NCERT Book Controversy: आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की एक पाठ्यपुस्तक को लेकर उठे विवाद ने अब बड़ा संवैधानिक और प्रशासनिक रूप ले लिया है। Supreme Court of India ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की उस पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय शामिल था। अदालत के आदेश के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय (NCERT Book Controversy) ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को पत्र लिखकर पुस्तक के डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक प्रसार पर तत्काल रोक लगाने का आग्रह किया है।
क्या है विवाद की जड़?
मामला एनसीईआरटी (NCERT Book Controversy) की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक से जुड़ा है। पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर आधारित एक अध्याय को लेकर आपत्ति जताई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि पाठ्यक्रम के कुछ अंश न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाते प्रतीत होते हैं और ऐसा लगता है कि न्यायिक संस्था को कमजोर करने का ‘सुनियोजित प्रयास’ किया गया है। इसके बाद अदालत ने न केवल पुस्तक के भविष्य के प्रकाशन और पुनर्मुद्रण पर रोक लगाई, बल्कि पहले से वितरित प्रतियों को भी जब्त करने का आदेश दिया। साथ ही डिजिटल संस्करण को भी हटाने के निर्देश दिए गए।
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डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रोक के लिए मंत्रालयों को पत्र
शिक्षा मंत्रालय ने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि भौतिक प्रतियों को वापस लेने और पुनर्मुद्रण रोकने की प्रक्रिया National Council of Educational Research and Training और संबद्ध एजेंसियां संभाल रही हैं। हालांकि, डिजिटल मंचों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए प्रसार को रोकने के लिए संबंधित मंत्रालयों Ministry of Electronics and Information Technology और Ministry of Information and Broadcasting के सक्षम प्राधिकारियों से हस्तक्षेप करने को कहा गया है। सरकार का मानना है कि जब तक ऑनलाइन उपलब्ध सामग्री हटाई नहीं जाती, तब तक अदालत के आदेश का पूर्ण अनुपालन संभव नहीं होगा।
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी और मीडिया को धन्यवाद
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ (NCERT Book Controversy) जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली शामिल थे, ने मीडिया की भूमिका की सराहना की। पीठ ने कहा कि आपत्तिजनक अंश को उजागर करने में मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, अन्यथा “अपूरणीय क्षति” हो सकती थी। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका पर ‘आघात’ हुआ है और संस्था ‘आहत’ है। यह टिप्पणी बताती है कि अदालत इस मुद्दे को सिर्फ शैक्षणिक विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक गरिमा से जुड़ा मामला मान रही है।
शिक्षा मंत्री का आश्वासन – जवाबदेही तय होगी
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस मामले पर नाराजगी (NCERT Book Controversy) जताते हुए कहा कि जिम्मेदारी तय की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार न्यायपालिका का पूरा सम्मान करती है और किसी भी संस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाने का उसका कोई इरादा नहीं है। प्रधान ने संकेत दिया कि पाठ्यक्रम तैयार करने और उसे अनुमोदित करने की प्रक्रिया की समीक्षा की जाएगी। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनुचित निर्णय पाया गया, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
व्यापक बहस – अभिव्यक्ति, शिक्षा और संवैधानिक मर्यादा
इस प्रकरण ने शिक्षा सामग्री की समीक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक ओर शैक्षणिक स्वतंत्रता और आलोचनात्मक विमर्श (NCERT Book Controversy) की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्था की गरिमा बनाए रखना भी आवश्यक माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में पाठ्यपुस्तकों की सामग्री के मूल्यांकन के लिए अधिक पारदर्शी और बहु-स्तरीय तंत्र विकसित करने की जरूरत है, ताकि इस तरह के विवाद दोबारा न हों।
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