Gaza Peace Board: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा संघर्ष (Gaza Peace Board) को समाप्त करने के उद्देश्य से बनाई जा रही एक नई अंतरराष्ट्रीय पहल के तहत भारत को गाजा पीस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण भेजा है। यह कदम ट्रंप प्रशासन की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके जरिए गाजा को युद्ध की स्थिति से निकालकर स्थिरता, पुनर्निर्माण और दीर्घकालिक शांति की ओर ले जाने की योजना है। समाचार एजेंसी एएनआई ने यह जानकारी सूत्रों के हवाले से दी है।इस प्रस्ताव को केवल एक औपचारिक आमंत्रण नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती कूटनीतिक स्वीकार्यता के रूप में देखा जा रहा है।
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क्या है ‘गाजा पीस बोर्ड’?
व्हाइट हाउस के अनुसार, ‘बोर्ड ऑफ पीस’ गाजा से जुड़े राजनीतिक, सुरक्षा और विकास से जुड़े मुद्दों पर रणनीतिक निगरानी रखेगा। इसका मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय संसाधनों का समन्वय करना, पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना और संघर्ष से विकास की ओर संक्रमण को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाना है।
अमेरिका की योजना केवल सलाहकारी बोर्ड तक सीमित नहीं है। इसके तहत एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल की तैनाती, गाजा में शासन, सुरक्षा और पुनर्निर्माण के लिए एक उच्च प्रतिनिधि (High Representative) की नियुक्ति जैसे कदम भी प्रस्तावित किए गए हैं।

किन देशों और हस्तियों को मिला न्योता?
गाजा पीस बोर्ड (Gaza Peace Board) को बहुपक्षीय स्वरूप देने के लिए अमेरिका ने दुनिया भर के प्रभावशाली देशों और प्रमुख हस्तियों को आमंत्रित किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिन देशों के नेताओं को न्योता भेजा गया है, उनमें शामिल हैं-
- भारत
- तुर्किये
- मिस्र
- मोरक्को
- ब्रिटेन
- जर्मनी
- कनाडा
- अर्जेंटीना
- ऑस्ट्रेलिया
इसके अलावा बोर्ड में कुछ प्रमुख वैश्विक चेहरों को भी शामिल किया गया है, जिनमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, विश्व बैंक अध्यक्ष अजय बंगा,और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है यह आमंत्रण?
भारत लंबे समय से मध्य-पूर्व में संतुलित नीति अपनाता रहा है। एक ओर वह इजरायल के साथ रणनीतिक संबंध रखता है, वहीं दूसरी ओर फिलिस्तीन के मानवीय मुद्दों पर भी अपनी प्रतिबद्धता जताता रहा है। ऐसे में गाजा पीस बोर्ड (Gaza Peace Board) में भारत की संभावित भागीदारी भारत की ग्लोबल साउथ लीडर की छवि को मजबूत कर सकती है, मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण में उसकी भूमिका बढ़ा सकती है और उसे मध्य-पूर्व की राजनीति में एक मध्यस्थ शक्ति के रूप में स्थापित कर सकती है।
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जमीनी हकीकत – शांति की राह कितनी मुश्किल?
हालांकि इस पहल की घोषणा ऐसे समय में हुई है जब जमीन पर हालात पूरी तरह शांत नहीं हैं। हमास अब भी हथियार डालने से इनकार कर रहा है। अक्टूबर में हुए संघर्ष विराम के बाद बड़े पैमाने पर हिंसा में कमी जरूर आई है, लेकिन छिटपुट झड़पें, हवाई हमले और सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता अब भी बनी हुई है। यही कारण है कि गाजा में स्थायी शांति की राह आसान नहीं मानी जा रही।
क्या बदलेगा गाजा का भविष्य?
ट्रंप प्रशासन की यह पहल अगर सफल होती है, तो गाजा केवल युद्धग्रस्त क्षेत्र नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग से संचालित पुनर्निर्माण मॉडल बन सकता है। भारत जैसे देशों की भागीदारी इस प्रक्रिया को विश्वसनीयता और संतुलन प्रदान कर सकती है। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि भारत इस निमंत्रण को किस रूप में स्वीकार करता है और क्या यह बोर्ड वास्तव में गाजा (Gaza Peace Board) को संघर्ष से निकालकर शांति की ओर ले जाने में सफल हो पाएगा।
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