Iran Israel War: ईरान के आसमान पर इन दिनों मिसाइलों की गड़गड़ाहट और युद्ध के काले बादल मंडरा रहे हैं। इजरायल और अमेरिका के संभावित हमलों के बीच किसी भी आम इंसान का पहला विचार अपनी जान बचाकर सुरक्षित स्थान पर भागने का होगा। तुर्की के साथ लगी ईरान की जमीनी सरहद यानी ‘कापिकोय बॉर्डर’ (Kapikoy Border) पूरी तरह खुला है, लेकिन यहां का नजारा दुनिया को हैरान कर रहा है। जहां युद्ध के समय सीमाओं पर शरणार्थियों का रेला और भगदड़ दिखती है, वहीं ईरान की सरहद पर एक अजीब सी खामोशी छाई है। ईरानी नागरिक मौत के साये में भी अपना मुल्क छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
सरहद पर खड़े लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि वो बाशिंदे हैं जिनकी जड़ें तेहरान, इस्फहान और तबरीज की गलियों में इतनी गहरी धंसी हैं कि बमों के धमाके भी उन्हें उखाड़ नहीं पा रहे। तुर्की ने अपनी सीमाओं पर कंक्रीट की दीवारें और ऊंचे टावर खड़े कर दिए हैं ताकि बड़े पैमाने पर होने वाले पलायन को संभाला जा सके, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि जितने लोग ईरान से तुर्की में दाखिल हो रहे हैं, लगभग उतने ही लोग वापस अपने वतन लौट भी रहे हैं। यह जिद्दी लगाव और अपनी मिट्टी के प्रति वफादारी आज पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है। (Iran Israel War)
‘भगोड़ा’ कहलाना पसंद नहीं, मिट्टी से है जिद्दी लगाव
38 साल के प्लास्टिक सर्जन रेजा गोल, जो उर्मिया से इस्तांबुल जा रहे थे, उनकी बातों में ईरानियों का असली मिजाज झलकता है। उन्होंने साफ लहजे में कहा,’मैं तो बस अपने मरीजों को देखने और दिमाग शांत करने जा रहा हूं। यह साफ नहीं है कि हम ईरान हमेशा के लिए छोड़ देंगे या नहीं। आप खुद देखिए, बॉर्डर पर वैसी भीड़ नहीं है जैसी युद्ध के समय होती है। लोग अपने घरों में हैं।’ ईरानी नागरिकों के लिए घर सिर्फ ईंट-पत्थर की दीवारें नहीं, बल्कि उनकी जीवनभर की जमा-पूंजी और यादें हैं, जिन्हें वे दुश्मनों के डर से पीछे छोड़कर भागना नहीं चाहते। (Iran Israel War)
विदेश की नागरिकता, फिर भी वतन की तड़प
पुनेह असगरी और उनके पति के पास कनाडा की नागरिकता और पासपोर्ट है, वे जब चाहें सुरक्षित देश जा सकते हैं। लेकिन बॉर्डर पार करते वक्त उनके चेहरे पर कोई राहत नहीं थी। पुनेह ने भावुक होते हुए कहा,’हम पिछले पांच सालों से ईरान में रह रहे हैं। कनाडा में अब हमारा घर भी नहीं है। हमारी पूरी जिंदगी ईरान में है। हम जा रहे हैं, लेकिन बस दुआ कर रहे हैं कि ये सफर छोटा हो और हम जल्द अपने घर लौट सकें।’ यह उस दर्द की बानगी है जो संपन्न ईरानी भी महसूस कर रहे हैं। उनके लिए विदेश की सुख-सुविधाओं से ज्यादा कीमती अपने मुल्क की गलियां हैं। (Iran Israel War)
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गरीबी और मजबूरी का भी है पहरा
युद्ध केवल जान नहीं लेता, वह आम आदमी की जेब भी खाली कर देता है। फरीबा (बदला हुआ नाम) अपने बेटे के साथ इजमिर जा रही थीं ताकि युद्ध थमने तक सुरक्षित रह सकें। उन्होंने एक कड़वी हकीकत बयां करते हुए कहा,’मेरे पड़ोसी और दोस्त नहीं आ सकते। लोग अब बहुत गरीब हो गए हैं। उनके पास भागने के पैसे भी नहीं हैं। इसलिए वो घर पर ही दुबक कर बैठे हैं और डर रहे हैं।’ ईरान पर लगे कड़े प्रतिबंधों और अब इस जंग ने मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है। जिसके पास पैसा है, वह शायद सरहद पार कर ले, लेकिन गरीबों के लिए उनकी टूटी छत ही आखिरी पनाहगाह है। (Iran Israel War)
तुर्की की तैयारी और ईरानियों की ‘जिंदादिली’
तुर्की ने शरणार्थी संकट से निपटने के लिए कैंप लगाने तक की तैयारी कर ली है, लेकिन ईरानियों का मिजाज कुछ और ही गवाही दे रहा है। मौत के साये में भी वापस लौटने का यह जज्बा उनकी रगों में दौड़ रहे उस पुराने इतिहास का हिस्सा है, जिसने सदियों से हमलों को झेला है और हर बार फिर से खड़ा होना सीखा है। तुर्की बॉर्डर की खामोशी आज चीख-चीख कर कह रही है कि गोलियां और मिसाइलें शायद शरीर को डरा दें, लेकिन किसी कौम की रूह और अपनी मिट्टी के प्रति उसके प्रेम को नहीं मार सकती। (Iran Israel War)



