से ज्यादा विवादों की रफ्तार पकड़ बैठी। विवाद की जड़ बनी ट्रेन का मेन्यू। यात्रियों को जैसे ही यह जानकारी मिली कि इस वंदे भारत स्लीपर ट्रेन में नॉनवेज भोजन का विकल्प उपलब्ध नहीं है, राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई।
टीएमसी का आरोप – ‘खाने के जरिए संस्कृति पर हमला’
तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने रेलवे के इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। पार्टी नेताओं का कहना है कि बंगाल और असम ऐसे राज्य हैं जहां मछली और मांस रोजमर्रा के भोजन का अहम हिस्सा हैं। ऐसे रूट पर नॉनवेज हटाना सिर्फ मेन्यू (Vande Bharat menu controversy) का फैसला नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान में दखल है। टीएमसी का तर्क है कि आज खाने पर रोक लगाई जा रही है, कल कपड़ों, प्यार और जीवनशैली पर भी पाबंदियां लग सकती हैं। पार्टी ने इसे ‘सॉफ्ट कल्चरल इम्पोजिशन’ करार दिया।

रेलवे की सफाई – ‘धार्मिक आस्था का सम्मान’
राजनीतिक बयानबाजी बढ़ने पर रेलवे ने भी अपना पक्ष रखा। रेलवे के मुताबिक, कोलकाता-कामाख्या वंदे भारत स्लीपर दो प्रमुख शक्तिपीठों कोलकाता का काली मंदिर और असम का कामाख्या मंदिर को जोड़ती है। ऐसे में ट्रेन में शुद्ध और स्वच्छ शाकाहारी भोजन परोसने का फैसला लिया गया। रेलवे ने यह भी दावा किया कि मेन्यू बंगाल और असम की पारंपरिक स्वाद परंपराओं से प्रेरित है और यात्रियों को स्थानीय व्यंजनों का अनुभव मिलेगा।
सवालों के घेरे में तर्क – बाकी ट्रेनों में क्यों मिलता है नॉनवेज?
रेलवे के तर्क के बावजूद एक बड़ा सवाल खड़ा होता है अगर यह धार्मिक रूट है, तो इसी मार्ग पर चलने वाली अन्य ट्रेनों में नॉनवेज (Vande Bharat menu controversy) क्यों परोसा जाता है? सिलचर-कंचनजंघा एक्सप्रेस, साराईघाट एक्सप्रेस, कामरूप एक्सप्रेस, काजीरंगा एक्सप्रेस और कोलकाता-सैरांग एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों में नॉनवेज विकल्प मौजूद हैं। ऐसे में सिर्फ वंदे भारत स्लीपर के लिए अलग मानदंड क्यों? यही सवाल इस पूरे मामले को ‘नीति बनाम नीयत’ की बहस में बदल रहा है।
मेन्यू शाकाहारी, लेकिन स्वाद में क्षेत्रीय रंग
हालांकि वंदे भारत स्लीपर का मेन्यू पूरी तरह शाकाहारी है, लेकिन इसमें क्षेत्रीय स्वाद को जगह दी गई है। यात्रियों को बासंती पुलाव, छोले की दाल, मूंग दाल, चना सब्जी, जोहा चावल, मसूर दाल, मौसमी सब्जियां, संदेश और रसगुल्ला जैसे व्यंजन मिल रहे हैं। शाकाहारी यात्रियों के लिए यह मेन्यू आकर्षक हो सकता है, लेकिन नियमित रूप से मांसाहारी भोजन करने वालों के लिए यह विकल्प सीमित महसूस हो सकता है।
सफर से आगे की बहस – भोजन या पहचान?
असल बहस सिर्फ खाने तक सीमित नहीं है। यह मुद्दा अब पसंद, पहचान और चुनाव के अधिकार से जुड़ गया है। सवाल यह है कि क्या आधुनिक ट्रेनों में यात्रियों को भोजन के मामले में ज्यादा विकल्प (Vande Bharat menu controversy) मिलने चाहिए या फिर धार्मिक और सांस्कृतिक तर्कों के आधार पर सीमाएं तय होंगी? वंदे भारत का यह ‘शाकाहारी सफर’ फिलहाल रेल यात्रियों से ज्यादा राजनीतिक दलों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
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